Friday, August 28, 2026

साक्ष्य-आधारित अकादमिक आलेख हिन्दी विभाग की पाँच वर्षीय अकादमिक यात्रा: संस्थागत नवाचार, साहित्यिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय विस्तार

 साक्ष्य-आधारित अकादमिक आलेख

हिन्दी विभाग की पाँच वर्षीय अकादमिक यात्रा: संस्थागत नवाचार, साहित्यिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय विस्तार

अकादमिक वर्ष 2021–22 से 2025–26 के संदर्भ में एक साक्ष्य-आधारित अध्ययन

डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र

एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग

के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र

लगभग 5,000 शब्द • अकादमिक वर्ष 2021–22 से 2025–26

कार्यक्रम → संवाद → अभिलेखीकरण → प्रकाशन/ज्ञान-उत्पाद → संस्थागत प्रभाव



सारांश

प्रस्तुत आलेख के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण के हिन्दी विभाग की अकादमिक वर्ष 2021–22 से 2025–26 तक की गतिविधियों, प्रकाशनों, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सहयोग, अतिथि व्याख्यानों, अनुवाद-केंद्रित पहलों, डिजिटल शिक्षण और सार्वजनिक साहित्यिक कार्यक्रमों का विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इसका आधार विभागीय अकादमिक रिपोर्ट, विस्तृत जीवनवृत्त, CAS अभिलेख, विभागीय ब्लॉग, कार्यक्रम-प्रतिवेदन, प्रमाणपत्र, पोस्टर, समाचार-कतरनें और उपलब्ध दृश्य साक्ष्य हैं। इस पाँच-वर्षीय अवधि में विभाग की यात्रा को तीन प्रमुख चरणों में देखा जा सकता है—पहला, संस्थागत आधार और राष्ट्रीय विमर्श का निर्माण; दूसरा, हिन्दी महोत्सव, बहुभाषिकता और सार्वजनिक सहभागिता के माध्यम से विभाग का सामाजिक विस्तार; और तीसरा, मध्य एशिया, विशेषतः उज्बेकिस्तान, के साथ विकसित अंतरराष्ट्रीय अकादमिक नेटवर्क को स्थानीय शिक्षण, अनुवाद, प्रकाशन और डिजिटल सामग्री-निर्माण से जोड़ना। सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय सम्मेलन, हिन्दी महोत्सव 2022, रामदरश मिश्र संगोष्ठी, विभाजन-विमर्श संगोष्ठी, मध्य एशिया अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, हिन्दी–मराठी अनुवाद कार्यशाला, अमरकांत जन्मशती राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा SWAYAM के लिए निर्मित MOOC व्याख्यान इस यात्रा के प्रमुख पड़ाव हैं। अध्ययन यह स्थापित करता है कि किसी महाविद्यालयीन भाषा-विभाग की प्रभावशीलता केवल कक्षा-शिक्षण या कार्यक्रम-संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए; उसके द्वारा निर्मित ज्ञान-उत्पाद, भाषिक-सांस्कृतिक संवाद, सार्वजनिक पहुँच, अभिलेखीकरण, सहयोगी संस्थाओं की विविधता और दीर्घकालिक अकादमिक प्रभाव भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। आलेख अंत में विभागीय गतिविधियों के संस्थानीकरण, डिजिटल रिपॉज़िटरी, परिणाम-आधारित मूल्यांकन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए कुछ कार्यकारी सुझाव प्रस्तुत करता है।

बीज-शब्द: हिन्दी विभाग, अकादमिक गतिविधियाँ, हिन्दी महोत्सव, अनुवाद, मध्य एशिया, उज्बेकिस्तान, साहित्यिक संगोष्ठी, ज्ञान-उत्पाद, विभागीय अभिलेखीकरण, अंतरराष्ट्रीय सहयोग।

