Sunday, December 8, 2013

दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी रिपोर्ट

                
                              हिंदी ब्लागिंग : स्वरुप,व्याप्ति और संभावनाएं    
                             (09 -10 दिसंबर 2011)
                      के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण(प) के हिंदी विभाग द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान  आयोग के सहयोग से 9-10 दिसबर 2011 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया । यह संगोष्ठी पूरी तरह सफल रही ।
  उद्घाटन सत्र शुक्रवार 09 दिसंबर की सुबह 10.30 बजे शुरु हुआ। उदघाटन सत्र की अध्यक्षता अग्रवाल महाविधालय के अध्यक्ष डा. आर. बी. सिंह  जी को करनी थी पर किन्हीं कारणों से वो उस सत्र में आ नहीं पाये तो अध्यक्ष का पदभार संभाला महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. दामोदर खड्से जी ने।  हिंदी भाषी जनकल्याण शिक्षण संस्था  के सचिव श्री विजय नारायण पंडित जी ने दीप प्रज्वलन किया । मुख्य अतिथि थीं लखनऊ से आयीं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की पूर्व अध्यक्ष डा विधाबिंदु सिंह। हिंदी विभाग, मुंबई विद्यापीठ के पूर्व अध्यक्ष  डॉ. रामजी तिवारी और नवभारत टाइम्स, मुंबई के मुख्य उपसंपादक श्री राजमणि त्रिपाठी जी विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन थे। हिंदी जगत के जाने माने और सर्वप्रिय वरिष्ठ ब्लागर श्री रवि रतलामी जी बीज भाषण  के लिए खास भोपाल( मध्य प्रदेश)से आये थे। मनीष कुमार मिश्र ,जो इस संगोष्ठी के संयोजक थे, कि प्रस्ताविकी से उदघाटन समारोह प्रारंभ हुआ। प्रस्ताविकी देते हुए मनीष ने बताया कि कैसे ब्लोगिंग पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था।
   के.एम. अग्रवाल महाविद्यालय की प्रचार्या डा (श्रीमती) अनिता मन्ना जी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि इस संगोष्ठी के आयोजन पर जहां एक तरफ़ हर्षित और गौरवान्वित महसूस कर रही हैं वहीं वो महाविद्यालय की प्रबंधन समिति से मिले पूर्ण सहयोग के लिए कृतज्ञ भी हैं।
 संस्था के एमएएचए सचिव श्री विजय पंडित जी ने महाविद्यालय का परिचय देते हुए बताया कि यह महाविद्यालय कुछ साल पहले ही 1994 में स्थापित किया गया क्यों कि बम्बई के कल्याण जैसे उपनगर में सिर्फ़ एक ही महाविधालय और है जो हिंदी भाषियों द्वारा संचालित है और कल्याण की जनसंख्या को देखते हुए वो काफ़ी नहीं था। इतने छोटे से समय में भी महाविद्यालय ने बहुत तेजी से प्रगति की है और आज नाना प्रकार के, पूर्वस्नातक और स्नातकोत्तरसरकारी सहायता प्राप्त और सरकार मान्य तथा बिना सहायता प्राप्त पाठयक्रम पढ़ाये जा रहे हैं। आपने  संतोष प्रकट करते हुए बताया कि इस संगोष्ठी में भारत के कई राज्यों से ब्लागर पधारे हैं और कुछ ब्लागर विदेशों से भी आये हैं।
  इतना ही नहीं ये पहली बार है कि इसी संगोष्ठी के उदघाटन समारोह में ही ब्लोगिंग पर एक किताब का लोकार्पण भी हो रहा है। ये ब्लागिंग पर लिखी तीसरी किताब है और अग्रवाल महाविधालय ने ही इसे प्रकाशित किया है। 
    महाविद्यालय की प्रबंधक समिति के संयुक्त सचिव श्री ओमप्रकाश मुन्ना पांडे जी मंच पर उपस्थित थे और जान कर बहुत अच्छा लगा कि वो बतकही नाम से अपना ब्लाग चलाते हैं
    इधर सब विशिष्ठ सुधी जनों का सम्मान समारोह चल रहा था और सभाग्रह के दूसरे कोने में बैठे शैलेष भारतवासी लाइव वेबकास्टिंग की कमान संभाले हुए थे। श्री रवि रतलामी जी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी, श्री रवींद्र प्रभात जी , श्री अविनाश वाचस्पति जी, डॉ.अशोक मिश्रा जी, डॉ.हरीश अरोड़ा जी, डॉ.पवन अग्रवाल जी, श्री शैलेष भारतवासी जी को 'हिंदी ब्लाग भूषण' के सम्मान से नवाजा गया।

              रवि रतलामी जी ने अपने बीज भाषण में ब्लाग को आजाद अभिव्यक्ति का नया आयाम बताया। संगोष्ठी के एक दिन पहले कपिल सिब्बल के सोशल मीडिया पर सेंसर लगाने वाले विवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की इंटरनेट जैसे माध्यम पर सेंसर लाने की कोशिस दर्शाती है कि  इंटरनेट ने संप्रेशण के तरीकों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। किताबें पुरानी होने पर शायद उपलब्ध न हों पर इंटरनेट पर जो सामग्री डाल दी जाती है वो हमेशा के लिए अंकित हो जाती है और मिटाने की कोशिश करने पर भी कहीं न कहीं मिल ही जाती है।
दो क्रांतिकारी घटनाओं ने हिंदी के प्रचार और प्रसार में मील के पत्थर का काम किया है- इंटरनेट और यूनीकोड का अविश्कार्। यूनीकोड का फ़ायदा अब 300 भाषाएं उठा रही हैं और उसके द्वारा 60 भाषाओं का अनुवाद करना संभव हो सका है।
हिंदी ब्लोगिंग के इतिहास के बारे में बताते हुए उन्हों ने बताया कि श्री विनय जैन ने अपने अंग्रेजी चिठ्ठे में पहली हिंदी पोस्ट 19 अक्टोबर 2002 में की थी और 21एप्रिल 2003 को श्री आलोक कुमार जी ने 'नौ दो ग्यारह:9211' नाम से अपना पहला हिन्दी चिठ्ठा बनाया था।  
इसके साथ ही रवि जी ने ब्लोगिंग के कई फ़ायदे और नुकसान, ब्लाग पर क्या क्या किया जा सकता है, कितने प्रकार के चिठ्ठे चल रहे हैं, किन चिठ्ठों पर आप अपने प्रश्न पूछ सकते हैं और तुंरत जवाब पा सकते हैं,कौन कौन से पुरस्कार ब्लाग जगत में उपलब्ध है, इन सब की विस्तृत जानकारी दी। उन्हों ने इस विश्वास के साथ अपना भाषण समाप्त किया कि आने वाले समय में बहुत जल्द भारत में सभी हिंदी भाषी ब्लागर  होगें या दूसरों के ब्लाग पढ़ रहे होगें । अगर हिंदी ब्लोगिंग का इतिहास सिर्फ़ सात साल पुराना है और हम उस पर शैक्षणिक तौर पर चर्चा करने जमा हुए हैं जिसमें  हिंदी ब्लागर भी शामिल हैं तो ब्लागिंग का भविष्य बहुत उज्जवल है। उन्होने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि ब्लागिंग को देश की बेहतरी के लिए काम करना होगा, तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी।

राम जी तिवारी जी ने अपने भाषण में इस बात पर जोर दिया कि ब्लागिंग  हिंदी साहित्य में एक नया आयाम जोड़ेगी लेकिन इस बात पर भी जोर दिया कि यह  सिर्फ़ एक साधन है और किसी भी साधन का उपयोग तभी सार्थक होता है जब उसके पीछे विवेक हो, साधन महत्त्वपूर्ण नहीं है उसके पीछे छुपे उद्देश्य महत्तवपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हिंदी के अध्यापक नयी तकनीकी की उपेक्षा नहीं कर सकते नहीं तो जाहिल कहलायेगें। हमें इस नयी तकनीक में खुद भी माहिर होना है और इसे अपनी अपनी कक्षाओं में अपने छात्रों तक भी ले जाना है।ब्लाग जनतंत्र को बरकरार रखने के लिए जरूरी है।  विदेशों में शिक्षक चॉक और ब्लैक बोर्ड का इस्तेमाल नहीं करते सब काम लेपटॉप पर होता है, इस तरह शिक्षक को एक क्षण के लिए भी छात्रों को अपनी पीठ नहीं दिखानी पड़ती। उन्हों ने सभी आये अध्यापकों से अनुरोध किया कि वो भी अपने अपने महाविद्यालय में ब्लागिंग पर चर्चा सत्र का आयोजन करें।
       राजमणि त्रिपाठी जी ने कुछ कुछ वही बात कहते हुए कहा कि ब्लाग लेखन समाज को दिशा दे, भड़काऊ न हों। ब्लाग  पर लिखने के लिए किसी संपादक की चापलूसी नहीं करनी पड़ती, पर इस नयी स्वतंत्रता के साथ साथ अपनी जिम्मेदारियों का भी ख्याल रखें। कुछ ऐसा लिखें जिससे नयी स्फ़ूर्ति, नयी उत्तेजना जाग्रत हो। राजमणी जी पत्रकार होने के साथ साथ खुद भी एक ब्लागर हैं, उनके ब्लाग  का नाम है 'प्रयोग से' इस पर वो ज्यादातर आध्यात्मिक पोस्टें डालते हैं।

