Tuesday, April 28, 2020
Online lecture on Malegaon Cinema
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Malegaon Cinema
Sunday, March 8, 2020
विश्व महिला दिवस पर सम्मान ।
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विश्व महिला दिवस पर सम्मान
Wednesday, February 26, 2020
भिलार : किताब गांव के तीन साल पूरे ।
भिलार : किताब गांव के तीन साल पूरे ।
आज है जागतिक मराठी दिवस ।
महाराष्ट्र के सतारा जिले अंतर्गत प्रसिद्ध तालुका है महाबलेश्वर । इसी प्रसिद्ध हिल स्टेशन की गोंद में एक 3000 से 4000 की आबादी का छोटा सा गांव है भिलार । स्ट्राबेरी की खेती यहां का मुख्य व्यवसाय है ।
गांव में करीब 500 परिवार रहते हैं । 27 फ़रवरी वर्ष 2015 को महाराष्ट्र के तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री विनोद तावड़े जी ने जगतिक मराठी दिवस के अवसर पर "पुस्तकांचे गांव" की संकल्पना प्रस्तुत की और इसके लिए चुनाव किया इसी भिलार गांव का ।
राज्य मराठी विकास परिषद, महाराष्ट्र सरकार और कुछ गैर सरकारी संगठनों की सहायता से यह संकल्पना पूरी हुई । जिसका उद्घाटन तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस ने 04 मई 2017 को किया ।
सरकार की तरफ से करीब 15000 पुस्तकें उपलब्ध कराई गई । गांव वालों की स्वेच्छा से गांव में करीब 25 जगहों पर घर, स्कूल और मंदिर के अहाते में पुस्तकों को रखने का प्रबन्ध किया गया । पुस्तकें रखने के लिए आलमारी, कुर्सियां, छाया छतरियां इत्यादि की भी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गई ।
आज तीन साल के बाद गांव में किताबों की संख्या 30000 के पार पहुंच चुकी हैं । गांव में किताबों के रखने के उपकेंद्र 25 से बढ़कर 35 हो चुके हैं । इन तीन सालों में करीब तीन लाख पर्यटक और पुस्तक प्रेमी इस किताब गांव को देखने के लिए आये । अब यहां मराठी के अतिरिक्त अंग्रेजी और हिंदी की किताबें भी उपलब्ध हैं । आडियो पुस्तकों की भी व्यवस्था की जा रही है । डिजिटल रूप में कई किताबों को उपलब्ध कराने की योजना पर भी काम हो रहा है ।
आज इस किताब गांव को पूरे तीन साल हो गए । आज जागतिक मराठी दिवस है । विश्व में बोली जाने वाली 5500 भाषाओं में मराठी 15वें नंबर पर है । भारतीय भाषाओं में यह चौथे नंबर पर है । हिंदी और मराठी में भाषाई आदान प्रदान की अच्छी परंपरा है ।
इस अवसर पर मराठी दिवस की शुभकामनाएं और भीलार जैसे नूतन प्रयोग की भी बधाई । ऐसे रचनात्मक प्रयासों की सराहना भी होनी चाहिए और इनकी संख्या भी बढ़नी चाहिए ।
आप महाबलेश्वर और पंचगनी जब भी जाएं तो इस किताब गांव को भी अवश्य देखें ।
जागतिक मराठी दिवस की पुनः शुभकामनाएं ।
डॉ मनीष कुमार मिश्रा
कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र ।
चित्र गूगल के सौजन्य से ।
आज है जागतिक मराठी दिवस ।
महाराष्ट्र के सतारा जिले अंतर्गत प्रसिद्ध तालुका है महाबलेश्वर । इसी प्रसिद्ध हिल स्टेशन की गोंद में एक 3000 से 4000 की आबादी का छोटा सा गांव है भिलार । स्ट्राबेरी की खेती यहां का मुख्य व्यवसाय है ।
