Tuesday, August 24, 2021

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती - सोहनलाल द्विवेदी SYBA

 



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लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

सोहनलाल द्विवेदी का जन्म फतेहपुर जिले के बिंदकी गांव में हुआ। इन्होंने हिंदी में एम.ए. किया तथा संस्कृत का भी अध्ययन किया। इन्होंने आजीवन निष्काम भाव से साहित्य सर्जना की। द्विवेदीजी गांधीवादी विचारधारा के प्रतिनिधि कवि हैं। ये अपनी राष्ट्रीय तथा पौराणिक रचनाओं के लिए सम्मानित हुए। इनके मुख्य काव्य-संग्रह हैं- 'भैरवी, 'वासवदत्ता, 'पूजागीत, 'विषपान और 'जय गांधी। इनके कई बाल काव्य संग्रह भी प्रकाशित हुए, जिनमें ’दूध-बतासा’ उल्लेखनीय है।। ये 'पद्मश्री अलंकरण से सम्मानित हुए। महात्मा गाँधी न केवल उनके काव्यादर्श थे,अपितु पराधीन भारत की राष्ट्रीय आशाओं-आकांक्षाओं के एकमात्र प्रतीक थे। उनका काव्यपाठ भी बहुत ओजस्वी होता था। उनका 'खादीगीत' पार्षदजी के झंडागीत के साथ गाया जाता था। एक बार वे बिंदकी में ही थे कि मीडिया में उनकी मृत्यु का समाचार आ गया।देश भर में बहुत बावेला मचा था। उनके संलग्न गीत को भी बच्चन जी का गीत कहकर प्रचारित किया गया था ,लेकिन जब तथ्य सामने आया ,तो दावा करनेवालों को माफी मांगनी पडी। उनका लम्बा गीत 'ऐ लाल किले पर झंडा फहरनेवालों /सच कहना कितने साथी साथ तुम्हारे हैं।' प्रधानमंत्री नेहरू की रीति- नीति पर सीधा प्रहार है।

जन्म22 फ़रवरी 1906
 निधन01 मार्च 1988
 जन्म स्थानग्राम बिन्दकी, फ़तेहपुर, उत्तर प्रदेश, भारत
 कुछ प्रमुख कृतियाँ
भैरवी, वासवदत्ता, पूजागीत, विषपान, जय गांधी।

वह तोड़ती पत्थर - व्याख्यान


 

Sunday, August 22, 2021

‘वह तोड़ती पत्थर’ कविता की व्याख्या SYBA PAPER - II

 

https://www.dccp.co.in/blog/2020/10/%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%B0-%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A4-%E0%A4%A4/

तोड़ती पत्थर’ कविता की व्याख्या

वह तोड़ती पत्थर ;

देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर

वह तोड़ती पत्थर

नहीं छायादार

पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार ;

श्याम तन भर बंधा यौवन,

नत-नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,

गुरु हथौड़ा हाथ,

करती बार-बार प्रहार

सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार | (1)

चढ़ रही थी धूप,

गर्मियों के दिन,

दिवा का तमतमाता रूप,

उठी झुलसाती हुई लू,

रुई चिनगी छा गई ;

प्राय: हुई दुपहर

वह तोड़ती पत्थर | (2)

देखते देखा, मुझे तो एक बार

उस भवन की ओर देखा, छिन्न-तार ;

देख कर कोई नहीं,

देखा मुझे उस दृष्टि से,

जो मार खा रोई नहीं ;

सजा सहज सितार,

सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार |

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,

ढुलक माथे से गिरे सीकर,

लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा –

“मैं तोड़ती पत्थर” | ( 3)

प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता “तोड़ती पत्थर” से लिया गया है | इस कविता के रचयिता प्रसिद्ध छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ जी हैं | इस कविता में कवि ने इलाहाबाद की सड़क के किनारे तपती धूप में पत्थर तोड़ती हुई एक श्रमिक महिला का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है |

व्याख्या – कवि कहता है कि उसने इलाहाबाद के पथ पर एक श्रमिक महिला को पत्थर तोड़ते हुए देखा था | वह नारी तपती हुई भयंकर धूप में पत्थर तोड़ रही थी | जिस स्थान पर वह पत्थर तोड़ रही थी उस स्थान पर कोई छायादार पेड़ नहीं था जिसकी छाया का वह आश्रम ले सकती | उसका शरीर साँवला और स्वस्थ था | वह भरपूर यौवन से युक्त थी | उसकी आंखें नारी सुलभ लज्जा से झुकी हुई थी और वह पूर्ण निष्ठा से अपने प्रिय कार्य अर्थात पत्थर तोड़ने में निमग्न थी | उसके हाथ में एक भारी हथौड़ा था जिससे वह पत्थरों पर बार-बार चोट कर रही थी | जहां वह कार्य कर रही थी उसके सामने पेड़ों की पंक्ति, विशाल भवन एवं उनकी चारदीवारी थी | (1)ग्रीष्म ऋतु का समय था | दिन चढ़ने के साथ-साथ धूप भी तेज होती जा रही थी | दिन अधिक गर्मी के कारण तमतमा रहा था |शरीर को झुलसा देने वाले गर्म हवाएँ चल रही थी | पृथ्वी गर्मी के कारण ऐसे जल रही थी मानो रुई जल रही हो | लगभग दोपहर का समय हो गया था | भयंकर गर्मी पड़ रही थी ऐसे में वह श्रमिक महिला पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही थी | (2)

कवि कहता है कि इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ने का कार्य कर रही उस युवती ने जब मुझे अपनी ओर ताकते हुए देखा तो उसने बड़े दु:ख और हताशा के साथ एक बार सामने खड़े भवन की ओर देखा | उसने उस भवन को ऐसे देखा जैसे कुछ ना देख रही हो | उसने मुझे देखा तो मुझे उसकी दृष्टि में वह भाव नजर आया जैसे एक भय-ग्रस्त बच्चा मार खाने पर भी भय से रोता नहीं है | अपने प्रति सहानुभूति की भावना को देखकर उसकी भावनाओं की वीणा के तार झंकृत हो उठे और ऐसी ध्वनि सुनाई दी जो मैंने आज तक नहीं सुनी थी | कहने का भाव यह है कि कवि ने पीड़ा का ऐसा स्वर कभी नहीं सुना था | तभी वह युवती काँप उठी और उसके माथे से पसीने की बूंदे ढुलक कर नीचे गिर गयी | तत्पश्चात वह युवती फिर से अपने कार्य में तल्लीन हो गई | उसे पत्थर तोड़ते हुए देखकर ऐसा आभास हो रहा था मानो वह कह रही हो कि मैं पत्थर तोड़ने वाली हूँ ; यही मेरा कार्य है | कहने का अभिप्राय यह है कि वह पत्थर तोड़ने वाली स्त्री पत्थर तोड़ना ही अपनी नियति मान चुकी है | 