  डॉ. विद्याबिंदु सिंह जी ने कहा कि उन्हें ब्लागिंग के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और वो यहां एक छात्रा के रूप में आयी हैं। लेकिन उन्हों इस बात पर जोर दिया कि अगर हिंदी को रोजी रोटी के जुगाड़ से जोड़ना है तो इसे नयी तकनीकी विधा को  साथ जोड़ना ही होगा ।

डॉ.दामोदर खडसे- कार्याध्यक्ष,महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने कहा कि हमारा देश रुढ़िवादी देश है और हम आसानी से किसी बदलाव को स्वीकार नहीं करते, लेकिन बदलाव तो शाश्वत है और उसे रोका नहीं जा सकता। किसी भी मील के पत्थर पर कोई पीढी बैठी नहीं रहती, अगले मील के पत्थर पर चली जाती है। इसी प्रकार नयी पीढी ने कंप्युटर को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है और अगर हम अध्यापक कंप्युटर की दुनिया से अनभिज्ञ रह गये तो पीछे छूट जायेगें। बदलाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा पहले कंप्युटर कक्ष के बाहर लिखा रहता था ' जूते यहां उतारें'  और आज जूतों की दुकान में भी कंप्युटर लगे हैं।
        एक और उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वो जब अपने एक मित्र के घर विदेश गये तो देखा वहां सुबह अखबार नहीं आता। जब उन्हों ने इसके बारे में पूछा तो मित्र ने बताया कि प्रिंट रुप में अखबार मंहगा मिलता है और विदेश में पुराने अखबार को रद्दी में बेचने की सुविधा भी नहीं है और उनके मित्र सभी मनचाहे अखबार अब इंटरनेट पर ही पढ़ लेते हैं। तो इंटरनेट सिर्फ़ संप्रेषण का माध्यम ही नहीं बल्कि पढ़ने का भी माध्यम है। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि यूनीकोड विकसित करने में अशोक चक्रधर और विजय मल्होत्रा का बहुत बड़ा योगदान रहा है और अब सी डेक ने श्रुत लेखन के लिए भी सोफ़्टवेयर तैयार कर दिया है जिससे आप को अगर हिंदी में टंकन करना न आता हो तो भी आप बोलकर कंप्युटर पर टंकन कर सकते हैं। इसके अलावा फ़ोनेटिक कीबोर्ड भी ने पर उपलब्ध हैं। उन्होंने मनीष को बधाई दी कि संगोष्ठी में पढ़े जाने वाले प्रपत्र पहले ही किताब रुप में पब्लिश किये जा चुके हैं।
      प्रथम सत्र में मंचासीन हुए विशेषज्ञ के रुप में  श्री अविनाश वाचस्पति दिल्ली से, श्री रवीन्द्र प्रभात जी लखनऊ से, अध्यक्ष के रूप में पत्रकार श्री आलोक भट्टाचार्य जी मुंबई से, प्रपत्र वाचक - डा पवन अग्रवाल लखनऊ से, डा शशि मिश्रा , डा संगीता सहजवानी और श्री नरेंद्र नारायण प्रभू मुंबई से।
         श्री नरेंद्र प्रभू मराठी में ब्लागिंग करते हैं। उन्होने अपने प्रपत्र में कहा कि मराठी संसार में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 15वें स्थान पर है और मराठी में ब्लागिंग की शुरुवात यूनीकोड आने के बाद हुई। हिंदी ही की तरह मराठी में भी मराठी ब्लोग्स के एग्रिगेटर हैं जिनमें से मुख्य हैं मराठी सूची, मराठी ब्लोग जगत, नेट्वेट। इसी प्रकार मराठी में भी टेकनालोजी से संबधित ब्लाग हैं, मराठी साहित्य जो प्रिंट रुप में है उसे ब्लाग पर भी डाला जा रहा है जैसे मराठी कथाओं का संग्रह ब्लाग पर डाला गया और उस पर लाखों टिप्पणियां प्राप्त हो रही हैं। युवाओं के लिए कैरियर मार्गदर्शन पर आधारित ब्लाग हैं, कथाकार, नाटककार, कवियों के अलावा कई वैज्ञानिक भी ब्लागिंग में सक्रियहैं। हिंदी ही की भांति मराठी ब्लाग  मीट भी होते हैं, यहां तक कि मीट साल में दो बार होगें एक पूना में और एक बम्बई में ये पहले से सुनियोजित है। मराठी ब्लागर महेंद्र कुलकर्णी इस आयोजन में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। मराठी में 3000 से ज्यादा ब्लागर  नियमित रुप से लिख रहे हैं। प्रभू जी ने माना कि ब्लाग टेकनोलोजी का दिया हुआ सबसे अनमोल उपहार है।
       डॉ. संगीता सहजवानी जी बम्बई स्थित नेशनल कॉलेज के हिंदी विभाग की भूतपूर्व अध्यक्षा हैं। उन्होंने ब्लाग को अंतरराष्ट्रीय चौपाल कहा। उन्होंने ब्लाग क्या होता है, कितने प्रकार के होते हैं, ब्लाग बनाने के लिए कौन कौन प्लेटफ़ॉर्म देते हैं और इस व्यवसाय में किस की कितनी बाजार में हिस्सेदारी है ये आकड़े देते हुए उन्हों ने संतोष व्यक्त किया कि हिंदी ब्लाग बड़े तेज गति से ब रहे हैं। लेकिन फ़िर इस बात पर भी प्रकाश डाला कि अपने ब्लाग पर पाठक खींचने के लिए किन तरकीबों का इस्तेमाल करना चाहिए। ब्लाग  की सदुपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने अंत में कहा ब्लॉग हमें वास्तव में यूनिवर्सल नागरिक बना देता है।

          डॉ. शशि मिश्रा जी ने कहा कि इस संगोष्ठी में प्रपत्र पढ़ने का न्यौता पाने के बाद उन्होंने जानने की कोशिश की कि ये ब्लाग है किस    चिड़िया का नाम ? इस चिड़िया से आमना सामना करने की लालसा में अंतर्मन के विश्वजाल में घूम आयीं । इस नयी दुनिया में घुसते ही उन्हें ऐसे ऐसे शब्द सुनने को मिले जो उन्होंने अपने बचपन में सिर्फ़ अपने आंगन में सुने थे और पिछले कई दशकों से वो शब्द उनकी साहित्यिक दुनिया से भी गायब थे। उन्हें लगा कि उनका बचपन लौट आया। कई ब्लागरों के ब्लाग उन्हें बहुत भाये और उन्होंने विभिन्न ब्लागरों की कविताओं को उद्धृत किया। उन्हों ने कहा कि ब्लाग  की सबसे आकर्षक बात है -उसका सहज होना- टटके अनुभव की टटकी बातें, ताजातरीन स्थितियों की ताजी बयार्। आत्मा को संबोधित करती आत्मीय बातें
       कुछ महिला ब्लागरों  के ब्लॉग पर जाना भी उन्हें रोमांचित कर गया जैसे स्वप्न मंजुषा, अदा, रश्मि प्रभा, रचना त्रिपाठी, फ़ौजिया रियाज, वाणी शर्मा,कविता वाचक्नवी, अमरजीत कौर, सुषमा सिंह इत्यादि। उन्होंने कहा कि ज्यादा तर महिलाएं 2007 से ब्लाग जगत में सक्रिय हुई हैं । वर्तमान समय में जो महिलाएं अच्छा लिख रही हैं उनके नाम कुछ इस प्रकार लिए- घुघूती वासूती, प्रत्यक्षा, नीलिमा, बेजी, संगीता पुरी, लवली, पल्लवी त्रिवेदी, अदा, सीमा गुप्ता, निशा,स्वप्नदर्शी, अराधना, मीनू खरे,अनीता कुमार, मुक्ति, शमा, इत्यादि।
      उनका मानना था कि मानवता के विकास की कहानी के मील का पत्थर कोई महत्त्वकांशी ही कर सकता है इस लिए आज का उदघोष होना चाहिए ' जय असंतोष' और इसीलिए अंत में उन्होंने कहा 'जुटाया है साहस मैं ने धीरे धीरे, खुल रहे हैं मेरे ब्लाग के पर धीरे धीरे'