गांव में करीब 500 परिवार रहते हैं । 27 फ़रवरी वर्ष 2015 को महाराष्ट्र के तत्कालीन शिक्षा मंत्री श्री विनोद तावड़े जी ने जगतिक मराठी दिवस के अवसर पर "पुस्तकांचे गांव" की संकल्पना प्रस्तुत की और इसके लिए चुनाव किया इसी भिलार गांव का ।
राज्य मराठी विकास परिषद, महाराष्ट्र सरकार और कुछ गैर सरकारी संगठनों की सहायता से यह संकल्पना पूरी हुई । जिसका उद्घाटन तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फडणवीस ने 04 मई 2017 को किया ।
सरकार की तरफ से करीब 15000 पुस्तकें उपलब्ध कराई गई । गांव वालों की स्वेच्छा से गांव में करीब 25 जगहों पर घर, स्कूल और मंदिर के अहाते में पुस्तकों को रखने का प्रबन्ध किया गया । पुस्तकें रखने के लिए आलमारी, कुर्सियां, छाया छतरियां इत्यादि की भी व्यवस्था सरकार की तरफ से की गई ।
आज तीन साल के बाद गांव में किताबों की संख्या 30000 के पार पहुंच चुकी हैं । गांव में किताबों के रखने के उपकेंद्र 25 से बढ़कर 35 हो चुके हैं । इन तीन सालों में करीब तीन लाख पर्यटक और पुस्तक प्रेमी इस किताब गांव को देखने के लिए आये । अब यहां मराठी के अतिरिक्त अंग्रेजी और हिंदी की किताबें भी उपलब्ध हैं । आडियो पुस्तकों की भी व्यवस्था की जा रही है । डिजिटल रूप में कई किताबों को उपलब्ध कराने की योजना पर भी काम हो रहा है ।
आज इस किताब गांव को पूरे तीन साल हो गए । आज जागतिक मराठी दिवस है । विश्व में बोली जाने वाली 5500 भाषाओं में मराठी 15वें नंबर पर है । भारतीय भाषाओं में यह चौथे नंबर पर है । हिंदी और मराठी में भाषाई आदान प्रदान की अच्छी परंपरा है ।
इस अवसर पर मराठी दिवस की शुभकामनाएं और भीलार जैसे नूतन प्रयोग की भी बधाई । ऐसे रचनात्मक प्रयासों की सराहना भी होनी चाहिए और इनकी संख्या भी बढ़नी चाहिए ।
आप महाबलेश्वर और पंचगनी जब भी जाएं तो इस किताब गांव को भी अवश्य देखें ।
जागतिक मराठी दिवस की पुनः शुभकामनाएं ।
डॉ मनीष कुमार मिश्रा
कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र ।
चित्र गूगल के सौजन्य से ।
Wednesday, February 19, 2020
मन! कितना अभिनय शेष रहा । - भारत भूषण Fyba Compulsory Sem II
मन!
कितना अभिनय शेष रहा
सारा जीवन जी लिया, ठीक
जैसा तेरा आदेश रहा!
बेटा, पति, पिता, पितामह सब
इस मिट्टी के उपनाम रहे
जितने सूरज उगते देखो
उससे ज्यादा संग्राम रहे
मित्रों मित्रों रसखान जिया
कितनी भी चिंता, क्लेश रहा!
हर परिचय शुभकामना हुआ
दो गीत हुए सांत्वना बना
बिजली कौंधी सो आँख लगीं
अँधियारा फिर से और लगा
पूरा जीवन आधा–आधा
तन घर में मन परदेश रहा!
आँसू–आँसू संपत्ति बने
भावुकता ही भगवान हुई
भीतर या बाहर से टूटे
केवल उनकी पहचान हुई
गीत ही लिखो गीत ही जियो
मेरा अंतिम संदेश रहा!
-------------- भारत भूषण ।
कितना अभिनय शेष रहा
सारा जीवन जी लिया, ठीक
जैसा तेरा आदेश रहा!
बेटा, पति, पिता, पितामह सब
इस मिट्टी के उपनाम रहे
जितने सूरज उगते देखो
उससे ज्यादा संग्राम रहे
मित्रों मित्रों रसखान जिया
कितनी भी चिंता, क्लेश रहा!
हर परिचय शुभकामना हुआ
दो गीत हुए सांत्वना बना
बिजली कौंधी सो आँख लगीं
अँधियारा फिर से और लगा
पूरा जीवन आधा–आधा
तन घर में मन परदेश रहा!