‘तोड़ती पत्थर’ कविता का प्रतिपाद्य / उद्देश्य या निहित संदेश

‘तोड़ती पत्थर’ निराला जी की प्रसिद्ध प्रगतिशील कविता है | इस कविता में कवि ने छायावादी आवरण से बाहर निकल कर सर्वहारा वर्ग का मार्मिक वर्णन किया है | प्रस्तुत कविता में नारी का वर्णन एक सौंदर्य-उपकरण या परंपरागत नारी सुलभ गुणों की महिमा के रूप में न करके एक पीड़ित, शोषित वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में किया गया है | निराला जी ने इस कविता में इलाहबाद के पथ पर ग्रीष्मकालीन दुपहरी में कार्यरत पसीने से तरबतर एक मजदूरिन का कारुणिक शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है | एक तरफ जहाँ इस कविता में महलों में ऐशोआराम का जीवन जी रहे धनाढ्य वर्ग की ओर संकेत किया गया है वहीं दूसरी ओर झुलसती धूप में पत्थर तोड़ती नारी की दयनीय दशा का मार्मिक चित्र अंकित किया गया है | वस्तुत: इस कविता का मुख्य उद्देश्य नारी के उस रूप को उजागर करना है जो उस समय तक साहित्य का विषय कभी न बन पाया | केवल नारी की सुंदरता का वर्णन या उसके मातृ-सुलभ रूप, पतिव्रता रूप का वर्णन ही साहित्य में मिलता था | परन्तु निराला जी ने प्रस्तुत कविता में नारी के जिस रूप का वर्णन किया है, वह साहित्य के क्षेत्र में नविन प्रयोग है | संभवतः इस प्रकार की कविताओं की रचना के माध्यम से सड़कों और खेतों में काम कर रही नारी के दुःखों को अपने साहित्य में स्थान देकर लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति जगाना ही निराला जी का मुख्य उद्देश्य था |

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला SYBA PAPER II

 https://www.hindi-kavita.com/HindiBiographySuryakantTripathiNirala.php

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिन्दी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किन्तु उनकी ख्याति विशेषरुप से कविता के कारण ही है।

जीवन परिचय

सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला मेदिनीपुर) में माघ शुक्ल ११, संवत् १९५५, तदनुसार २१ फ़रवरी, सन् १८९९ में हुआ था। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा १९३० में प्रारंभ हुई। उनका जन्म मंगलवार को हुआ था। जन्म-कुण्डली बनाने वाले पंडित के कहने से उनका नाम सुर्जकुमार रखा गया। उनके पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। वे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ाकोला नामक गाँव के निवासी थे।

शिक्षा

निराला की शिक्षा यहीं बंगाली माध्यम से शुरू हुई। हाईस्कूल पास करने के पश्चात् उन्होंने घर पर ही संस्कृत और अंग्रेज़ी साहित्य का अध्ययन किया। हाईस्कूल करने के पश्चात् वे लखनऊ और उसके बाद गढकोला (उन्नाव) आ गये। प्रारम्भ से ही रामचरितमानस उन्हें बहुत प्रिय था। वे हिन्दी, बंगला, अंग्रेज़ी और संस्कृत भाषा में निपुण थे और श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द और श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर से विशेष रूप से प्रभावित थे। मैट्रीकुलेशन कक्षा में पहुँचते-पहुँचते इनकी दार्शनिक रुचि का परिचय मिलने लगा। निराला स्वच्छन्द प्रकृति के थे और स्कूल में पढ़ने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन में उनका विशेष मन नहीं लगता था। इस कारण उनके पिता कभी-कभी उनसे कठोर व्यवहार करते थे, जबकि उनके हृदय में अपने एकमात्र पुत्र के लिये विशेष स्नेह था।

विवाह

पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में निराला का विवाह मनोहरा देवी से हो गया। रायबरेली ज़िले में डलमऊ के पं. रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी सुन्दर और शिक्षित थीं, उनको संगीत का अभ्यास भी था। पत्नी के ज़ोर देने पर ही उन्होंने हिन्दी सीखी। इसके बाद अतिशीघ्र ही उन्होंने बंगला के बजाय हिन्दी में कविता लिखना शुरू कर दिया। बचपन के नैराश्य और एकाकी जीवन के पश्चात् उन्होंने कुछ वर्ष अपनी पत्नी के साथ सुख से बिताये, किन्तु यह सुख ज़्यादा दिनों तक नहीं टिका और उनकी पत्नी की मृत्यु उनकी 20 वर्ष की अवस्था में ही हो गयी। बाद में उनकी पुत्री जो कि विधवा थी, की भी मृत्यु हो गयी। वे आर्थिक विषमताओं से भी घिरे रहे। ऐसे समय में उन्होंने विभिन्न प्रकाशकों के साथ प्रूफ रीडर के रूप में काम किया, उन्होंने 'समन्वय' का भी सम्पादन किया।

पारिवारिक विपत्तियाँ

16-17 वर्ष की उम्र से ही इनके जीवन में विपत्तियाँ आरम्भ हो गयीं, पर अनेक प्रकार के दैवी, सामाजिक और साहित्यिक संघर्षों को झेलते हुए भी इन्होंने कभी अपने लक्ष्य को नीचा नहीं किया। इनकी माँ पहले ही गत हो चुकी थीं, पिता का भी असामायिक निधन हो गया। इनफ्लुएँजा के विकराल प्रकोप में घर के अन्य प्राणी भी चल बसे। पत्नी की मृत्यु से तो ये टूट से गये। पर कुटुम्ब के पालन-पोषण का भार स्वयं झेलते हुए वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। इन विपत्तियों से त्राण पाने में इनके दार्शनिक ने अच्छी सहायता पहुँचायी।

निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई। बाद में हिन्दी संस्कृत और बाङ्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ में ही प्राप्त हुआ। उन्होंने दलित-शोषित किसान के साथ हमदर्दी का संस्कार अपने अबोध मन से ही अर्जित किया। तीन वर्ष की अवस्था में माता का और बीस वर्ष का होते-होते पिता का देहांत हो गया। अपने बच्चों के अलावा संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा। पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का भी देहांत हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गंवाया। जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में १५ अक्टूबर १९६१ को उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की।

कार्यक्षेत्र

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पहली नियुक्ति महिषादल राज्य में ही हुई। उन्होंने १९१८ से १९२२ तक यह नौकरी की। उसके बाद संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य की ओर प्रवृत्त हुए। १९२२ से १९२३ के दौरान कोलकाता से प्रकाशित 'समन्वय' का संपादन किया, १९२३ के अगस्त से मतवाला के संपादक मंडल में कार्य किया। इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका सुधा से १९३५ के मध्य तक संबद्ध रहे। १९३५ से १९४० तक का कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया। इसके बाद १९४२ से मृत्यु पर्यन्त इलाहाबाद में रह कर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया। उनकी पहली कविता जन्मभूमि प्रभा नामक मासिक पत्र में जून १९२० में, पहला कविता संग्रह १९२३ में अनामिका नाम से, तथा पहला निबंध बंग भाषा का उच्चारण अक्टूबर १९२० में मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुआ।

अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है। वे हिन्दी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं। 1930 में प्रकाशित अपने काव्य संग्रह परिमल की भूमिका में वे लिखते हैं-
मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है। जिस तरह मुक्त मनुष्य कभी किसी तरह दूसरों के प्रतिकूल आचरण नहीं करता, उसके तमाम कार्य औरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं फिर भी स्वतंत्र। इसी तरह कविता का भी हाल है।

लेखनकार्य

निराला ने 1920 ई० के आसपास से लेखन कार्य आरंभ किया। उनकी पहली रचना 'जन्मभूमि' पर लिखा गया एक गीत था। लंबे समय तक निराला की प्रथम रचना के रूप में प्रसिद्ध 'जूही की कली' शीर्षक कविता, जिसका रचनाकाल निराला ने स्वयं 1916 ई० बतलाया था, वस्तुतः 1921 ई० के आसपास लिखी गयी थी तथा 1922 ई० में पहली बार प्रकाशित हुई थी। कविता के अतिरिक्त कथासाहित्य तथा गद्य की अन्य विधाओं में भी निराला ने प्रभूत मात्रा में लिखा है।

प्रकाशित कृतियाँ

काव्यसंग्रह

अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1936), अनामिका (द्वितीय), तुलसीदास (1939), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नये पत्ते (1946), अर्चना(1950), आराधना (1953), गीत कुंज (1954), सांध्य काकली, अपरा (संचयन)

उपन्यास

अप्सरा (1931), अलका (1933), प्रभावती (1936), निरुपमा (1936), कुल्ली भाट (1938-39), बिल्लेसुर बकरिहा (1942), चोटी की पकड़ (1946), काले कारनामे (1950) {अपूर्ण}, चमेली (अपूर्ण), इन्दुलेखा (अपूर्ण)

कहानी संग्रह

लिली (1934), सखी (1935), सुकुल की बीवी (1941), चतुरी चमार (1945) सखी' संग्रह का ही नये नाम से पुनर्प्रकाशन, देवी (1948) पूर्व प्रकाशित संग्रहों से संचयन, एकमात्र नयी कहानी 'जान की !'