1. भूमिका: भाषा-विभाग की बदलती भूमिका

भारतीय उच्च शिक्षा में भाषा-विभागों की भूमिका लंबे समय तक मुख्यतः पाठ्यक्रम, परीक्षा और साहित्यिक आयोजनों तक सीमित समझी जाती रही है। बदलते सामाजिक और तकनीकी परिदृश्य में यह दृष्टि अपर्याप्त हो गई है। आज भाषा-विभाग से अपेक्षा है कि वह कक्षा और समुदाय, साहित्य और तकनीक, स्थानीय भाषिक अनुभव और वैश्विक विमर्श, शोध और सार्वजनिक संप्रेषण तथा सांस्कृतिक स्मृति और डिजिटल भविष्य के बीच सक्रिय सेतु बने। विशेष रूप से हिन्दी विभाग के सामने एक दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे साहित्यिक परंपरा की गंभीरता, भाषिक शुद्धता और आलोचनात्मक विवेक को बनाए रखना है; दूसरी ओर उसे डिजिटल लेखन, अनुवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मीडिया, रोजगार, वैश्विक हिन्दी और बहुभाषिक समाज की नई आवश्यकताओं से संवाद भी करना है।

के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय का हिन्दी विभाग इस व्यापक परिवर्तन को एक छोटे महाविद्यालयीन विभाग की दृष्टि से समझने का महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। अकादमिक वर्ष 2021–22 से 2025–26 के बीच विभाग ने व्याख्यान, राष्ट्रीय संगोष्ठी, हिन्दी महोत्सव, ब्लॉग लेखन कार्यशाला, रंगमंच, त्रिभाषी कवि-सम्मेलन, प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम, लेखक-केंद्रित साहित्यिक विमर्श, अनुवाद कार्यशाला, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, शोध-पत्र प्रस्तुति, पुस्तक-प्रकाशन और MOOC सामग्री-निर्माण जैसी विविध गतिविधियाँ संचालित कीं। उपलब्ध अभिलेख यह भी दिखाते हैं कि विभागीय कार्यक्रम किसी एक स्वरूप में स्थिर नहीं रहे। वे समय के साथ स्थानीय से राष्ट्रीय, राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय और भौतिक आयोजन से डिजिटल/ऑनलाइन ज्ञान-संचार की दिशा में विकसित हुए।

यह आलेख किसी प्रशस्ति-पत्र या गतिविधियों की साधारण सूची के रूप में नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य पाँच वर्षों की विभागीय यात्रा के भीतर निहित अकादमिक तर्क को समझना है। इस तर्क के पाँच परस्पर जुड़े घटक हैं—कार्यक्रम की विषयवस्तु, प्रतिभागिता और संवाद, दस्तावेज़ीय साक्ष्य, सार्वजनिक प्रसार तथा कार्यक्रम से उत्पन्न दीर्घकालिक ज्ञान-उत्पाद। उदाहरण के लिए, सरदार पटेल पर आयोजित सम्मेलन का महत्त्व केवल दो दिनों की गतिविधि में नहीं है; उससे जुड़ा संपादित प्रकाशन, राष्ट्रीय संस्थाओं का सहयोग, लगभग 125 प्रतिभागियों की उपस्थिति और छह अकादमिक सत्र उसके स्थायी प्रभाव को परिभाषित करते हैं। इसी प्रकार विभाजन-साहित्य पर शिमला में आयोजित संगोष्ठी बाद में पुस्तक के रूप में सामने आई, जबकि मध्य एशिया सम्मेलन ने भारत–उज्बेकिस्तान साहित्यिक संबंधों, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक संवाद की नई शोध-दिशाओं को प्रोत्साहित किया।

अध्ययन में प्रयुक्त आँकड़ों को “न्यूनतम सत्यापित” माना गया है। इसका कारण यह है कि सभी वर्षों के अभिलेख समान सघनता से उपलब्ध नहीं हैं। कुछ गतिविधियों के विस्तृत प्रतिवेदन, पोस्टर, प्रमाणपत्र और समाचार-कतरनें उपलब्ध हैं, जबकि कुछ का उल्लेख जीवनवृत्त या CAS दस्तावेज़ में संक्षेप में मिलता है। इसलिए आलेख किसी संपूर्ण सांख्यिकीय दावे के स्थान पर साक्ष्य-समर्थित संस्थागत प्रवृत्तियों को रेखांकित करता है। यह सावधानी अकादमिक प्रामाणिकता का आधार है और विभागीय रिपोर्टिंग के लिए भी उपयोगी सिद्धांत प्रस्तुत करती है।