          डा पवन अग्रवाल रवि रतलामी जी के बहुत बड़े प्रशंसक निकले। उन्होंने अपने प्रपत्र पढ़ने से पहले कहा कि मेरे लिए बम्बई आने का आकर्षण सिर्फ़ इसलिए था कि मुझे पता चला कि रवि रतलामी जी इस संगोष्ठी में आ रहे हैं, मुझे उनसे बात करने को न भी मिलता और मैं सिर्फ़ उन्हें देख भर पाता तो भी मेरा यहां आना सफ़ल हो जाता। यहां आ कर मुझे न सिर्फ़ रवि जी को देखने का मौका मिला उनसे मिल कर बात करने का मौका भी मिला। पवन जी ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि वो कंप्युटर का इस्तेमाल 1996 से कर रहे हैं जब 256 वर्शन मिला करता था और पेंटियम का कहीं अता पता भी नहीं था। 2002 में उन्होंने नेट पर  बिखरे हिंदी साहित्य को ढूंढना शुरु किया और तभी उन्हें ब्लागिंग के बारे में पता चला। एक और शख्सियत जिसे वो उसी रवि रतलामी जी की श्रेणी में खड़ा पाते हैं वो हैं पूर्णिमा बर्मन्। उन्होंने सही कहा ब्लॉग का चस्का चाय और अखबार से कम नहीं होता।
       शुरुत में ब्लाग को पत्रकारिता के विकल्प के रूप में देखा जाता था लेकिन अब ब्लॉग सूचना से साहित्य तक पहुंच गया है। उन्हें इस बात का दुख है कि कुछ लोग समझते हैं कि ब्लाग पर लिखा जाने वाला साहित्य न हो कर कूड़ा करकट है। उदाहरण के रुप में हिन्दयुग्म पर होने वाले वार्षिक उत्सव का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे 2008  के ऐसे ही एक उत्सव में राजेंद्र यादव जी की एक टिप्पणी उन्हें तीर की तरह चुभी थी और उसकी चुभन उन्हें आज भी तकलीफ़ पहुंचाती है।                                                डा बलजीत श्रीवास्तव का मानना है कि हिंदी को विश्व की भाषा के रुप में स्थापित करने में इंटरनेट और खास कर ब्लागिंग का बहुत बड़ा हाथ है। इस कार्य में सरकार भी सहायता कर रही है। बहुत सारे राजनेता, अभिनेता, साहित्यकार और कई प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्ति अब ब्लागिंग की दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं।

              रवींद्र प्रभात जी ने कहा कि एक व्यक्ति कभी विश्व नहीं बन सकता पर अगर वही व्यक्ति सोशल मीडिया से और खास कर ब्लोगिंग से जुड़ जाए तो विश्व बन सकता है। अजित वेडनेकर जी का उदाहरण देते हुए उन्हों ने ब्लॉग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि कैसे राजकमल प्रकाशन ने अजीत जी की ब्लोग पोस्टों को किताब के रुप में छापा है और उन्हें सम्मान सहित एक लाख रुपये का पारितोषिक दिया गया है जो ज्ञानपीठ पुरुस्कार के बराबर है।
          रवींद्र जी ने कहा कि हर व्यक्ति का जीवन पांच '' के पीछे भागता है- पैसा, प्रसिद्धि, पद, प्रतिष्ठा और प्रशंसा। असल जीवन में ये पांच चीजें पाना पता नहीं कहां तक और कब संभव हो पाये पर ब्लोगिंग पर इन्हें जल्द पाना संभव है।
 पद: हमें नहीं पता कि असल जीवन में कोई मनुष्य चपरासी है या मैनेजर्। ब्लॉग पर हम उसे सिर्फ़ उसके लेखन से जानते हैं उसकी प्रतिभा की वजह से उसे आदर देते हैं और इस तरह वो ब्लॉग पर उस से कहीं अधिक पा जाता है जो उसका पद उसको दे सकता है।
प्रतिष्ठा: यहां ब्लॉग पर प्रतिष्ठा आप को आप की शैक्षणिक डिग्रियों से नहीं मिलती बल्कि आप की नैसर्गिक रचनात्मकता से मिलती है।
प्रशंसा: प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती। ब्लॉग पर प्रशंसा आप को त्वरित टिप्पणियों के रुप में मिल जाती है।
पैसा: अगर आप पूर्ण रुपेन ब्लॉगिंग को समर्पित हैं तो ब्लॉग से पैसा कमाना भी मुमकिन है। ऐसे हमारे सामने कई उदाहरण हैं जहाँ ब्लॉगर अपनी नौकरी छोड़ पूरी तरह से ब्लॉगिंग के जरिये ही अपनी रोजी रोटी कमा रहे हैं।
प्रसिद्धि: यहां आप अजित वेडनेकर जी का ही उदाहरण ले लीजिए। उनकी ब्लॉग पोस्टों पर आधारित किताब 'शब्दों का सफ़र' पहली हिंदी किताब है जिसकी 150 प्रतियाँ प्रिंट होने के पहले ही बिक चुकी थीं।

लेकिन फ़िर भी अभी हिंदी ब्लॉगिंगि को एक लंबा सफ़र तय करना है। इस समय लगभग पांच लाख हिंदी के ब्लॉग हैं पर उन में से सिर्फ़ चार या पांच हजार ही सक्रिय ब्लॉग हैं।
ब्लॉग लिखते समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। 

ब्लॉग की परिभाषा ब्लॉग शब्द में ही निहित है-
B-Brief - सारांश
L-Logical-तर्कसंगत
O-Operation-क्रिया
G-Genuine-वास्तविक
वास्तविक क्रिया के द्वारा तर्कसंगत तरीके से संक्षेप में विषय का सारांश प्रस्तुत करना ही ब्लॉग का पहला गुणधर्म है। ब्लॉग पर जो लिखें संक्षेप में लिखें क्युं कि हर कोई व्यस्त है और लंबी चौड़ी पोस्ट पढ़ने का वक्त नहीं। दूसरे जो भी लिखें प्रमाणिकता के साथ लिखें नहीं तो आप की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। ब्लॉगिंग करने के लिए कुछ तकनीकी जानकारी होना भी आवश्यक है और जो कुछ भी लिखें पूरी इमानदारी से लि, सामाजिक सार्थकता के लिए लिखें।
रवींद्र जी ने अपना उदाहरण देते हुए बताया कि उनका ब्लॉग 1995 में बम्बई स्थित बसंत आर्या जी ने बना कर दिया था, लेकिन बाद में उन्हों ने खुद ब्लॉगिंग करना सीखा और आज 'परिकल्पना' के 800 से ज्यादा सबसक्राइबर्स हैं।
रवींद्र जी ने अपनी बात खत्म करते हुए आशा व्यक्त की कि एक दिन भारत का हर हिंदी भाषी जो कि इस समय 121 करोड़ के करीब हैं सब का अपना ब्लॉग होगा और वो संसार में अपने सार्थक हस्तक्षेप के कारण जाने जायेगें।
श्री अविनाश जी ने जोर दिया कि ऐसे कार्यक्रम सभी कॉलेजों और स्कूलों में होने चाहियें। ब्लॉग ही है शब्दों का परमात्मा, पांचवा खंबा, और इसे स्कूल के पाठयक्रम में लगा देना चाहिए। इस से पैसों की कमाई हो न हो लेकिन प्यार की कमाई खूब होती है। उन्हें पूरा विश्वास है कि आने वाले दशक में ब्लॉग सबसे शक्तिशाली माध्यम के रूप में उभरेगा। उन्हों ने सब से अपील की कि हम ब्लॉग शब्द का उपयोग न करते हुए चिठ्ठा शब्द का इस्तेमाल करें।
श्री आलोक भट्टाचार्या जी ने कहा कि मैं बड़ी मुग्धता से देख रहा हूँ कि एक तरफ़ इस ब्लॉगजगत के निर्माता यहाँ सभाग्रह में मौजूद हैं और दूसरी तरफ़ ऐसे श्रोतागण हैं जो इस विधा से यहीं वाकिफ़ हो रहे हैं। उन्हों ने ब्लॉग को परिभाषित करते हुए कहा कि टेकनॉलोजी + आत्मा की सुंदरता = ब्लॉग्।