निबन्ध-आलोचना

रवीन्द्र कविता कानन (1929), प्रबंध पद्म (1934), प्रबंध प्रतिमा (1940), चाबुक (1942), चयन (1957), संग्रह (1963),

पुराण कथा

महाभारत (1939), रामायण की अन्तर्कथाएँ (1956)

बालोपयोगी साहित्य

भक्त ध्रुव (1926), भक्त प्रहलाद (1926), भीष्म (1926), महाराणा प्रताप (1927), सीखभरी कहानियाँ-ईसप की नीतिकथाएँ (1969)

अनुवाद

रामचरितमानस (विनय-भाग)-1948 (खड़ीबोली हिन्दी में पद्यानुवाद), आनंद मठ (बाङ्ला से गद्यानुवाद), विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नन्दिनी, राज सिंह, राजरानी, देवी चौधरानी, युगलांगुलीय, चन्द्रशेखर, रजनी, श्रीरामकृष्णवचनामृत (तीन खण्डों में), परिव्राजक, भारत में विवेकानंद, राजयोग (अंशानुवाद)

रचनावली

निराला रचनावली नाम से 8 खण्डों में पूर्व प्रकाशित एवं अप्रकाशित सम्पूर्ण रचनाओं का सुनियोजित प्रकाशन (प्रथम संस्करण-1983)