2. विभागीय दृष्टि: शिक्षण से ज्ञान-सृजन तक

हिन्दी विभाग की गतिविधियों में एक स्पष्ट दृष्टि दिखाई देती है—भाषा को केवल पाठ्यक्रमीय विषय न मानकर सामाजिक अनुभव, सांस्कृतिक स्मृति, तकनीकी बदलाव और अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जोड़ना। विभाग के परिचय-पत्रक में हिन्दी साहित्य मंडल, शोध, डिजिटल नवाचार, भाषा एवं रोजगार, अनुवाद और वैश्विक हिन्दी जैसी प्राथमिकताओं का उल्लेख मिलता है। इन प्राथमिकताओं का वास्तविक रूप पाँच-वर्षीय गतिविधियों में देखा जा सकता है। “सरल हिन्दी” प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम भाषा-दक्षता और व्यावहारिक संप्रेषण की आवश्यकता को संबोधित करता है; ब्लॉग लेखन कार्यशाला हिन्दी के डिजिटल उपयोग को; त्रिभाषी कवि-सम्मेलन बहुभाषिक सह-अस्तित्व को; अनुवाद कार्यशाला भाषाओं के बीच सांस्कृतिक संचार को; और मध्य एशिया सम्मेलन हिन्दी की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को।

विभागीय विषय-चयन की अकादमिक पृष्ठभूमि डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र के अमरकांत, सिनेमा, मीडिया, हिन्दी ब्लॉगिंग और वैश्विक हिन्दी संबंधी शोध तथा BHU, IIAS और उज्बेकिस्तान के अध्यापन-अनुभव से जुड़ती है। इसीलिए यहाँ अमरकांत, रामदरश मिश्र और विभाजन-साहित्य के साथ ब्लॉग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुवाद और सांस्कृतिक कूटनीति भी उपस्थित हैं।

विभागीय मॉडल का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष सहयोग है। ICSSR, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, International Institute for Central Asian Studies, Tashkent State University of Oriental Studies और Alfraganus University जैसी संस्थाओं से विभिन्न स्तरों पर बने संबंधों ने विभाग को अपने महाविद्यालय की भौगोलिक सीमा से बाहर कार्य करने का अवसर दिया। ऐसे सहयोगों का महत्त्व केवल प्रतिष्ठित नामों की सूची में नहीं है। वे विषय-विशेषज्ञों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, प्रकाशनों और संस्थागत संसाधनों को एक साझा अकादमिक मंच पर लाते हैं।

तीसरा पक्ष ज्ञान-उत्पाद का है। विभाग ने आयोजन को अंतिम बिंदु नहीं माना। कई कार्यक्रमों से पुस्तक, आलेख, शोध-पत्र, समाचार-अभिलेख या डिजिटल सामग्री सामने आई। यह दृष्टि उच्च शिक्षा में अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि एक कार्यक्रम का प्रभाव तभी दीर्घकालिक बनता है जब उसके विचार पुनःपाठ, संदर्भ और शोध के लिए उपलब्ध रहें। इस प्रकार विभागीय गतिविधियों का मूल स्वरूप “event-centred” होने के साथ “knowledge-product oriented” भी है।