           आलोक जी को चिठ्ठा शब्द पर एतराज था, उन्हें ये भांडाफ़ोड़ जैसा लगता है जैसे 'मैं तेरा कच्चा चिठ्ठा खोल दूंगा'तो उन्होंने ब्लॉगर बंधुओं से इस पर विचार करने की अपील की। उन्होंने माना कि ये ब्लॉगिंग का नशा सकारात्मक नशा है।
हस्तक्षेप के संदर्भ में उन्हों ने अपनी बात ये कह कर समाप्त की  ]
' इस खामोशी की चीख सुनो
बहुत कुछ होना बाकी है
शहर का रंग लाल होने दो
जब कोई हस्तक्षेप नहीं करता
सड़क से गुजरता हुआ मुर्दा
 ये कह कर हस्तक्षेप करता है कि
आदमी मरता क्यों है '
     
   द्वितीय चर्चा सत्र
इस सत्र में हिंदी ब्लॉगिंग की उपयोगिता पर चर्चा हुई।
अध्यक्ष बने डा शीतल प्रसाद दुबे जो मुंबई विद्यापीठ में हिंदी अध्ययन मंडल के अध्यक्ष हैं। विषय विशेषज्ञ के रूप में मंच पर थे श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, लखनऊ से और शैलेष भारतवासी, दिल्ली से। विशेष अतिथि के रूप में आये थे डा अशोक कुमार मिश्र । प्रपत्र वाचक थे –डा. विभा और डा विनीता- दिल्ली से, डा ईशवर पवार-शिरूर से, डा चंद्रप्रकाश मिश्रा-दिल्ली से , श्री आशीष मोहता-कलकत्ता से, श्री मानव मिश्रा- कानपुर से।
ईश्वर प्रसाद जी ने अपना प्रपत्र शुरु करते हुए कहा' तुम हो तो ये घर लगता है वर्ना इसमें डर लगता है'
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्लॉग लेखन सिर्फ़ सूचना देने का माध्यम नहीं होना चाहिए, अगर ऐसा हुआ तो लोग ऊब जायेगें। इसके अलावा उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हर अध्यापक को अपना ब्लॉग बनाना चाहिए जिसमें छात्रों के मतलब की चीजें डालनी चाहियें । इससे छात्र पाठकों का ट्रेफ़िक ब्लॉग पर बढ़ेगा।

    डॉ.चंद्रप्रकाश मिश्र जी ने कहा असंतोष होना चाहिए। असंतोष ब्लॉग को जन्म देगा और वही क्रांती का जरिया बनेगा। हालांकि इसका अर्थ ये नहीं निकाला जाना चाहिए कि बाकी के माध्यम इस क्रांती को लाने में असमर्थ रहे हैं।लेकिन ब्लॉग लिखते समय इस बात का ध्यान रहे कि निरंकुश अभिव्यक्ति न हो, खुद ही ब्रह्म होने का अहंकार न हो, खुद ही गुरु और खुद ही चेला होना चाहिए। ललित शर्मा जी ने लिखा था 'चौथा खंबा बिक चुका है', और जनता इस बात को जानती है। इसी लिए ब्लॉग ज्यादा विश्वासनीय और सशक्त माध्यम है। ब्लॉगर्स अखबार के सही रूप दिखा रहे हैं सत्ता और व्यापार का खेल। जब जब ऐसा होता है ब्लॉगर एक क्रांति शुरु करता है और बदलाव आता है।

            आशीष मोहता ने कहा उन्हें हिंदी ब्लोगिंग में पांच साल का अनुभव है। उनका ये मानना है कि अभी तक हिंदी ब्लॉगर सिर्फ़ स्वांत सुखाय के लिए लिख रहे हैं और पेशेवर ब्लॉगरी नहीं कर रहे। पेशेवर ब्लॉगरी करने के लिए ये जरूरी है कि ब्लॉगर सोचे कि उसे ब्लॉग पर क्या करना है। ये बिल्कुल ऐसे ही है जैसे हम कैरियर प्लान करते हैं। आप के ब्लॉग पर जो भी आता है सर्च इंजिन से आता है और सभी सर्च इंजिन आप के ब्लॉग पर आते ट्रेफ़िक और आप की विशषेता पर नजर रखते हैं। हमें खुद को एक ब्रांड के रुप में प्रस्तुत करने की जरूरत है। अगर हम विविध विषयों पर लिखेगें तो लो्गों के मन में हमारी खासियत क्या है इस बात को ले कर उलझन रहेगी। इसके अलावा उन्हों ने बताया कि ब्लॉग सिर्फ़ लिख कर नहीं किया जाता और भी आयाम है, आप विडियो या ओडियो माध्यम से भी ब्लॉगिंग कर सकते हैं।

           डा विनीता ब्लॉगिंग को कलम विहीन पत्रकारिता बताया जो उपेक्षित मुद्दों को दुनिया के सामने लाने का काम करता है। ब्लॉग नयी मुक्ति है, अपना मंच है, लिखने और पढ़ने वाले के मन में कोई दलाली का भाव नहीं, रचनात्मक को अभिव्यक्ति का मुफ़्त माध्यम मिलता है और कोई बाजारवाद नहीं। आंचलिक ब्लॉगों की शुरुवात हो चुकी है। भविष्य में शोषित, पीड़ीत लोगों की आवाज के रुप में ब्लॉग उभर कर सामने आयेगा। अगर वर्तमान में ब्लॉगिंग में कोई कमी है भी तो हमें उसे नजर अंदाज कर देना चाहिए क्युं कि ब्लॉगिंग अभी अपने शैशव काल में है।
       श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी ने अपना वतव्य शुरु करते हुए इस बात पर जोर दिया कि हर बदलाव सकारात्मक है। अगर हम समुद्र से जगंल और फ़िर जंगल से समाज की ओर आने तक का सिलसिला देखें तो देखते हैं कि हर खोज इंसान की जिंदगी में बदलाव लाती है। आग की खोज हुई तो खाने पीने का तरीका बदल गया,पहिये का अविश्कार, पशुपालन, खेती करने का चलन और फ़िर औधोगिक क्रांती सभी ने हमारी जीवन शैली को बदला। पहले हम मौखिक रुप से शिक्षा प्राप्त करते थे और यादाश्त का बहुत महत्त्व था फ़िर छापाखाना आया और किताबें आ गयीं। हम पुरखों का ज्ञान सहेज कर रखने लगे और फ़िर कंप्युटर और मोबाइल आ गये। आज हम हर पल मोबाइल से दूसरों के साथ जुड़े रह सकते हैं और उस समय की जीवन शैली की कल्पना भी नहीं कर सकते जब ये साधन उपलब्ध नहीं थे। आज हमारे पास संप्रेषण के अनेक माध्यम हैं और ब्लॉग भी उनमें से एक है।
          इसके पहले एक प्रपत्र वाचक शशि मिश्रा जी ने बताया था कि पोस्टकार्ड का इंतजार और फ़िर मिलने पर उसको बारंबार पढ़ना एक अलग मजा देता था। हाँ उसका अपना एक सौंदर्य था लेकिन वो दौर ख्त्म हो गया। अब हम उस कछुआ चाल पर वापस नहीं जा सकते। आज का युग त्वरित चीजों का युग है।सौंदर्य के नये आयाम हैं जो आप पोस्टकार्ड में नहीं दिखा सकते। जैसे ब्लॉग पर आप चित्र और ध्वनी लगा कर अपने संप्रेषण का सौंदर्य बड़ा सकते हैं और ये पोस्टकार्ड से कहीं ज्यादा प्रभावकारी है।
दूसरी बात आप ब्लॉग पर क्या लिखेगें? वही जो आप के आसपास हो रहा है। अगर सभी अपने आसपास घटने वाली घटनाओं के बारे में लिख रहे हैं तो हमें जानकारी मिलती है कि कहां क्या हो रहा है। हम शायद दूसरों की मदद न कर सकें पर कम से कम अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर संतोष पा लेते हैं। उदाहरण के लिए ज्ञान जी अपने घर के पीछे बहने वाली गंगा के बारे में लिखते हैं। उस गंगा किनारे रह रहे पात्रों के साथ हम पाठक भी एक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। कभी कभी तो ब्लॉगर जो खबर देते हैं वो न्युज चैनलों से भी ज्यादा तेज होती है।
                आज कल ब्लॉग साहित्य सेवा के लिए भी उपयोग में लाये जाते हैं , उदाहरण के लिए अनूप शुक्ल जी ने रागदरबारी डाट कॉम नाम से एक ब्लॉग बना कर श्री लाल शुक्ल जी की अमर कृति नेट पर उपलब्ध करा दी। इसी प्रकार प्रेमचंद, तुलसी, सूर कबीर सभी की रचनाएं आप को नेट पर मिल जायेगीं। सरकार भी ऐसी कई योजनायें चला रही है जहां मूल प्रतिलिपियों को संजो कर नेट पर डाला जा रहा है जिस से वो अजर अमर हो जायें। पुरानी लीक छोड़ने में बहुत कुछ पीछे छूट रहा  है तो क्या? अनजान राहों पर चलने में खतरें भी होगें तो क्या चलना छोड़ दें? अगर इन अंजान राहों पर चलने के लिए हम अपने विवेक का उपयोग करेगें तो फ़ायदे ज्यादा होगें। तेज चाकू ओपरेशन भी करता है और सिर भी काटता है। हमें पूरे आशावाद और जिम्मेदारी के साथ इन क्रांतिकारी हथियारों का उपयोग करना चाहिए ताकि मनुष्य की ज्ञान पिपासा कुछ हद्द तक शांत हो सके।  
कहने का तात्पर्य ये है कि आप इतिहास में फ़िर से नहीं लौट सकते और नॉस्टालजिया आप की कोई मदद नहीं करने वाला। आगे बढ़ते रहने का नाम ही जीवन है।
ब्लॉगिंग एक बहुत बड़ा अनुष्ठान है और मुझे खुशी है कि हम इस अनुष्ठान में अपना योगदान दे पा रहे हैं।
 मैं सबसे अपील करता हूँ कि सब ब्लॉगिंग करें, ब्लॉगिंग करने के लिए ज्ञान की नहीं उत्साह की जरूरत है। हाँ अगर विषयानुसार वर्गीकरण कर लें तो और भी अच्छा होगा ।