निराला भाई महादेवी वर्मा

एक युग बीत जाने पर भी मेरी स्मृति से एक घटाभरी अश्रुमुखी सावनी पूर्णिमा की रेखाएँ नहीं मिट सकी है। उन रेखाओं के उजले रंग न जाने किस व्यथा से गीले हैं कि अब तक सूख भी नहीं पाए - उड़ना तो दूर की बात है।
उस दिन मैं बिना कुछ सोचे हुए ही भाई निराला जी से पूछ बैठी थी, "आप के किसी ने राखी नहीं बाँधी?" अवश्य ही उस समय मेरे सामने उनकी बंधन-शून्य कलाई और पीले, कच्चे सूत की ढेरों राखियाँ लेकर घूमने वाले यजमान-खोजियों का चित्र था। पर अपने प्रश्न के उत्तर में मिले प्रश्न ने मुझे क्षण भर के लिए चौंका दिया।
'कौन बहन हम जैसे भुक्खड़ को भाई बनावेगी?' में, उत्तर देने वाले के एकाकी जीवन की व्यथा थी या चुनौती यह कहना कठिन है। पर जान पड़ता है किसी अव्यक्त चुनौती के आभास ने ही मुझे उस हाथ के अभिषेक की प्रेरणा दी जिसने दिव्य वर्ण-गंध-मधु वाले गीत-सुमनों से भारती की अर्चना भी की है और बर्तन माँजने, पानी भरने जैसी कठिन श्रम-साधना से उत्पन्न स्वेद-बिंदुओं से मिट्टी का श्रृंगार भी किया है।
मेरा प्रयास किसी जीवंत बवंडर को कच्चे सूत में बाँधने जैसा था या किसी उच्छल महानद को मोम के तटों में सीमित करने के समान, यह सोचने विचारने का तब अवकाश नहीं था। पर आने वाले वर्ष निराला जी के संघर्ष के ही नहीं, मेरी परीक्षा के भी रहे हैं। मैं किस सीमा तक सफल हो सकी हूँ, यह मुझे ज्ञात नहीं, पर लौकिक दृष्टि से नि:स्व निराला हृदय की निधियों में सब से समृद्ध भाई हैं, यह स्वीकार करने में मुझे द्विविधा नहीं। उन्होंने अपने सहज विश्वास से मेरे कच्चे सूत के बंधन को जो दृढ़ता और दीप्ति दी है वह अन्यत्र दुर्लभ रहेगी।
दिन-रात के पगों से वर्षों की सीमा पार करने वाले अतीत ने आग के अक्षरों में आँसू के रंग भर-भर कर ऐसी अनेक चित्र-कथाएँ आँक डाली है, जिनसे इस महान कवि और असाधारण मानव के जीवन की मार्मिक झाँकी मिल सकती है। पर उन सब को सँभाल सके ऐसा एक चित्राधार पा लेना सहज नहीं।
उनके अस्त-व्यस्त जीवन को व्यवस्थित करने के असफल प्रयासों का स्मरण कर मुझे आज भी हँसी आ जाती है। एक बार अपनी निर्बंध उदारता की तीव्र आलोचना सुनने के बाद उन्होंने व्यवस्थित रहने का वचन दिया।
संयोग से तभी उन्हें कहीं से तीन सौ रुपए मिल गए। वही पूँजी मेरे पास जमा कर के उन्होंने मुझे अपने खर्च का 'बजट' बना देने का आदेश दिया।
जिन्हें मेरा व्यक्तिगत रखना पड़ता है, वे जानते हैं कि यह कार्य मेरे लिए कितना दुष्कर है। न वे मेरी चादर लंबी कर पाते हैं न मुझे पैर सिकोड़ने पर बाध्य कर सकते हैं, और इस प्रकार एक विचित्र रस्साकशी में तीस दिन बीतते रहते हैं।
पर यदि अनुत्तीर्ण परीक्षार्थियों की प्रतियोगिता हो तो सौं में दस अंक पाने वाला भी अपने-आपको शून्य पाने वाले से श्रेष्ठ मानेगा।
अस्तु, नमक से लेकर नापित तक और चप्पल से लेकर मकान के किराए तक का जो अनुमान-पत्र मैंने बनाया वह जब निराला जी को पसंद आ गया, तब पहली बार मुझे अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान पर गर्व हुआ। पर दूसरे ही दिन से मेरे गर्व की व्यर्थता सिद्ध होने लगी। वे सबेरे ही आ पहुँचे। पचास रुपए चाहिए - किसी विद्यार्थी का परीक्षा-शुल्क जमा करना है, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा। संध्या होते-होते किसी साहित्यिक मित्र को साठ देने की आवश्यकता पड़ गई। दूसरे दिन लखनऊ के किसी तांगे वाले की माँ को चालीस मनीआर्डर करना पड़ा। दोपहर को किसी दिवंगत मित्र की भतीजी के विवाह के लिए सौ देना अनिवार्य हो गया। सारांश यह कि तीसरे दिन उनका जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया और तब उनके व्यवस्थापक के नाते यह दानखाता मेरे हिस्से आ पड़ा।
एक सप्ताह में मैंने समझ लिया कि यदि ऐसे अवढर दानी को न रोका जावे तो यह मुझे भी अपनी स्थिति में पहुँचा कर दम लेंगे। तब से फिर कभी उनका 'बजट' बनाने का दुस्साहस मैंने नहीं किया। पर उनकी अस्त-व्यस्तता में बाधा पहुँचाने का अपना स्वभाव मैं अब तक नहीं बदल सकी हूँ।
बड़े प्रयत्न से बनवाई रजाई, कोट जैसी नित्य व्यवहार की वस्तुएँ भी जब दूसरे ही दिन किसी अन्य का कष्ट दूर करने के लिए अंतर्धान हो गईं, तब अर्थ के संबंध में क्या कहा जावे जो साधन मात्र है।
वह संध्या भी मेरी स्मृति में विशेष महत्व रखती है जब श्रद्धेय मैथिलीशरण जी निराला जी का आतिथ्य ग्रहण करने गए।
बगल में गुप्त जी के बिछौने का बंडल दबाए, दियासलाई के क्षण प्रकाश क्षण अंधकार में तंग सीढ़ियों का मार्ग दिखाते हुए निराला जी हमें उस कक्ष में ले गए जो उनकी कठोर साहित्य-साधना का मूक साक्षी रहा है।
आले पर कपड़े की आधी जली बत्ती से भरा, पल तेल से खाली मिट्टी का दिया मानो अपने नाम की सार्थकता के लिए ही जल उठने का प्रयास कर रहा था। यदि उसके प्रयास को स्वर मिल सकता तो वह निश्चय ही हमें, मिट्टी के तेल की दूकान पर लगी भीड़ में सब से पीछे खड़े पर सब से बालिश्त भर ऊँचे गृहस्वामी की दीर्घ, पर निष्फल प्रतीज्ञा की कहानी सुना सकता। रसोईघर में दो-तीन अधजली लकड़ियाँ, औंधी पड़ी बटलोई और खूँटी से लटकती हुई आटे की छोटी-सी गठरी आदि मानो उपवास-चिकित्सा के लाभों की व्याख्या कर रहे थे।
वह आलोकरहित, सुख-सुविधा-शून्य घर, गृहस्वामी के विशाल आकार और उससे भी विशालतर आत्मीयता से भरा हुआ था। अपने संबंध में बेसुध निराला जी अपने अतिथि की सुविधा के लिए सतर्क प्रहरी हैं। वैष्णव अतिथि की सुविधा का विचार कर वे नया घड़ा ख़रीद कर गंगाजल ले आए और धोती-चादर जो कुछ घर में मिल सका सब तख़्त पर बिछा कर उन्हें प्रतिष्ठित किया।
तारों की छाया में उन दोनों मर्यादावादी और विद्रोही महाकवियों ने क्या कहा-सुना यह मुझे ज्ञात नहीं, पर सबेरे गुप्त जी को ट्रेन में बैठा कर वे मुझे उनके सुख-शयन का समाचार देना न भूले।
ऐसे अवसरों की कमी नहीं जब वे अकस्मात पहुँच कर कहने लगे, ''मेरे इक्के पर कुछ लकड़ियाँ, थोड़ा घी आदि रखवा दो - अतिथि आए हैं, घर में सामान नहीं है।''
'उनके अतिथि यहाँ भोजन करने आ जावें' सुन कर उनकी दृष्टि में बालकों जैसा विस्मय छलक आता है। जो अपना घर समझ कर आए हैं, उनसे यह कैसे कहा जावे कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे घर जाना होगा।
भोजन बनाने से ले कर जूठे बर्तन माँजने तक का काम वे अपने अतिथि देवता के लिए सहर्ष करते हैं। तैतीस कोटि देवताओं के देश में इस वर्ग के देवताओं की संख्या कम नहीं, पर आधुनिक युग ने उनकी पूजा-विधि में बहुत कुछ सुधार कर लिया है। अब अतिथि-पूजा के पर्व कम ही आते हैं और यदि आ भी पड़े तो देवता के अभिषेक, श्रृंगार आदि संस्कार बेयरा आदि ही संपन्न करा देते हैं। पुजारी गृहपति को तो भोग लगाने की मेज पर उपस्थित रहने भर का कर्तव्य सँभालना पड़ता है। कुछ देवता इस कर्तव्य से भी उसे मुक्ति दे देते हैं।
ऐसे युग में आतिथ्य की दृष्टि से निराला जी में वही पुरातन संस्कार है जो इस देश के ग्रामीण किसान में मिलता है।
उनके भाव की अतल गहराई और अबाध वेग भी आधुनिक सभ्यता के छिछले और बँधे भाव-व्यापार से भिन्न है।
उनकी व्यथा की सघनता जानने का मुझे एक अवसर मिला है। श्री सुमित्रानंदन जी दिल्ली में टाइफाइड ज्वर से पीड़ित थे। इसी बीच घटित को साधारण और अघटित को समाचार मानने वाले किसी समाचार-पत्र ने उनके स्वर्गवास की झूठी ख़बर छाप डाली।
निराला जी कुछ ऐसी आकस्मिकता के साथ आ पहुँचे थे कि मैं उनसे यह समाचार छिपाने का भी अवकाश न पा सकी। समाचार के सत्य में मुझे विश्वास नहीं था, पर निराला जी तो ऐसे अवसर पर तर्क की शक्ति ही खो बैठते हैं। वे लड़खड़ा कर सोफे पर बैठ गए और किसी अव्यक्त वेदना की तरंग के स्पर्श से मानो पाषाण में परिवर्तित होने लगे। उनकी झुकी पलकों से घुटनों पर चूने वाली आँसू की बूँदें बीच-बीच में ऐसे चमक जाती थीं मानो प्रतिमा से झड़े हुए जूही के फूल हों।
स्वयं अस्थिर होने पर भी मुझे निराला जी को सांत्वना देने के लिए स्थिर होना पड़ा। यह सुन कर कि मैंने ठीक समाचार जानने के लिए तार दिया है, वे व्यथित प्रतीक्षा की मुद्र में तब तक बैठे रहे जब तक रात में मेरा फाटक बंद होने का समय न आ गया।