3. अकादमिक वर्ष 2021–22: आधार, प्रशिक्षण और राष्ट्रीय विमर्श

अकादमिक वर्ष 2021–22 को पाँच-वर्षीय यात्रा का आधार-वर्ष कहा जा सकता है। कोविड-19 महामारी के बाद उच्च शिक्षा संस्थान शिक्षण और सार्वजनिक कार्यक्रमों के नए स्वरूप तलाश रहे थे। इसी समय भाषा-विभागों के लिए डिजिटल माध्यम, ऑनलाइन व्याख्यान और सीमित संसाधनों में निरंतर अकादमिक सक्रियता महत्त्वपूर्ण बनी। इस अवधि में राष्ट्रीय अनुवाद मिशन के 17 से 30 सितम्बर 2021 तक आयोजित गहन प्रशिक्षण में सहभागिता ने विभागीय कार्य को एक महत्त्वपूर्ण भाषिक आधार दिया। अनुवाद केवल एक तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि भारतीय बहुभाषिक समाज में ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का साधन है। प्रशिक्षण ने पारिभाषिक शब्दावली, भाषिक समानता, सांस्कृतिक संदर्भ और लक्ष्य-भाषा की स्वाभाविकता जैसे प्रश्नों को विभागीय दृष्टि का हिस्सा बनाया। आगे के वर्षों में हिन्दी–मराठी अनुवाद कार्यशाला और मध्य एशिया-केंद्रित गतिविधियों में इस तैयारी की प्रतिध्वनि देखी जा सकती है।

दिसम्बर 2021 में FYBA और SYBA विद्यार्थियों के लिए आयोजित अकादमिक व्याख्यान ने कक्षा-आधारित अध्ययन को प्रत्यक्ष संवाद से जोड़ा। महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के लिए ऐसे व्याख्यान केवल अतिरिक्त जानकारी नहीं देते; वे विषय के प्रति आत्मीयता, प्रश्न पूछने की आदत और साहित्य को सामाजिक संदर्भ में देखने की क्षमता विकसित करते हैं। फरवरी 2022 में “75 साल–75 व्याख्यान” पहल ने आजादी के अमृत महोत्सव को ज्ञान-उत्सव में बदलने का प्रयास किया। इसके पोस्टर और ब्लॉग अभिलेख से स्पष्ट है कि विभाग राष्ट्रीय स्मृति को भाषिक-साहित्यिक विमर्श से जोड़ना चाहता था [2]।

इस वर्ष का सबसे बड़ा आयोजन 24–25 मार्च 2022 को “राष्ट्रनायक सरदार वल्लभभाई पटेल: व्यक्तित्व और कर्तृत्व” विषय पर आयोजित दो-दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन था [3]। सम्मेलन में छह अकादमिक सत्र और लगभग 125 शिक्षक/विद्यार्थी प्रतिभागी दर्ज हैं। प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने प्रमुख अकादमिक वक्तव्य दिया; प्रो. राजेश लाल मेहरा, अदिति माहेश्वरी गोयल, प्रो. शीतला प्रसाद दुबे, सचिन निम्बालकर और डॉ. आर. बी. सिंह सहित विद्वानों और अतिथियों की उपस्थिति ने आयोजन को व्यापक बनाया। डॉ. अनिता मन्ना द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावना और डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र के संयोजन/संपादकीय दायित्व ने इसे संस्थागत रूप दिया। ICSSR, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी और केन्द्रीय हिन्दी संस्थान जैसे सहयोगियों की उपस्थिति ने विषय को केवल स्मरणात्मक कार्यक्रम न रहने देकर इतिहास, राष्ट्र-निर्माण, प्रशासन, एकीकरण और सार्वजनिक नेतृत्व के आलोचनात्मक अध्ययन की दिशा दी।

इस सम्मेलन की उल्लेखनीय विशेषता उसका प्रकाशन से संबंध है। “राष्ट्रनायक सरदार वल्लभभाई पटेल: व्यक्तित्व और कर्तृत्व” सह-संपादित पुस्तक के रूप में सामने आई। इसी समय “क़व्वाली और सूफ़ी परंपरा” जैसी पुस्तक ने सांस्कृतिक बहुलता और लोक-आध्यात्मिक परंपरा की ओर ध्यान आकर्षित किया। इससे स्पष्ट होता है कि 2021–22 का विभागीय कार्य राष्ट्रीयता की एकरेखीय समझ तक सीमित नहीं था; उसमें राष्ट्र-निर्माण के साथ सूफ़ी परंपरा, अनुवाद, स्मृति और विविध सांस्कृतिक अनुभव भी शामिल थे।