           शैलेष भारतवासी जी ने बताया कि वेब जर्नलिस्म में ब्लॉगिंग एक विषय के रुप में पढ़ाया जाता है और धीरे धीरे अब ये छोटी कक्षाओं की तरफ़ अग्रसर है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ब्लॉगिंग करने के लिए पढ़ा लिखा होना जरूरी नहीं। अगर आप के आसपास कोई शिक्षित व्यक्ति है, कंप्युटर और नेट उपलब्ध है तो अनपढ़ व्यक्ति भी ब्लॉगिंग कर सकता है।उन्होंने माना कि इस समय हिंदी ब्लॉगिंग बहुतायत में शौकिया तौर पर की जा रही है लेकिन ये भी कहा कि अगर ब्लॉगिंग से आमदनी होने लगे तो पेशेवर ब्लॉगिंग भी होने लगेगी। उनके अनुसार ब्लॉग लिखा नहीं जाता बल्कि ये एक क्रिया है इसी कहा जाता है कि मैं ब्लॉगिंग करता हूँ, ये नहीं कहा जाता कि मैं ब्लॉग लिखता हूँ। उन्हों ने इस बात पर भी जोर दिया कि ब्लॉगिंग में क्या नहीं हो रहा इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए क्युं कि ब्लॉगिंग अभी शैशव काल में है और जैसे जैसे विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग इस से जुड़ेगें वैसे वैसे इसमें विविधता बड़ेगी। हमें पुरानी और नयी तकनीकी को साथ साथ ले कर चलना होगा।
तीसरा सत्र था 'हिंदी ब्लोगिंग के विविध आयाम'
इस सत्र के अध्यक्ष थे  मुंबई विद्यापीठ के हिंदी अध्ययन मंडल के पूर्व अध्यक्ष डा सतीश पाण्डेय्। विषय विशेषज्ञ थे दिल्ली से आये डा हरीश अरोरा और मुंबई से ही श्री अनुप सेठी। प्रपत्र वाचक थे डा अनिल सिंह-शहापुर से,डा संतोष मोटवानी-उल्हासनगर से, ,डा.रुपेश श्रीवास्तव और डा श्यामसुंदर पाण्डेय मुंबई से, डा.कामायनी सातारा से।

      डॉ.अनिल सिंह जी ने कहा कि ब्लॉग लेखन सिर्फ़ मनोरजंन की वस्तु नहीं है, इस में व्यक्ति की अपनी चितांए है, प्रेम है, हास्य है और व्यंग्य है।एक दिन ऐसा आयेगा जब ब्लॉग लेखन की वजह से सभी दूरियाँ चाहे वो वर्षगत हों या वर्ग गत  सब मिट जायेगीं।ब्लॉग लेखन आज अपने बलबूते पर बिना किसी सहारे के आगे बढ़ रहा है।
लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार ब्लॉग के अपने फ़ायदे और कमियाँ हैं हमें इन दोनों पहलुओं पर विचार करना होगा। ये एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति अपने विचार रख सकता है, इसकी कीमत भी  न के बराबर है,इसकी कोई सीमायें नहीं कोई बंधन नहीं पर इसकी मार तीखी होती है। इसी लिए ये लोगों का पसंदीदा माध्यम बन गया है। ब्लॉगिंग ने जनसंचार का चेहरा ही बदल कर रख दिया है। आने वाला कल हिंदी ब्लॉगिंग का है।
अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने कहा
' मुसाफ़िर हम तो चले जा रहे हैं,
बड़ा ही सुहाना ब्लॉग का सफ़र है,
 वो जादू है इसमें और ऐसा असर है,
जिसे देखो वही लिखे जा रहा है'
            डॉ.श्याम सुंदर पाण्डेय जी ने कहा कि वो ब्लॉगर नहीं हैं और यहां संगोष्ठी में दूसरों से चर्चा कर रहे हैं। इस चर्चा का निष्कर्ष ये निकाला कि सब में बड़ी उत्सुकता है इस नये माध्यम को ले कर और 'मीडिया का सत्यवर्धक कैपसूल है ब्लाग । यहाँ हम जो चाहें बेधड़क अनाम होकर लिख सकते हैं , जिस क्षेत्र के बारे में चाहे जानकारी हासिल कर सकते हैं, जिन्हें मदद चाहिए वो मदद मांग व पा सकते हैं जैसे अन्ना हजारे का आंदोलन्।