सबेरे चार बजे ही फाटक खटखटा कर जब उन्होंने तार के उत्तर के संबंध में पूछा तब मुझे ज्ञात हुआ कि वे रात भर पार्क में खुले आकाश के नीचे ओस से भीगी दूब पर बैठे सबेरे की प्रतीक्षा करते रहे हैं। उनकी निस्तब्ध पीड़ा जब कुछ मुखर हो सकी, तब वे इतना ही कह सके, 'अब हम भी गिरते हैं। पंत के साथ तो रास्ता कम अखरता था, पर अब सोच कर ही थकावट होती है।'
प्राय: एक स्पर्धा का तार हमारे सौहार्द के फूलों को वेध कर उन्हें एकत्र रखता है। फूल के झड़ते या खिसकते ही काला तार मात्र रह जाता है। इसी से हमें किसी सहयोगी का बिछोह अकेलेपन की तीव्र अनुभूति नहीं देता। निराला जी के सौहार्द और विरोध दोनों एक आत्मीयता के वृंत पर खिले दो फूल हैं। वे खिल कर वृंत का श्रृंगार करते हैं और झड़ कर उसे अकेला और सूना कर देते हैं। मित्र का तो प्रश्न ही क्या ऐसा कोई विरोधी भी नहीं जिसका अभाव उन्हें विकल न कर देगा।
गत मई मास की, लपटों में साँस लेने वाली दोपहरी भी मेरी स्मृति पर एक जलती रेखा खींच गई है। शरीर से शिथिल और मन से क्लांत निराला जी मलिन फटे अधोवस्त्र को लपेटे और वैसा ही जीर्ण-शीर्ण उत्तरीय ओढ़े हुए धूल-धूसरित पैरों के साथ मेरे द्वार पर आ उपस्थित हुए। 'अपरा' पर इक्कीस सौ पुरस्कार की सूचना मिलने पर उन्होंने मुझे लिखा था कि मैं अपनी सांस्थिक मर्यादा से वह रुपया मँगवा लूँ। अब वे कहने आए थे कि स्वर्गीय मुंशी नव-जादिक लाल की विधवा को पचास प्रति मास के हिसाब से भेजने का प्रबंध कर दिया जावे।
'उक्त धन का कुछ अंश भी क्या वे अपने उपयोग में नहीं ला सकते?' के उत्तर में उन्होंने उसी सरल विश्वास के साथ कहा, ''वह तो संकल्पित अर्थ है। अपने लिए उसका उपयोग करना अनुचित होगा।''
उन्हें व्यवस्थित करने के सभी प्रयास निष्फल रहे हैं, पर आज मुझे उसका खेद नहीं है। यदि वे हमारे साँचे में समा जावें तो उनकी विशेषता ही क्या रहे!
इन बिखरे पृष्ठों में एक पर अनायास ही दृष्टि रुक जाती है। उसे मानो स्मृति ने विषाद की आर्द्रता ने हँसी का कुमकुम घोल कर अंकित किया है।
साहित्यकार-संसद में सब सुविधायें सुलभ होने पर भी उन्होंने स्वयं-पाकी बन कर और एक बार भोजन करके जो अनुष्ठान आरंभ किया था उसकी तो मैं अभ्यस्त हो चुकी हूँ। पर अचानक एक दिन जब उन्होंने पाव भर गेरु मँगवाने का आदेश दिया तब मैंने समझा कि उनके पित्ती निकल आई हैं, क्यों कि उसी रोग में गेरु मिले हुए आटे के पुये खाए जाते हैं और गेरु के चूर्ण का अंगराग लगाया जाता है।
प्रश्नों के प्रति निराला जी कम सहिष्णु हैं और कुतूहल की दृष्टि से मैं कम जिज्ञासु हूँ। फिर भी उनकी सुविधा-असुविधा की चिंता के कारण मैं अनेक प्रश्न कर बैठती हूँ और मेरी सद्भावना में विश्वास के कारण वे उत्तरों का कष्ट सहन करते हैं।
मेरे मौन में मुखर चिंता के कारण ही उन्होंने अपना मंतव्य स्पष्ट किया, ''हम अब सन्यास लेंगे।'' मेरी उमड़ती हँसी को व्यथा के बाँध ने जहाँ का तहाँ ठहरा दिया। इस निर्मम युग ने इस महान कलाकार के पास ऐसा क्या छोड़ा है जिसे स्वयं छोड़ कर यह त्याग का आत्मतोष भी प्राप्त कर सके। जिस प्रकार प्राप्ति हमारी कृतार्थता का फल है उसी प्रकार त्याग हमारी पूर्णता का परिणाम है। इन दोनों छोरों में से एक मनुष्य के भौतिक विकास का माप है और दूसरा मानसिक विस्तार ही थाह। त्याग कभी भाव की अस्वीकृति है और कभी अभाव की स्वीकृति पर तत्वत: दोनों कितने भिन्न हैं।
मैं सोच ही रही थी कि चि. वसंत ने परिहास की मुद्रा में कहा, ''तब तो आपको मधुकरी खाने की आवश्यकता पड़ेगी।''
खेद, अनुताप या पश्चाताप की एक भी लहर से रहित विनोद की एक प्रशांत धारा पर तैरता हुआ निराला जी का उत्तर आया, ''मधुकरी तो अब भी खाते हैं।'' जिसकी निधियों से साहित्य का कोष समृद्ध हैं उसने मधुकरी माँग कर जीवन निर्वाह किया है, इस कटु सत्य पर आने वाले युग विश्वास कर सकेंगे यह कहना कठिन है।
गेरु में दोनों मलिन अधोवस्त्र और उत्तरीय कब रंग डाले गए इसका मुझे पता नहीं, पर एकादशी के सबेरे स्नान, हवन आदि कर के जब वे निकले तब ग़ैरिक परिधान पहन चुके थे। अंगौछे के अभाव और वस्त्रों में रंग की अधिकता के कारण उनके मुँह, हाथ आदि ही नहीं, विशाल शरीर भी ग़ैरिक हो गया था, मानो सुनहली धूप में धुला गेरु के पर्वत का कोई शिखर हो।
बोले, ''अब ठीक है। जहाँ पहुँचे किसी नीम, पीपल के नीचे बैठ गए। दो रोटियाँ माँग कर खा लीं और गीत लिखने लगे।'
इस सर्वथा नवीन परिच्छेद का उपसंहार कहाँ और कैसे होगा यह सोचते-सोचते मैंने उत्तर दिया, '''आपके संन्यास से मुझे इतना ही लाभ हुआ कि साबुन के कुछ पैसे बचेंगे। गेरुये वस्त्र तो मैले नहीं दिखेंगे। पर हानि यही है कि न जाने कहाँ-कहाँ छप्पर डलवाने पड़ेंगे, क्यों कि धूप और वर्षा से पूर्णतया रक्षा करने वाले नीम-पीपल कम ही हैं।''
मन में एक प्रश्न बार-बार उठता है - क्या इस देश की सरस्वती अपने वैरागी पुत्रों की परंपरा अक्षुण्य रखना चाहती है और क्या इस पथ पर पहले पग रखने की शक्ति उसने निराला जी में ही पाई है?
निराला जी अपने शरीर, जीवन, और साहित्य सभी में असाधारण हैं। उनमें विरोधी तत्वों की भी सामंजस्यपूर्ण संधि है। उनका विशाल डीलडौल देखने वाले के हृदय में जो आतंक उत्पन्न कर देता है उसे उनके मुख की सरल आत्मीयता दूर करती चलती है।
उनकी दृष्टि में दर्प और विश्वास की धूपछाँही द्वाभा है। इस दर्प का संबंध किसी हल्की मनोवृत्ति से नहीं और न उसे अहं का सस्ता प्रदर्शन ही कहा जा सकता है। अविराम संघर्ष और निरंतर विरोध का सामना करने से उनमें जो एक आत्मनिष्ठा उत्पन्न हो गई है उसी का परिचय हम उनकी दृप्त दृष्टि में पाते हैं। कभी-कभी यह गर्व व्यक्ति की सीमा पार कर इतना सामान्य हो जाता है कि हम उसे अपना, प्रत्येक साहित्यकार का या साहित्य का मान सकते हैं, इसी से वह दुर्वह कभी नहीं होता। जिस बड़प्पन में हमारा भी कुछ भाग है वह हममें छोटेपन की अनुभूति नहीं उत्पन्न करता और परिणामत: उससे हमारा कभी विरोध नहीं होता।
निराला जी की दृष्टि में संदेह का वह पैनापन नहीं जो दूसरे मनुष्य के व्यक्त परिचय का अविश्वास कर उसके मर्म को वेधना चाहता है। उनका दृष्टिपात उनके सहज विश्वास की वर्णमाला है। वे व्यक्ति के उसी परिचय को सत्य मान कर चलते हैं जिसे वह देना चाहता है और अंत में उस स्थिति तक पहुँच जाते हैं जहाँ वह सत्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं देना चाहता।
जो कलाकार हृदय के गूढ़तम भावों के विश्लेषण में समर्थ हैं उसमें ऐसी सरलता लौकिक दृष्टि से चाहे विस्मय की वस्तु हो, पर कला-सृष्टि के लिए यह स्वाभाविक साधन है।
सत्य का मार्ग सरल है। तर्क और संदेह की चक्करदार राह से उस तक पहुँचा नहीं जा सकता। इसी से जीवन के सत्यद्रष्टाओं को हम बालकों जैसा सरल विश्वासी पाते हैं। निराला जी भी इसी परिवार के सदस्य हैं।
किसी अन्याय के प्रतिकार के लिए उनका हाथ लेखनी से पहले उठ सकता है अथवा लेखनी हाथ से अधिक कठोर प्रहार कर सकती है, पर उनकी आँखों की स्वच्छता किसी मलिन द्वेष में तरंगायित नहीं होती।
ओठों की खिंची हुई-सी रेखाओं में निश्चय की छाप है, पर उनमें क्रूरता की भंगिमा या घृणा की सिकुड़न नहीं मिल सकती।
क्रूरता और कायरता में वैसा ही संबंध है जैसा वृक्ष की जड़ों में अव्यक्त रस और उसके फल के व्यक्त स्वाद में। निराला किसी से सभीत नहीं, अत: किसी के प्रति क्रूर होना उनके लिए संभव नहीं। उनके तीखे व्यंग की विद्युत-रेखा के पीछे सद्भाव के जल से भरा बादल रहता है।
घृणा का भाव मनुष्य की असमर्थता का प्रमाण है। जिसे तोड़ कर हम इच्छानुसार गढ़ सकते हैं, उसके प्रति घृणा का अवकाश ही नहीं रहता, पर जिससे अपनी रक्षा के लिए हम सतर्क हैं, उसी की स्थिति हमारी घृणा का केंद्र बन जाती है। जो मदिरा के पात्र को तोड़ कर फेंक सकता है, उसे मदिरा से घृणा की आवश्यकता ही क्या है! पर जो उसे सामने रखने के लिए भी विवश है, और अपने मन में उससे बचने की शक्ति भी संचित करना चाहता है वह उसके दोषों की एक-एक ईंट जोड़ कर उस पर घृणा का काला रंग फेर कर एक दीवार खड़ी कर लेता है, जिसकी ओट में स्वयं बच सके। हमारे नरक की कल्पना के मूल में भी यही अपने बचाव का विवश प्रयत्न है। जहाँ संरक्षित दोष नहीं, वहाँ सुरक्षित घृणा भी संभव नहीं।