4. अकादमिक वर्ष 2022–23: हिन्दी महोत्सव और सार्वजनिक सहभागिता

यदि 2021–22 संस्थागत आधार और राष्ट्रीय सम्मेलन का वर्ष था, तो 2022–23 विभाग की सार्वजनिक दृश्यता और कार्यक्रम-विविधता का वर्ष सिद्ध हुआ। सितम्बर 2022 में आयोजित हिन्दी महोत्सव ने भाषा-दिवस को औपचारिक समारोह से आगे बढ़ाकर बहु-दिवसीय अकादमिक-सांस्कृतिक उत्सव का रूप दिया [4]। 12 सितम्बर को महोत्सव का उद्घाटन, “स्मृतियाँ” पुस्तक का लोकार्पण और त्रिभाषी कवि-सम्मेलन आयोजित हुआ [5]। पुस्तक लोकार्पण ने विभागीय लेखन को सार्वजनिक मंच दिया, जबकि हिन्दी–मराठी–उर्दू काव्य-संवाद ने मुंबई महानगर क्षेत्र की बहुभाषिक संस्कृति को स्वीकार किया। यह संयोजन महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हिन्दी की उन्नति को अन्य भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग और साझा सांस्कृतिक पूँजी के रूप में देखा गया।

13 सितम्बर की हिन्दी ब्लॉग लेखन कार्यशाला महोत्सव का डिजिटल आयाम थी [6]। माइक्रोसॉफ्ट के भारतीय भाषा विशेषज्ञ बालेंदु शर्मा दाधीच के मार्गदर्शन में ब्लॉग लेखन, डिजिटल हिन्दी, ऑनलाइन प्रकाशन और भाषिक तकनीक पर केंद्रित सत्र आयोजित हुआ। विद्यार्थियों के लिए ब्लॉग एक साधारण वेबसाइट नहीं, बल्कि स्व-प्रकाशन, रचनात्मक अभिव्यक्ति, अकादमिक अभिलेखीकरण और सार्वजनिक संवाद का माध्यम है। हिन्दी विभाग का अपना ब्लॉग भी इसी विचार का व्यावहारिक उदाहरण है। उसमें प्रकाशित पोस्टर, कार्यक्रम-रिपोर्ट, समाचार-कतरन और फोटो विभाग की संस्थागत स्मृति को सार्वजनिक बनाते हैं। इस दृष्टि से ब्लॉग कार्यशाला कार्यक्रम और विभागीय कार्यपद्धति—दोनों को जोड़ती है।

14 सितम्बर को प्रो. निर्मल कुमार का प्रथम पावस व्याख्यान “स्वतंत्रता आंदोलन और हिन्दी भाषा” विषय पर आयोजित हुआ। यह व्याख्यान हिन्दी दिवस को भाषाई गौरव के सामान्य वक्तव्य से आगे ले जाकर इतिहास, राष्ट्रवाद, जनसंचार और भाषा-राजनीति के प्रश्नों से जोड़ता है। स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की भूमिका, जनभागीदारी, पत्र-पत्रिकाओं का योगदान और भाषा के लोकतांत्रिक चरित्र जैसे विषय विद्यार्थियों को भाषा के सामाजिक इतिहास से परिचित कराते हैं।

15 सितम्बर को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के सहयोग से “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस” नाटक का मंचन हुआ। इस प्रयोग ने तकनीक, मनुष्य और नैतिकता के प्रश्नों को हिन्दी रंगमंच तथा प्रदर्शन-आधारित अधिगम से जोड़ा। आगे डिजिटल शिक्षण और MOOC निर्माण की दिशा में हुए कार्य को देखते हुए इसे विभाग की भावी तकनीकी प्राथमिकताओं का प्रारंभिक संकेत माना जा सकता है।

2 अक्टूबर 2022 का त्रिभाषी कवि-सम्मान समारोह भाषिक सौहार्द की निरंतरता था। हिन्दी, मराठी और उर्दू के रचनाकारों को एक मंच पर सम्मानित करने से महाविद्यालय और स्थानीय साहित्यिक समुदाय के बीच संबंध मजबूत हुए। महाविद्यालयीन विभाग तभी जीवंत बनता है जब वह अपने परिसर के बाहर सक्रिय साहित्यकारों, पत्रकारों, अनुवादकों और सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ता है। इस कार्यक्रम ने साहित्य को पाठ्य-पुस्तक से बाहर जीवित रचनात्मक परंपरा के रूप में विद्यार्थियों के सामने रखा।