           ब्लॉग एक तीसरी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। ऐसे लेखक जो नकारे जाने पर दुख के सागर में गोते लगा रहे थे उनके लिए ब्लॉग वरदान साबित हो रहा है। कई प्रसिद्धि प्राप्त हस्तियां भी ब्लॉगिंग कर रहीं हैं। लेकिन मेरे मन में एक शंका है-
1.            कई बार लोग प्रसिद्धि पाने के लिए किसी भी हद्द तक गिर जाते हैं, अगर ब्लॉग पर अनाम रह कर लिखा जा सकता है तो ये एक स्वस्थ बहस का मंच तो नहीं बन सकता।
2.              एक और खतरा जो मैं देखता हूँ ब्लॉगिंग के आने से वो है भाषा कि शुद्धता पर मंडराता खतरा।
3.            तीसरा खतरा मुझे ये दिखता है कि लोग ब्लॉगिंग से दुनिया से तो जुड़ रहे हैं पर अपने आसपास के लोगों से कटते चले जा रहे हैं।
4.            एक और समस्या जो मुझे इस विधा में नजर आती है वो ये कि कभी कभी नेट पर जिन्हें विद्वान समझने की भूल कर बैठते हैं दर असल वो बहुत ही आम आदमी होते हैं।
तो ब्लॉगिंग के काफ़ी नुकसान भी हैं।
         अनुप सेठी जी ने कहा कि वो इस बात से प्रसन्न हैं कि शैक्षणिक संसार भी अब ब्लॉग जैसी विधा को अब गंभीरता से ले रहा है और इस पर चर्चायें हो रही हैं ये अच्छे ब्लॉग विधा के लिए अच्छे लक्षण हैं। अनुप जी ने अपना ब्लॉग 2003 में बनाया था लेकिन तब बहुत सक्रिय नहीं रहे थे। ब्लॉग के गुणों की चर्चा करते हुए उन्हों ने कहा कि यहां जो कुछ घटित होता है वो सब वास्तविक समय पर घटित होता है, क्षेत्रिय सीमाओं का बंधन नहीं, जनतांत्रिक है, स्वायत्त है, कोई छोटा नहीं कोई बड़ा नहीं, क्षैतिज चलता है कोई सोपान नहीं। सामाजिक शक्तियों के बंधनों को तोड़ता है और ब्लॉगिंग की ताकत है। यहां कोई छोटे बड़े का लिहाज नहीं, बहसें बदतमीजी में बदल जाती हैं, लोग मुंहफ़ट हो जाते हैं। ये सार्वजनिक अभिव्यक्ति का सहज सुलभ माध्यम है और चाहे जितने मर्जी ब्लॉग बना लो।
           लेकिन अनुप जी को लगता है कि ब्लॉगिंग अभी महंगा है और मध्यमवर्ग तक भी इसकी पैठ पूरी तरह से नहीं हो पाई है। ये अभी सिर्फ़ पढ़े लिखे लोगों तक ही सीमित है। ब्लॉगिंग करने के लिए इंटरनेट उपलब्ध होना, हिंदी में टंकन करना आना भी बहुत जरूरी है। हम सिर्फ़ उम्मीद कर सकते हैं कि ये हमेशा स्वतंत्र रहे। इस समय काफ़ी कंपनियां है जो नहीं चाहतीं कि ये जनता को मुफ़्त में उपलब्ध हो लेकिन अगर जनता का दवाब बना रहेगा तो ये माध्यम मुफ़्त और स्वतंत्र रहेगा।
            इस समय ब्लॉगों की संख्या काफ़ी ज्यादा है और बहुत सारी जानकारी मिल रही है,काफ़ी सारे अवकाश प्राप्त लोगों ने ब्लॉगिंग को अपना फ़ुल टाइम पास टाइम बना लिया है। अनुप जी ने इस बात पर जोर दिया कि ब्लॉगर को सौंदर्य बोध होना चाहिए,जैसे घर आने वाले मेहमान के स्वागत में हम घर को सजाते हैं इसी प्रकार आने वाले पाठक के स्वागत के लिए हमें अपने ब्लॉग को सजाना चाहिए। ब्लॉगर सजग व पढ़ा हुआ होना चाहिए। पढ़े हुए होने से उनका आशय था कि उसे अपने विषय का अच्छा ज्ञान होना चाहिए। उसे रंग, रेखा और शब्दों का अच्छा ज्ञान होना चाहिए।
ब्लॉग की कमियों पर नजर डालते हुए उन्हों ने कहा
1.            ब्लॉग पर अथाह भंडार उपलब्ध है और ऐसे में एग्रिगेटर की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसी प्रकार जरूरी है कि ब्लॉगों का वर्गीकरण हो- विषय आधार पर, समय आधार पर, लेखक आधार पर, इत्यादि।
2.            एक और कमी जो अनुप जी को लगी वो ये कि ज्यादातर ब्लॉगर सिर्फ़ वर्तमान के बारे में लिखते हैं लेकिन अतीत को खंगाले बिना भविष्य का नक्शा अधूरा होता है।
3.            वर्तमान में पाठकों की बहुत कमी है। जो ब्लॉगर हैं वही पाठक भी हैं। तो असली जनतांत्रिककरण कहां हुआ। ये तो पेशेवर का मामला हो गया। ये पूरी जनता के लिए नहीं रहा। जब तक ये पूरी जनता के लिए नहीं होगा तब तक इसे सोशल मीडिया का अंग कहना भी मुश्किल है।
4.            अभी का ब्लॉग लेखन उच्छंखल है, जिम्मेदारी की कमी है। जिम्मेदारी के बिना साहित्य नहीं होता। तो जो भी लिखें वो प्रामणिकता के साथ लिखें सुनी सुनाई बातों के आधार पर न लिखें।
5.            अभी ज्यादातर जो ब्लॉग पर मिलता है वो बहुत ही सतही और चालू माल है, इसमें गहराई और विस्तार लाने की जरूरत है।
6.            वर्गीकृत खोज का प्रावधान होना चाहिए।
7.            अभी ज्यादातर ब्लॉगर पत्रकार हैं। समय की मांग है कि दूसरे पेशों से जुड़े लोग भी ब्लॉगिंग में उतरें। यही नहीं छात्र भी इस माध्यम का बड़ी संख्या में उपयोग करें। हर कॉलेज के हिंदी विभाग में इंटरनेट सहित कंप्युटर मुहैया कराना चाहिए। बम्बई में 100 से भी ऊपर कॉलेज हैं अगर हर कॉलेज एक ऐसा कोश बन जाये तो ब्लोगजगत को सामग्रि उपलब्ध कराये तो ब्लोगजगत काफ़ी समृद्ध हो जायेगा।इसे सेवा का ही काम समझना चाहिए।उदाहरण के लिए अभी हाल ही में मुंबई विधापीठ में विकीस की संगोष्ठी हुई थी और ये बात सामने आयी थी कि नेट पर हिंदी में अभी भी बहुत कम सामग्री उपलब्ध है। अंग्रेजी में हर विषय पर अच्छी गुणवत्ता वाली काफ़ी सामग्री उपलब्ध है लेकिन हिंदी में नहीं। इस लिए आप जब भी लिखें अपने लेखन की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दें। अपने मन की भड़ास से ब्लॉग को न भरें।