विकास-पथ की बाधाओं का ज्ञान ही महान विद्रोहियों को कर्म की प्रेरणा देता है। क्रोध को संचित कर द्वेष को स्थायी बना कर घृणा में बदलने के लंबे क्रम तक वे ठहर नहीं सकते। और ठहरें भी तो घृणा की निष्क्रियता उन्हें निष्क्रिय बना कर पथ-भ्रष्ट कर देगी।
निराला जी विचार से क्रांतिदर्शी और आचरण से क्रांतिकारी है। वे उस झंझा के समान हैं जो हल्की वस्तुओं के साथ भारी वस्तुओं को भी उड़ा ले जाती है उस मंद समीर जैसे नहीं जो सुगंध न मिले तो दुर्गंध का भार ही ढोता फिरता है। जिसे वे उपयोगी नहीं मानते उसके प्रति उनका किंचित मात्र भी मोह नहीं, चाहे तोड़ने योग्य वस्तुओं के साथ रक्षा के योग्य वस्तुएँ भी नष्ट हो जावें।
उनका मार्ग चाहे ऐसे भग्नावशेषों से भर गया हो जिनके पुनर्निर्माण में समय लगेगा पर ऐसी अडिग शिलाएँ नहीं है, जिनको देख-देख कर उन्हें निष्फल क्रोध में दाँत पीसना पड़े या निराश पराजय में आह भरना पड़े।
मनुष्य की संचय-वृत्ति ऐसी है कि वह अपनी उपयोगहीन वस्तुओं को भी संगृहीत रखना चाहता है। इसी स्वभाव के कारण बहुत-सी रूढ़ियाँ भी उसके जीवन के अभाव को भर देता है।
विद्रोह स्वभावगत होने के कारण निराला जी के लिए ऐसी रूढ़ियों पर प्रहार करना जितना प्रयासहीन होता है, उतना ही कौतुक का कारण।
दूसरों की बद्धमूल धारणाओं पर आघात कर उनकी खिजलाहट पर वे ऐसे ही प्रसन्न होते हैं जैसे होली के दिन कोई नटखट लड़का, जिसने किसी की तीन पैर की कुर्सी के साथ किसी की सर्वांगपूर्ण चारपाई, किसी की टूटी तिपाई के साथ किसी की नई चौकी होलिका में स्वाहा कर डाली हो।
उनका विरोध द्वेषमूलक नहीं पर चोट कठिन होती है। इसके अतिरिक्त उनके संकल्प और कार्य के बीच में ऐसी प्रत्यक्ष कड़ियाँ नहीं रहतीं, जो संकल्प के औचित्य और कर्म के सौंदर्य की व्याख्या कर सकें। उन्हें समझने के लिए जिस मात्रा में बौद्धिकता चाहिए उसी मात्रा में हृदय की संवेदनशीलता अपेक्षित रहती है। ऐसा संतुलन सुलभ न होने के कारण उन्हें पूर्णता में समझने वाले विरल मिलते हैं। ऐसे दो व्यक्ति सब जगह मिल सकते हैं जिनमें एक उनकी नम्र उदारता की प्रशंसा करते नहीं थकता और दूसरा उनके उद्धत व्यवहार की निंदा करते नहीं हारता। जो अपनी चोट के पार नहीं देख पाते वे उनके निकट पहुँच ही नहीं सकते, अत: उनके विद्रोही की असफलता प्रमाणित करने के लिए उनके चरित्र की उजली रेखाओं पर काली तूली फेर कर प्रतिशोध लेते रहते हैं। निराला जी के संबंध में फैली हुई भ्रांत किंवदंतियाँ इसी निम्नवृत्ति से संबंध रखती है।
मनुष्य-जाति की नासमझी का इतिहास क्रूर और लंबा है। प्राय: सभी युगों मे मनुष्य ने अपने में से श्रेष्ठतम, पर समझ में न आनेवाले व्यक्ति को छाँट कर, कभी उसे विष दे कर, कभी सूली पर चढ़ा कर और कभी गोली का लक्ष्य बना कर अपनी बर्बर मूर्खता के इतिहास में नए पृष्ठ जोड़े हैं।
प्रकृति और चेतना ने जाने कितने निष्फल प्रयोगों के उपरांत ऐसे मनुष्य का सृजन कर पाती हैं, जो अपने स्रष्टाओं से श्रेष्ठ हो। पर उसके सजातीय, ऐसे अद्भुत सृजन को नष्ट करने के लिए इससे बड़ा कारण खोजने की भी आवश्यकता नहीं समझते कि वह उनकी समझ के परे है अथवा उसका सत्य इनकी भ्रांतियों से मेल नहीं खाता।
निराला जी अपने युग की विशिष्ट प्रतिभा हैं, अत: उन्हें अपने युग का अभिशाप झेलना पड़े तो आश्चर्य नहीं।
उनके जीवन के चारों ओर परिवार का वह लौहसार घेरा नहीं जो व्यक्तिगत विशेषताओं पर चोट भी करता है और बाहर की चोटों के लिए ढाल भी बन जाता है। उनके निकट माता, बहन, भाई आदि के कोमल साहचर्य के अभाव का ही नाम शैशव रहा है। जीवन का वसंत ही उनके लिए पत्नी-वियोग का पतझड़ बन गया है। आर्थिक कारणों ने उन्हें अपनी मातृहीन संतान के कर्तव्य-निर्वाह की सुविधा भी नहीं दी। पुत्री के अंतिम क्षणों में वे निरूपाय दर्शक रहे और पुत्र को उचित शिक्षा से वंचित रखने के कारण उसकी उपेक्षा के पात्र बने।
अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों से उन्होंने कभी ऐसी हार नहीं मानी जिसे सह्य बनाने के लिए हम समझौता कहते हैं। स्वभाव से उन्हें वह निश्छल वीरता मिली है, जो अपने बचाव के प्रयत्न को भी कायरता की संज्ञा देती है। उनकी वीरता राजनीतिक कुशलता नहीं, वह तो साहित्य की एकनिष्ठता का पर्याय है। छल के व्यूह में छिप कर लक्ष्य तक पहुँचने को साहित्य लक्ष्य-प्राप्ति नहीं मानता। जो अपने पथ की सभी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष बाधाओं को चुनौती देता हुआ, सभी आघातों को हृदय पर झेलता हुआ लक्ष्य तक पहुँचता है, उसी को युग-स्रष्टा साहित्यकार कह सकते हैं। निराला जी ऐसे ही विद्रोही साहित्यकार हैं। जिन अनुभवों के दंशन का विष साधारण मनुष्य की आत्मा को मूर्च्छित कर के उसके सारे जीवन को विषाक्त बना देता है, उसी से उन्होंने सतत जागरुकता और मानवता का अमृत प्राप्त किया है।
किसी की व्यथा इतनी हल्की नहीं जो उनके हृदय में गंभीर प्रतिध्वनि नहीं जगाती, किसी की आवश्यकता इतनी छोटी नहीं जो उन्हें सर्वस्व दान की प्रेरणा नहीं देती।
अर्थ की जिस शिला पर हमारे युग के न जाने कितने साधकों की साधना तरियाँ चूर-चूर हो चुकी हैं, उसी को वे अपने अदम्य वेग में पार कर आए हैं। उनके जीवन पर उस संघर्ष के जो आघात हैं वे उनकी हार के नहीं, शक्ति के प्रमाणपत्र हैं। उनकी कठोर श्रम, गंभीर दर्शन और सजग कला की त्रिवेणी न अछोर मरू में सूखती है न अकूल समुद्र में अस्तित्व खोती है।
जीवन की दृष्टि से निराला जी किसी दुर्लभ सीप में ढले सुडौल मोती नहीं हैं, जिसे अपनी महार्धता का साथ देने के लिए स्वर्ण और सौंदर्य-प्रतिष्ठा के लिए अलंकार का रूप चाहिए। वे तो अनगढ़ पारस के भारी शिला-खंड हैं। न मुकुट में जड़ कर कोई उसकी गुरुता सँभाल सकता है और न पदत्राण बनाकर कोई उसका भार उठा सकता है। वह जहाँ हैं, वहीं उसका स्पर्श सुलभ है। यदि स्पर्श करने वाले में मानवता के लौह-परमाणु हैं तो किसी ओर से भी स्पर्श करने पर वह स्वर्ण बन जाएगा। पारस की अमूल्यता दूसरों का मूल्य बढ़ाने में हैं। उसके मूल्य में न कोई कुछ जोड़ सकता है, न घटा सकता है।
आज हम दंभ और स्पर्धा, अज्ञान और भ्रांति की ऐसी कुहेलिका में चल रही हैं जिसमें स्वयं को पहचानना तक कठिन है, सहयात्रियों को यथार्थता में जानने का प्रश्न ही नहीं उठता। पर आने वाले युग इस कलाकार की एकाकी यात्रा का मूल्य आँक सकेंगे, जिसमें अपने पैरों की चाप तक आँधी में खो जाती है।
निराला जी के साहित्य की शास्त्रीय विवेचना तो आगामी युगों के लिए भी सुकर रहेगी, पर उस विवेचना के लिए जीवन की जिस पृष्ठभूमि की आवश्यकता होती है, उसे तो उनके समकालीन ही दे सकते हैं।
साहित्यकार के जीवन का विश्लेषण उसके साहित्य के मूल्यांकन से कठिन है। साहित्य की कसौटी सर्वमान्य होती है, पर उसकी उर्वर भूमि आलोचक के विशेष दृष्टिबिंदु को फूलने-फलने का आकाश दे सकती है। एक कविता का विशेष भाव, एक चित्र का विशेष रंग और एक गीत की विशेष लय, किसी के लिए रहस्य के द्वार खोल सकती है और किसी से टकरा कर व्यर्थ हो जाती है। पर जीवन का इतिवृत्त इतनी विविधता नहीं सँभाल सकता। एक व्यक्ति का कर्म समाज को या हानि पहुँचा सकता है या लाभ, अत: व्यक्तिगत रुचि के कारण यदि कोई हानि पहुँचाने वाले को अच्छा कहे या लाभ पहुँचाने वाले को बुरा तो समाज उसे अपराधी मानेगा। ऐसी स्थिति में कर्म के मूल्यांकन में विशेष सतर्क रहने की आवश्यकता पड़ती है।
असाधारण प्रतिभावान और अपने युग से आगे देखने वाले कलाकारों के इतिवृत्त के चित्रण में एक और भी बाधा है। जब उनके समानधर्मा उनके जीवन का मूल्यांकन करते हैं तब कभी तो स्पर्धा उनकी तुला को ऊँचा-नीचा करती रहती है और कभी अपनी विशेषताओं का मोह उन्हें सहयोगियों में अपनी प्रतिकृति देखने के लिए विवश कर देता है। जब छोटे व्यक्तित्व वाले किसी असाधारण व्यक्तित्व की व्याख्या करने चलते हैं, तब कभी तो उनकी लघुता उसे घेर नहीं पाती और कभी उसके तीव्र आलोक में अपने अहं को उद्भासित कर लेने की दुर्बलता उन्हें घेर लेती है।
इस प्रकार महान कलाकारों के यथार्थचित्र व्याख्याबहुल हों तो विस्मय की बात नहीं।
साहित्य के नवीन युगपथ पर निराला जी की अंक-संसृति गहरी, और स्पष्ट उज्ज्वल और लक्ष्यनिष्ठ रहेगी। इस मार्ग के हर फूल पर उनके चरण का चिह्न और हर शूल पर उनके रक्त का रंग है।