इस वर्ष की मीडिया उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही। नवभारत के ठाणे–नवी मुंबई संस्करण में 15 सितम्बर 2022 को “अग्रवाल कॉलेज में हिंदी महोत्सव शुरू” शीर्षक से समाचार प्रकाशित हुआ। उत्तर शक्ति और दैनिक पहला समाचार ने 13 सितम्बर को महोत्सव के आरंभ की खबर प्रकाशित की, जबकि भारत संवाद क्रांति न्यूज़ में हिन्दी महोत्सव और ब्लॉग कार्यशाला की कतरन उपलब्ध है। चार सत्यापित समाचार-कतरनें यह दिखाती हैं कि कार्यक्रम ने महाविद्यालय के बाहर सार्वजनिक ध्यान आकर्षित किया। मीडिया कवरेज को केवल प्रसिद्धि का साधन नहीं मानना चाहिए; यह आयोजन की तिथि, विषय, अतिथि और सामाजिक पहुँच का स्वतंत्र दस्तावेज़ भी बनता है।

इसी अवधि में रामानुजन कॉलेज के दो एक-सप्ताहीय संकाय विकास कार्यक्रमों में सहभागिता ने सार्वजनिक आयोजन और व्यावसायिक उन्नयन के बीच संतुलन बनाया। इस प्रकार हिन्दी महोत्सव पुस्तक, कविता, इतिहास, ब्लॉग, तकनीक, नाटक, बहुभाषिकता और मीडिया को जोड़ने वाली बहुआयामी शैक्षिक पद्धति के रूप में विकसित हुआ।

5. अकादमिक वर्ष 2023–24: पाठ्यक्रम, साहित्य और शोध का विस्तार

2023–24 में विभागीय गतिविधियाँ अधिक स्पष्ट रूप से पाठ्यक्रम, साहित्यिक आलोचना और राष्ट्रीय शोध-विमर्श की ओर उन्मुख हुईं। 6 जुलाई 2023 को “सरल हिन्दी” प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम का शुभारंभ इस वर्ष का व्यावहारिक भाषिक पक्ष था। ऐसे पाठ्यक्रम हिन्दी को केवल साहित्य के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि संप्रेषण, रोजगार, प्रशासन और दैनिक व्यवहार की भाषा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। विभिन्न भाषिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों के लिए सरल, मानक और प्रयोजनमूलक हिन्दी का प्रशिक्षण आत्मविश्वास तथा सामाजिक सहभागिता बढ़ाता है। यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति में निहित कौशल, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम की भावना से भी संगत दिखाई देती है।

14 अगस्त 2023 को रामदरश मिश्र के साहित्य पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी वर्ष का प्रमुख साहित्यिक आयोजन था [7]। रामदरश मिश्र का साहित्य कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आलोचना और आत्मकथा सहित अनेक विधाओं में विस्तृत है। उनकी रचनाओं में ग्राम्य जीवन, महानगरीय अनुभव, विस्थापन, श्रम, मनुष्यता और बदलते सामाजिक संबंधों का संवेदनशील चित्रण मिलता है। संगोष्ठी ने किसी जीवित/समकालीन रचनाकार को केवल सम्मानित करने के बजाय उनके साहित्य के आलोचनात्मक पुनर्पाठ का अवसर दिया। “रामदरश मिश्र: अपनी माटी में रचे, बसे और धँसे हुए साहित्यकार” जैसे अध्याय तथा बाद में “रामदरश मिश्र: सौ वसंत की गाथा” जैसी सह-संपादित पुस्तक इस विमर्श को कार्यक्रम से प्रकाशन की दिशा में ले जाती हैं।