           डॉ.हरीश अरोड़ा जी ने अपने आलेख  की शुरुवात 'चील' नामक कहानी सुनवा कर की। उन्होंने कहा अगर आप हिन्दयुग्म की साइट पर नहीं गये तो आप का हिंदी ब्लॉगजगत घूमना अधूरा है। 
         एक जमाना ऐसा था जब लेखक को छपने के लिए संपादक का मुंह देखना पड़ता था और अकसर लेखकों की रचनाएं अस्वीकार कर दी जाती थीं। ऐसा नहीं था कि वो रचनाएं गुणवत्ता में कम होती थीं बल्कि उसके भी कई और कारण होते थे। लेकिन आज ब्लॉग ने हर लेखक को आजादी दे दी है कि वो चाहे जब, जैसी रचना प्रकाशित कर सकता है और पाठक पा सकता है। हिंदी साहित्य प्रचुर मात्रा में किताबों में उपलब्ध है लेकिन उसमें से कितना पढ़ा गया है? वो सारा साहित्य शायद आम जनता तक पहुंच ही नहीं पाता। ब्लॉगिंग ने सूचनात्मकता और सृजनात्मकता को साथ ला कर खड़ा कर दिया है। आज हर विषय पर ब्लॉग पर लिखा जा रहा है। जो कुछ आप को इंटरनेट पर नहीं मिलता, ब्लॉग पर मिल जाता है।
सामने बैठे श्रोतागण अध्यपाकों का आवहान करते हुए उन्होंने कहा कि आज सभी अध्यापकों को इस नयी विधा को अपनाना होगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि उनके कॉलेज में गणित के अध्यापक ने अपना ब्लॉग बनाया है जहां वो गणित संबधित पाठयक्रम से जुड़ी जानकारी छात्रों को मुहैया कराते हैं और ये ब्लॉग वो हिंदी और अंग्रेजी दोनों में चलाते हैं। इस ब्लॉग का फ़ायदा न सिर्फ़ उनके अपने छात्र बल्कि दूसरे कॉलेजों के छात्र भी उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ब्लॉगिंग करने के लिए विषयों की कमी नहीं और हर अध्यापक की जिम्मेदारी बनती है कि वो किताबों के साथ साथ अपने विषय में ब्लॉगिंग भी करे। आखिरकार ब्लॉग भी एक पुस्तक की ही तरह है जिसके हजारों पाठक हैं। आम तौर पर जब हम पुस्तक छापते हैं तो फ़िर उसमें कोई बदलाव नहीं कर पाते पर ब्लॉग हम को ये सुविधा देता है कि हम जब चाहें टिप्पणियाँ पाने के बाद उसमें संपादन कर सकते हैं।
                आज विद्वान जनों को आम जनता के साथ जुड़ना होगा। सरकार को भी ये जिम्मा लेना होगा कि नयी तकनीक आम आदमी तक पहुंचे। ये बड़े दुख की बात है कि आज भी कई हिंदी के अध्यापक और छात्र इंटरनेट से जुड़ना नहीं चाह्ते। लेकिन अब समय आ गया है जब वो इस जरूरत को पहचाने और इंटरनेट से बड़ी संख्या में जुड़ें।
         ब्लॉगिंग की दुनिया बहुत बड़ी है, यहां अच्छी बुरी रचनाएं सभी है, एक अच्छे ब्लॉगर की पहचान ये है कि उसमें अपनी रचना की आलोचना सहने की, स्वीकार करने की क्षमता होनी चाहिए, नहीं तो ब्लॉगजगत में नहीं आना चाहिए। इस समय अंग्रेजी ब्लॉग जगत में बहुत सारी सामग्रि उपलब्ध है और कई बार हमें जानकारी लेने के लिए अंग्रेजी के दुनिया का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन अगर हम जापान की तरफ़ देखें तो जापानियों ने जापानी भाषा में ही इतने समृद्ध ब्लॉग बनाये हैं कि उन्हें तकनीकी ज्ञान के लिए भी अंग्रेजी ब्लॉगों का मुंह नहीं देखना पड़ता। अगर जापानी लोग ये कर सकते हैं तो हम हिंदी भाषी क्यों  नहीं कर सकते? सिर्फ़ मजबूत इरादों की जरूरत है। अपनी बात खत्म करते हुए उन्हों ने कहा
' अभी तो गुलिस्तां ने आंख खोली है, अभी तो वक्त लगेगा बहार आने में'   
          इसी तरह चौथे चर्चा की शुरुआत हुई । इस सत्र में प्रतिभागियों की शंकाओं का विद्वानो ने निराकरण किया। आस्ट्रेलिया से आए विभव मिश्रा ने अपनी बात रखी । केवल राम जो हिन्दी ब्लागिंग पर शोध कार्य कर रहे हैं , ने भी अपनी बात विस्तार से रखी ।
           समापन सत्र में कई प्रतिभागियों ने अपने अभिमत दिये । सभी ने संगोस्ठी के सफल आयोजन के लिए महाविद्यालय की प्राचार्या और संयोजन समिति को बधाई दी। इसी सत्र में प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए । इस तरह विश्व विद्यालय अनुदान आयोग संपोषित यह दो दिवसीय संगोस्ठी बड़े अच्छे माहौल के साथ संपन्न हुई । इस संगोस्ठी की मुख्य उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं
1-  हिन्दी ब्लागिंग पर किताब का प्रकाशन ।
2-  पूरी संगोस्ठी का वेब –कास्टिंग के जरिये पूरी दुनिया में लाइव टेलिकास्ट किया गया ।
3-  इस राष्ट्रीय संगोस्ठी में विदेशों से भी कुछ प्रतिभागी सम्मिलित हुए ।
4-  हिन्दी ब्लागरों और प्राध्यापकों को एक मंच पर लाया गया ।
5-  उच्च शिक्षा में तकनीक की उपयोगिता को सिद्ध किया गया ।
      इस तरह एक सार्थक राष्ट्रीय संगोष्ठी यू.जी.सी. के सहयोग से संपन्न हुई ।

                                                          प्राचार्या
                                                     डॉ. अनिता मन्ना 


संयोजक
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
प्रभारी-हिन्दी विभाग
मो -8080303132, 9324790726


                        

Wednesday, July 17, 2013

जैनेंद्र कुमार

                                           जैनेंद्र कुमार

                                                  
कौड़ियागंज, अलीगढ़ में 2 जनवरी, 1905 को जन्मे जैनेंद्र ने बाल्यावस्था से ही अलग तरह का जीवन जिया। इनके मामा ने हस्तिनापुर में गुरुकुल स्थापित किया था, वहीं इनकी पढ़ाई भी हुई। दो वर्ष की आयु में ही पिता को खो चुके थे जैनेंद्र। जैनेंद्र तो बाद में बने, आपका मूलनाम आनंदीलाल था। उच्च शिक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई। 1921 में पढ़ाई छोड़कर असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 1923 में राजनैतिक संवाददाता हो गए। ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। छूटने के कुछ समय बाद लेखन प्रारंभ।
उपन्यास 'परख' से सन्‌ 1929 में पहचान बनी। 'सुनीता' का प्रकाशन 1935 में हुआ। 'त्यागपत्र' 1937 में और 'कल्याणी' 1939 में प्रकाशित हुए। 1929 में पहला कहानी-संग्रह 'फांसी' छपा। इसके बाद 1930 में 'वातायन', 1933 में 'नीलम देश की राजकन्या', 1934 में 'एक रात', 1935 में 'दो चिड़ियां' और 1942 में 'पाजेब' का प्रकाशन हुआ। अब तो 'जैनेंद्र की कहानियां' सात भागों उपलब्ध हैं।
उनके अन्य महत्वपूर्ण उपन्यास हैं- 'विवर्त,' 'सुखदा', 'व्यतीत', 'जयवर्धन' और 'दशार्क'
'प्रस्तुत प्रश्न', 'जड़ की बात', 'पूर्वोदय', 'साहित्य का श्रेय और प्रेय', 'मंथन', 'सोच-विचार', 'काम और परिवार', 'ये और वे' इनके निबंध संग्रह हैं। तालस्तोय की रचनाओं का इनका अनुवाद उल्लेखनीय है। 'समय और हम' प्रश्नोत्तर शैली में जैनेंद्र को समझने की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुस्तक है। आपका निधन 24 दिसंबर सन्‌1988 को हुआ।जैनेन्द्र अपने पथ के अनूठे अन्वेषक थे। उन्होंने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ के मार्ग को नहीं अपनाया, जो अपने समय का राजमार्ग था। लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं थे, जैसा कि बहुत से समीक्षक सिद्ध करते रहे हैं; वे प्रेमचन्द के पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है। जैनेन्द्र का सबसे बड़ा योगदान हिन्दी गद्य के निर्माण में था। भाषा के स्तर पर जैनेन्द्र द्वारा की गई तोड़-फोड़ ने हिन्दी को तराशने का अभूतपूर्व काम किया। जैनेन्द्र का गद्य न होता तो अज्ञेय का गद्य संभव न होता। हिन्दी कहानी ने प्रयोगशीलता का पहला पाठ जैनेन्द्र से ही सीखा। जैनेन्द्र ने हिन्दी को एक पारदर्शी भाषा और भंगिमा दी, एक नया तेवर दिया, एक नया `सिंटेक्स' दिया। आज के हिन्दी गद्य पर जैनेन्द्र की अमिट छाप है।--रवींद्र कालिया[5] जैनेंद्र के प्रायः सभी उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेश से दूरूहता आई है परंतु ये सारे तत्व जहाँ-जहाँ भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहाँ वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से अप्रभावित लगते हैं और अपनी अंतर्मुखी गतियों से संचालित। उनकी प्रतिक्रियाएँ और व्यवहार भी प्रायः इन्हीं गतियों के अनुरूप होते हैं। इसी का एक परिणाम यह भी हुआ है कि जैनेंद्र के उपन्यासों में चरित्रों की भरमार नहीं दिखाई देती। पात्रों की अल्पसंख्या के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है।
क्रांतिकारिता तथा आतंकवादिता के तत्व भी जैनेंद्र के उपन्यासों के महत्वपूर्ण आधार है। उनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति में आस्था रखते हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना लिए होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेमविषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल बन जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्रायः उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं। उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन जैनेंद्र कर सके हैं। 'सुनीता', 'त्यागपत्र' तथा 'सुखदा' आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुज़रे हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आल्हादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।