समालोचना

डा. भवानी दास

तुलसीदास जी की ही कोटि के हिन्दी के प्रमुख कवि हैं सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’। पंडित रामसहाय तिवारी के पुत्रा ‘निराला’ का जन्म 1897 ई॰ में बंगाल की रियासत (जिला मेदिनी पुर) में हुआ। रामसहाय उन्नाव (वैसवाडे़) के रहने वाले थे। छोटी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरम्भ से ही प्राप्त हुआ। सामन्त वर्ग अपने कर्मचारियों से भी अधिक जुल्म किसानों पर करता था। निराला ने दलित-शोषित किसान के साथ हमददवर्वी का संस्कार अपने अबोधपन से ही अर्जित किया।

सुख-सुविधाओं का अभाव इन्हें बचपन से ही था। तीन वर्ष की आयु में माता का और 20 वर्ष का होते-होते पिता का देहान्त हो गया। अपने बच्चों के अलावा संयुक्त परिवार का भी बोझ निराला पर पड़ा पहले महायुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें न सिर्फ पत्नी मनोहरा देवी का, बल्कि चाचा, भाई और भाभी का देहान्त हो गया। शेष कुनबे का बोझ उठाने में महिषादल की नौकरी अपर्याप्त थी। फिर भी निराला ने इस क्षीण सहारे को ग्रहण किया। अपने श्रम पर विश्वास रखने वाले निराला अपने सम्मान के प्रति सचेत थे। चाटुकारिता से आगे बढ़ने वालों की भाँति निर्लज्ज और स्वाभिमानरहित वे न हो सकते थे। किसानों के पक्ष में बोलने वाले निराला महर्षिदल राज्य के अधिकारियों का साथ लम्बे समय तक निभा पाते, यह कठिन था, स्वभावतः राजा साहब के हाउस होल्ड सुपरिण्टेंण्डेण्ट से विवाद हुआ और नौकरी छूट गयी।