28–29 नवम्बर 2023 को भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में “विभाजन की त्रासदी और भारतीय भाषाओं का साहित्य” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ने विभाग की अकादमिक पहुँच को राष्ट्रीय शोध-संस्थान तक विस्तृत किया [8]। भारत-विभाजन पर हिन्दी में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है, किंतु भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक संदर्भ में विभाजन की स्मृति, हिंसा, विस्थापन, स्त्री-अनुभव, सीमा, पहचान और पुनर्वास का अध्ययन अधिक व्यापक दृष्टि प्रदान करता है। संगोष्ठी में विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों के साहित्य को साथ रखकर पढ़ने का प्रयास हुआ। डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र की संयोजक भूमिका ने महाविद्यालयीन विभाग, शोध-संस्थान और राष्ट्रीय विद्वत् समुदाय के बीच सक्रिय सेतु का कार्य किया।

इस संगोष्ठी का स्थायी परिणाम “विभाजन की त्रासदी और भारतीय भाषाओं का साहित्य” शीर्षक संपादित पुस्तक के रूप में सामने आया, जिसका ISBN 978-81-978281-0-2 उपलब्ध अभिलेख में दर्ज है। पुस्तक का 2024 में लोकार्पण/प्रकाशकीय अभिलेख मिलता है। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि विभाग की गतिविधियों में आयोजन और प्रकाशन का संबंध आकस्मिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। एक संगोष्ठी में प्रस्तुत विचारों को संपादित, संदर्भित और पुस्तकाकार रूप देने से वह राष्ट्रीय अकादमिक समुदाय के लिए दीर्घकालिक स्रोत बनती है।

CAS 2023–24 में भारत–उज्बेकिस्तान, उत्तरी कोंकण, कबीर और स्वामी विवेकानंद से जुड़े आलेख/अध्याय दर्ज हैं। इसी वर्ष SNDT महिला विश्वविद्यालय, बी. के. बिरला महाविद्यालय, TSUOS और नामंगन में वैश्विक हिन्दी, हिन्दी आलोचना, तुलनात्मक साहित्य तथा अनुवाद अध्ययन पर Resource Person भूमिकाएँ निभाई गईं। इन कार्यों ने स्थानीय समाज, भारतीय साहित्य और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंधों को एक साझा शोध-दृष्टि में जोड़ा।

6. अकादमिक वर्ष 2024–25: वैश्विक हिन्दी और मध्य एशिया से संवाद

2024–25 हिन्दी विभाग की यात्रा में अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहभागिता का निर्णायक चरण है। डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र का ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ से Visiting Professor/ICCR हिन्दी पीठ के रूप में जुड़ना व्यक्तिगत उपलब्धि होने के साथ विभागीय दृष्टि के विस्तार का भी माध्यम बना। विदेश में हिन्दी अध्यापन का अनुभव भाषा को भारतीय परिसर की सीमाओं से बाहर देखने की दृष्टि प्रदान करता है। उज्बेकिस्तान में हिन्दी सीखने वाले विद्यार्थी हिन्दी को केवल रोजगार या परीक्षा के लिए नहीं पढ़ते; उनके लिए भारतीय सिनेमा, साहित्य, इतिहास, पर्यटन, अनुवाद और भारत के साथ सांस्कृतिक संबंध भी प्रेरक तत्व हैं। इस अनुभव ने विभागीय कार्य में “वैश्विक हिन्दी” को एक वास्तविक सामाजिक संदर्भ दिया।

TSUOS, अल्फ्रागानुस विश्वविद्यालय और नामंगन से जुड़ी गतिविधियों में हिन्दी, तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद अध्ययन पर व्याख्यान तथा विशेषज्ञ भूमिकाएँ निभाई गईं। उपलब्ध प्रमाणपत्र इसकी पुष्टि करते हैं। विदेश में हिन्दी-अध्यापन भाषा के साथ भारतीय समाज की विविधता, साहित्यिक परंपरा और समकालीन भारत की बौद्धिक छवि भी प्रस्तुत करता है।