Thursday, February 21, 2013

हिंदी - विभाग मुख्य दस्तावेज़ अनुक्रम फ़ाईल


हिंदी - विभाग
मुख्य दस्तावेज़ अनुक्रम फ़ाईल
अनुक्रमांक
फ़ाईल क्र.
संबंधित फ़ाईल का विषय
1
1
मुख्य दस्तावेज़ अनुक्रम फ़ाईल
2
2
पाठ्यक्रम फ़ाईल
3
3
प्रश्न पत्र फ़ाईल
4
4
प्राध्यापक आत्म वृत्त फाईल
5
5
कार्यशाला / संगोष्ठी / परिसंवाद फ़ाईल
6
6
विद्यार्थी उपस्थिति फ़ाईल
7
7
वार्षिक अध्यापन / पाठ्यक्रम नियोजन फ़ाईल
8
8
नोटिस / मीटिंग / पालक मीटिंग फ़ाईल
9
9
सरल हिंदी पाठ्यक्रम फ़ाईल
10
10
हिंदी साहित्य मंडल फ़ाईल
11
11
स्वीकृत शोध प्रबंध / शोध प्रकल्प  कार्य फ़ाईल
12
12
विभागीय कार्यभार संबंधित फ़ाईल
13
13
पत्राचार / सर्कुलर संबंधी फ़ाईल
14
14
विभागीय / व्यक्तिगत प्रकाशन संबंधी फ़ाईल
15
15
परीक्षा परिणाम संबंधी फ़ाईल
16
16
विभागीय पुस्तकालय / पुस्तक सूची फ़ाईल
17
17
विभागीय ब्लाग / वेबसाईट / ई मेल एवं तकनीक संबंधी फ़ाईल

Thursday, November 1, 2012

international hindi conference 2013


International Conference on WEB MEDIA AND GLOBAL SCENARIO OF HINDI


11th 12th JANUARY 2013
International Conference on
WEB MEDIA AND GLOBAL SCENARIO OF HINDI


HINDI DeptOf   K.M.AGRAWAL COLLEGE OF ARTS, COMMERCE & SCIENCE, KALYAN (WEST), DIST. THANE, MAHARASHTRA, INDIA   (www.kmagrawalcollege.org)  Is organising UGC Sponsored Two Day International Conference on WEB MEDIA AND GLOBAL SCENARIO OF HINDI , 11th-12th January  2013.  
HINDI   is the official language of the conference but one can present his paper in ENGLISH and MARATHI   also.  We welcome paper submissions. Prospective authors are invited to submit full (and original research) papers which is NOT submitted/published/under consideration anywhere in other conferences/journal.
Call for Papers
2013 International Conference on WEB MEDIA AND GLOBAL SCENARIO OF HINDI is the premier forum for the presentation of new advances and research results in the fields of theoretical, experimental, and applied approach in Media and Technology. The conference will bring together leading researchers, engineers, Bloggers, Journalists, Technicians   and scientists in the domain of interest from around the world. Topics of interest for submission include, but are not limited to:

Media and internet
Personal journalism and web media
Web media and Hindi
Contribution of web media in the development of Hindi
Development of internet in India
Web media and social networking sites
Democracy and web media
Web media and NRI Indians
Hindi blogging
Status of Hindi on internet
Technology related to the development of Hindi
Research related to Hindi technology
Research related to Hindi blogging
Hindi and web journalism
E magazines/ journals of Hindi
Role of internet in Hindi teaching-learning
Software’s related to Hindi languages
Hindi typing tools
Web media and social responsibilities
History of social networking sites
Control on web media 
Internet and copyright
Web media and Hindi literature
Web media and employment
Theories related to web media













All papers will be published in book form with ISBN NO. Last date of sending paper is 10th November 2012.Though one can present his/her paper in Hindi/Marathi/English but for the publication only articles in Hindi will be considered. 
Important Dates :- 
Paper Submission (Full Paper)                                                    Before November 10, 2012
Notification of Acceptance                                                           on November 30, 2012
Final Paper Submission                                                              before December 05 , 2012
Authors' Registration                                                                   before December 15, 2012
 Conference Dates                                                     January 11th-12th, 2013  

SUBMISSION METHODS:

1. Electronic Submission System; ( .pdf) and word both .
(use only unicode/Mangal for hindi & marathi article)

2. Email: manishmuntazir@gmail.com( .pdf and .doc)

Registration
 Registration Fee
You can send your registration fees by cheque/D.D. in the favour of
THE PRINCIPAL, K.M.AGRAWAL COLLEGE, KALYAN(W)

Authors/participants  from Mumbai: 600 rupees /
Authors/ participants  (Student) from Mumbai:   300 rupees /
Authors/participants  (out station):    1500 rupees /( including accommodation and food ) 
Additional Paper (s):       500 rupees /

AUTHORS REGISTRATION FEE INCLUDES:

Participation in the technical program
Lunch
Badge/ folder /seminar kit
Conference document (proceedings on book)
Coffee breaks
Welcome reception

CONTACT PERSON
DR. Manish Kumar Mishra
8080303132

Tuesday, October 30, 2012

वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश्य


 मित्रों ,
सादर नमस्कार . 
विश्व विद्यालय अनुदान आयोग और के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय , कल्याण , महाराष्ट्र के संयुक्त तत्वावधान में आगामी 11- 12 जनवरी 2013 को दो दिवसीय 

अंतर्राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया जा रहा है । परिसंवाद का मुख्य विषय है -

 वेब मीडिया और हिंदी का वैश्विक परिदृश्य - . आप 

अपने आलेख यूनिकोड में 10 नवंबर 2012 तक भेज सकते हैं । आप के आलेख को पुस्तकाकार

 रूप में प्रकाशित किया जाएगा ।  आप का आलेख पुस्तक के लिए महत्वपूर्ण 
है , आप से अनुरोध 
 है क़ि 
आप अपना आलेख भेज कर इस प्रकाशन कार्य में सहयोग दें .  . 
आलेख के लिए कुछ उप विषय इस प्रकार हैं -


मीडिया का बदलता स्वरूप और इन्टरनेट

व्यक्तिगत पत्रकारिता और वेब मीडिया

वेब मीडिया और हिंदी

हिंदी के विकास में वेब मीडिया का योगदान

भारत में इन्टरनेट का विकास

वेब मीडिया और शोसल नेटवरकिंग साइट्स

लोकतंत्र और वेब मीडिया

वेब मीडिया और प्रवासी भारतीय

हिंदी ब्लागिंग स्थिति और संभावनाएं

इंटरनेट जगत में हिंदी की वर्तमान स्थिति

हिंदी भाषा के विकाश से जुड़ी तकनीक और संभावनाएं

इन्टरनेट और हिंदी ; प्रौद्योगिकी सापेक्ष विकास यात्रा

व्यक्तिगत पत्रकारिता और ब्लागिंग

हिंदी ब्लागिंग पर हो रहे शोध कार्य

हिंदी की वेब पत्रकारिता

हिंदी की ई पत्रिकाएँ

हिंदी के अध्ययन-अध्यापन में इंटरनेट की भूमिका

हिंदी भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण साफ्टव्येर

हिंदी टंकण से जुड़े साफ्टव्येर और संभावनाएं

वेब मीडिया , सामाजिक सरोकार और व्यवसाय

शोसल नेटवरकिंग का इतिहास

वेब मीडिया और अभिव्यक्ति के खतरे

वेब मीडिया बनाम सरकारी नियंत्रण की पहल

वेब मीडिया ; स्व्तंत्रता बनाम स्वछंदता

इन्टरनेट और कापी राइट

वेब मीडिया और हिंदी साहित्य

वेब मीडिया पर उपलब्ध हिंदी की पुस्तकें

हिंदी वेब मीडिया और रोजगार

भारत में इन्टरनेट की दशा और दिशा

हिंदी को विश्व भाषा बनाने में तकनीक और इन्टरनेट का योगदान

बदलती भारती शिक्षा पद्धति में इन्टरनेट की भूमिका

लोकतंत्र , वेब मीडिया और आम आदमी

सामाजिक न्याय दिलाने में वेब मीडिया का योगदान

भारतीय युवा पीढ़ी और इन्टरनेट

वेब मीडिया सिद्धांत और व्यव्हार


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डॉ मनीष कुमार मिश्रा
अध्यक्ष - हिंदी विभाग
के . एम . अग्रवाल महाविद्यालय 421301
गांधारी विलेज, पडघा रोड , कल्याण - पश्चिम
महाराष्ट्र
8080303132
manishmuntazir@gmail.com
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साक्ष्य-आधारित अकादमिक आलेख हिन्दी विभाग की पाँच वर्षीय अकादमिक यात्रा: संस्थागत नवाचार, साहित्यिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय विस्तार

 साक्ष्य-आधारित अकादमिक आलेख हिन्दी विभाग की पाँच वर्षीय अकादमिक यात्रा: संस्थागत नवाचार, साहित्यिक विमर्श और अंतरराष्ट्रीय विस्तार अकादमिक ...