आँसू–आँसू संपत्ति बने
भावुकता ही भगवान हुई
भीतर या बाहर से टूटे
केवल उनकी पहचान हुई
गीत ही लिखो गीत ही जियो
मेरा अंतिम संदेश रहा!
-------------- भारत भूषण ।
अपने घर की तलाश में - निर्मला पुतुल । FYBA Compulsory Sem II
॥ अपने घर की तलाश में ॥
अंदर समेटे पूरा का पूरा घर
मैं बिखरी हूँ पूरे घर में
पर यह घर मेरा नहीं है
बरामदे पर खेलते बच्चे मेरे हैं
घर के बाहर लगी नेम-प्लेट मेरे पति की है
मैं धरती नहीं पूरी धरती होती है मेरे अंदर
पर यह नहीं होती मेरे लिए
कहीं कोई घर नहीं होता मेरा
बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर
जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त
गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच
कई-कई रूपों में...
धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
छोड़ती-हाँफती-भागती
तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर
अपनी ज़मीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ!
✦ निर्मला पुतुल
अंदर समेटे पूरा का पूरा घर
मैं बिखरी हूँ पूरे घर में
पर यह घर मेरा नहीं है
बरामदे पर खेलते बच्चे मेरे हैं
घर के बाहर लगी नेम-प्लेट मेरे पति की है
मैं धरती नहीं पूरी धरती होती है मेरे अंदर
पर यह नहीं होती मेरे लिए
कहीं कोई घर नहीं होता मेरा
बल्कि मैं होती हूँ स्वयं एक घर
जहाँ रहते हैं लोग निर्लिप्त
गर्भ से लेकर बिस्तर तक के बीच
कई-कई रूपों में...
धरती के इस छोर से उस छोर तक
मुट्ठी भर सवाल लिए मैं
छोड़ती-हाँफती-भागती
तलाश रही हूँ सदियों से निरंतर
अपनी ज़मीन, अपना घर
अपने होने का अर्थ!
✦ निर्मला पुतुल
सुशीला टाकभौरे की कविता स्त्री । FYBA Compulsory Sem II
क स्त्री
जब भी कोई कोशिश करती है
लिखने की बोलने की समझने की
सदा भयभीत-सी रहती है
मानो पहरेदारी करता हुआ
कोई सिर पर सवार हो
पहरेदार
जैसे एक मजदूर औरत के लिए
ठेेकेदार
या खरीदी संपत्ति के लिए
चौकीदार
वह सोचती है लिखते समय कलम को झुकाकर
बोलते समय बात को संभाल ले
और समझने के लिए
सबके दृष्टिकोण से देखे
क्योंकि वह एक स्त्री है!
------------------ सुशीला टाकभौरे
जब भी कोई कोशिश करती है
लिखने की बोलने की समझने की
सदा भयभीत-सी रहती है
मानो पहरेदारी करता हुआ
कोई सिर पर सवार हो
पहरेदार
जैसे एक मजदूर औरत के लिए
ठेेकेदार
या खरीदी संपत्ति के लिए
चौकीदार
वह सोचती है लिखते समय कलम को झुकाकर
बोलते समय बात को संभाल ले
और समझने के लिए
सबके दृष्टिकोण से देखे
क्योंकि वह एक स्त्री है!
------------------ सुशीला टाकभौरे
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सुशीला टाकभौरे की कविता स्त्री ।
जड़ें कविता सर्वेश्वर दयाल सक्सेना । FYBA compulsory 2 semester
जड़ें कितनी गहरीं हैं
आँकोगी कैसे ?
फूल से ?
फल से?
छाया से?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है,
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।
जलहीन,सूखी,पथरीली,
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ।
आँकोगी कैसे ?
फूल से ?
फल से?
छाया से?
उसका पता तो इसी से चलेगा
आकाश की कितनी
ऊँचाई हमने नापी है,
धरती पर कितनी दूर तक
बाँहें पसारी हैं।
जलहीन,सूखी,पथरीली,
ज़मीन पर खड़ा रहकर भी
जो हरा है
उसी की जड़ें गहरी हैं
वही सर्वाधिक प्यार से भरा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ।
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