16 जनवरी 2025 को भारतीय दूतावास, ताशकंद और TSUOS से संबद्ध “अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सेवी सम्मान” ने विदेश में हिन्दी अध्यापन और सांस्कृतिक सेतु-निर्माण के योगदान को मान्यता दी। सम्मान का संस्थागत महत्त्व यह है कि इससे महाविद्यालयीन विभाग की अंतरराष्ट्रीय दृश्यता बढ़ती है और विद्यार्थियों के सामने हिन्दी से जुड़े वैश्विक अवसरों का जीवंत उदाहरण उपस्थित होता है। हिन्दी में अध्यापन, अनुवाद, सांस्कृतिक अध्ययन, पर्यटन, कूटनीति, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं की संभावनाएँ तभी विश्वसनीय लगती हैं जब विद्यार्थी अपने शिक्षक के कार्य में उनका वास्तविक रूप देख सकें।

भारत लौटने के बाद भी अंतर-संस्थागत भूमिकाएँ जारी रहीं। राजकीय आर्य डिग्री कॉलेज, नूरपुर में “नैतिक मूल्य और पर्यावरणीय स्थिरता” तथा एस. बी. कॉलेज, शाहापुर में “शोध-प्रविधि और हिन्दी” पर व्याख्यान दिए गए [9]। YCMOU और विल्सन कॉलेज की पाठ्यक्रम समितियों से जुड़ाव ने विषय-वस्तु, अधिगम परिणाम और मूल्यांकन के स्तर पर विभागीय विशेषज्ञता को उच्च शिक्षा के अकादमिक शासन से जोड़ा।

प्रकाशन की दृष्टि से “तेरे अंजाम पे रोना आया” एकल पुस्तक तथा “विभाजन की त्रासदी और भारतीय भाषाओं का साहित्य” का प्रकाशकीय अभिलेख इस वर्ष से जुड़ता है। “राज कपूर शताब्दी वर्ष और मध्य एशिया” आलेख भारतीय सिनेमा और मध्य एशियाई सांस्कृतिक स्मृति के संबंध को सामने लाता है, जबकि “लाल बहादुर शास्त्री स्कूल” जैसा आलेख विदेशी संदर्भ में भारतीय शिक्षा/संस्कृति की उपस्थिति को दर्ज करता है। इस प्रकार 2024–25 में वैश्विक अनुभव केवल व्यक्तिगत यात्रा-वृत्तांत नहीं रहा; वह व्याख्यान, लेखन, पाठ्यक्रम, सम्मान और संस्थागत नेटवर्क में रूपांतरित हुआ।

7. अकादमिक वर्ष 2025–26: अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, अनुवाद और ज्ञान-उत्पाद

2025–26 उपलब्ध अभिलेखों की दृष्टि से सर्वाधिक सघन और विविध वर्ष है। 14 सितम्बर 2025 को हिन्दी महोत्सव का उद्घाटन पद्मश्री गजानन माने की अध्यक्षता में हुआ [10]। डॉ. सतीश पांडेय, डॉ. अनिल सिंह और डॉ. नरेश चंद्र सहित अतिथियों की उपस्थिति में “पानी के बुलबुले” का लोकार्पण किया गया और कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्र ने किया। हिन्दी दिवस को पुस्तक और सार्वजनिक संवाद से जोड़ने की यह परंपरा 2022 के महोत्सव से आगे बढ़ती हुई दिखाई देती है। कार्यक्रम का समाचार कवरेज बताता है कि विभाग ने सार्वजनिक पहुँच को लगातार महत्त्व दिया।

18–19 सितम्बर 2025 को TSUOS से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में “भारतीय ज्ञान परंपरा और उज्बेकिस्तान: संबंधों का ताना-बाना” विषय पर शोध-पत्र प्रस्तुति हुई। इसके तुरंत बाद 20–21 सितम्बर को International Institute for Central Asian Studies, समरकंद और अल्फ्रागानुस विश्वविद्यालय के सहयोग से मध्य एशिया के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन सम्मेलन आयोजित किया गया [11]। घटनाओं का यह क्रम महत्त्वपूर्ण है—पहले व्यक्तिगत शोध-पत्र के माध्यम से विचार प्रस्तुत हुआ, फिर बहु-संस्थागत सम्मेलन के माध्यम से व्यापक संवाद बना। ऑनलाइन माध्यम ने भारत, उज


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