इसके बाद का सारा जीवन आर्थिक अनर्थ और संघर्ष का जीवन है। इस जीवन में उतार-चढ़ाव, पस्ती-साहस, निराशा और पौरुष के अनेक मोड़ देखे जा सकते हैं। निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन-से-कठिन परिस्थिति मे भी इन्होंने सिद्धान्त त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गवाँया। अन्तिम दिनों में वे शरीर से बेहद जर्जर हो गए मानसिक असंतुलन के भी क्षण आते थे, हार्निया आदि रोगों से भी बेहद पीड़ित थे। जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। यहीं दारागंज मुहल्ले में अंग्रेजों के बनाए रायसाहब की विशाल कोठी में ठीक पीछे सीलन और अन्धकार सी एक कोठरी (कालकोठरी) में 15 अक्टूबर 1961 ई॰ को इन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।

निराला जी मूलतः कवि थे, पर बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न होने के कारण इनकी लेखनी साहित्य की हर विद्या पर चली। इनके काव्य हैं ‘अनामिका’, ‘गीतिका’, ‘परिमल’, ‘कुकुरमुत्ता’, ‘नये पत्ते’, ‘वेला’, ‘अर्चना’, ‘अणिमा’, ‘गीत-पुन्ज’, ‘अराधना’, ‘सांध्यकाकली’, ‘तुलसीदास’ आदि। कहानी और रेखाचित्रा हैं ‘चतुरी चमार’, ‘सुखी’, ‘सुकुल की बीवी’, ‘लिली’। इनके महत्त्वपूर्ण उपन्यास हैं ‘अप्सरा’, ‘अलका’, ‘निरूपमा’, ‘प्रभावती’, ‘चोटी की पकड़’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’, ‘कुल्लीभाट,’ ‘चमेली’ एवं ‘काले-कारनामे’। इनके निबन्ध-संग्रह हैं ‘प्रबन्ध पद्य’, ‘प्रबन्ध-प्रतिमा’, ‘चाबुक’। नाटक के रूप में इन्होंने ‘शकुन्तला’ लिखा। जीवनी और अनूदित रचनाएँ हैं ‘राणाप्रताप’, ‘प्रहलाद’, ‘भीम’, ‘श्रीरामकृष्ण वचनामृत’, ‘विवेकानन्द के भाषण’, ‘महाभारत’, ‘देवी चैधरानी’, ‘आनंदमठ’।

साहित्यकार के रूप में भी निराला का जीवन बहुत ही संघर्षमय था। रूढ़िवादी साहित्यकारों और पत्राकारों का दल संगठित होकर निराला का विरोध करता था। निराला के काव्य में इस विरोध का जिक्र बार-बार आता है। स्वभावतः साहित्यिक मान्यता निराला को उतनी आसानी से नहीं मिली। साथ ही, साहित्य-सेवा निराला को आजीविका देने में भी असमर्थ थी। साहित्य-सेवा और आजीविका के बीच इस विरोध का बड़ा मार्मिक चित्रा निराला ने अपनी पुत्री के निधन पर लिखी अपनी एक अत्यंत श्रेष्ठ कविता ‘सरोजस्मृति’ (1935) में खींचा है। कवि ‘‘कविकर्म में व्यर्थ ही व्यस्त’’ है। शब्दों की कविता की इस सेवा में ‘‘जीवित कविता’’ की उपेक्षा होती है। एक दिन सिर्फ दुख और पीड़ा झेलते हुए यह ‘‘जीवित कविता’’ ‘सरोज’ संसार-सागर पार करके मृत्यु का वरण कर लेती है। सरोज के माध्यम से अपने पूरे साहित्यिक और आर्थिक जीवन की समीक्षा करते हुए कवि सरस्वती के प्रकाश को व्यर्थ होता हुआ अनुभव करता है। पीड़ा और ग्लानि से भरकर अपने कविकर्म पर वज्रपात करता है।

लेकिन यह उनके साहित्यिक जीवन का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि नये प्रगतिशील चिन्तन वाले साहित्यकार पूरी दृढ़ता से निराला के साथ खड़े हुए। हमारे युग के सबसे महान आलोचकों में एक डा. रामविलास शर्मा ने अपना पहला लेख निराला पर ही लिखा 1935-6 में। लखनऊ और इलाहाबाद में नये प्रगतिशील साहित्यकारों की टोली निराला के आसपास रहती थी। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह प्रकट होता है कि निराला का साहित्य ही नहीं, उनकी शारीरिक उपस्थिति भी रूढ़िवादी-रीतिवादी साहित्यकारों और नये, प्रगतिशील लेखकों-विचारकों के बीच संघर्ष का प्रेरक था। निराला के व्यक्तित्व और साहित्य की यह ऐसी विशेषता है कि कोई उनकी उपेक्षा करके नहीं निकल सकता उसे या तो निराला के साथ होना पड़ता या उसके विरूद्ध।

निराला जीवन और साहित्य में विरोध मानने वाले न थे। इसलिए यह स्वभाविक था कि वे अपने काव्य में भी संघर्ष को जीवन के एक बड़े मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करें। निराला की खूबी यह है कि वे अपने ही नहीं, समाज में अन्य व्यक्तियों और वर्गों के संघर्ष को भी बराबर महत्त्व देते रहे हैं। अक्सर उन्हें संघर्ष और पौरुष का, परिवर्तन, विद्रोह और क्रान्ति का कवि कहा जाता है इसका कारण यही है। इनके कहानी उपन्यास में भी समाज के दलित और संघर्षरत मनुष्यों का गौरव निखरकर सामने आता है। अकारण ही नहीं ‘बादल राग’ में अधीर-कृषक ‘‘विप्लव के वीर’’ को बुलाता है और ‘इलाहाबाद के पथ पर’ चिलचिलाती लू में पत्थर तोड़ती मजदूरनी निराला की सहानुभूति में रंग जाती है। देवी, चतुरी चमार, कुल्ली भाट जैसे संघर्षरत चरित्रा और उनके साथ पूरा किसान समुदाय अंग्रेजों और उनके सहायक जमींदारों के खिलाफ अपनी स्वतंत्राता के लिए लड़ता हुआ निराला की रचनाओं में गौरवान्वित होता है। सारांश यह है कि निराला की सहानुभूति हर उस व्यक्ति या वर्ग से है जो जीवन में सताया हुआ है, जो अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष के लिए आगे बढ़ता है और जो दूसरों को लूट कर फलने-फूलने के बजाय अपने श्रम से जीविका अर्जित करता है।

किसान निराला के सामने सबसे अधिक पीड़ित और पिछड़ा हुआ था। निराला का सहज-बोध भारतीय किसान के साथ अट्ट रूप से बँधा है। यह किसान अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ने वाली शक्ति है और रूढ़ियों से जकड़े हुए सामन्ती बन्धनों को तोड़कर भारतीय समाज के प्रगति का द्वार खोलने वाली शक्ति थी। किसान का यह रूप निराला के निबन्धों, कहानियों और कविताओं में सर्वत्रा देखा जा सकता है। साथ ही भारतीय प्रकृति और सांस्कृतिक समृद्धि का भी मुख्य आधार किसान है। किसान के साथ अपने सहजबोध के दृढ़ सम्बन्ध के कारण निराला प्रकृति के सौन्दर्य और जीवन के उल्लास के भी उतने ही बड़े कवि हैं, जितने संघर्ष के। सौन्दर्य, उल्लास और संघर्ष में आपसी विरोध नहीं है। इसका कारण है जीवन में, मनुष्य के कर्म और सुखमय भविष्य में निराला की अडिग आस्था।

निराला के काव्य-कला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्राण-कौशल। आन्तरिक भाव हों या बाह्य-जगत के दृश्य रूप, संगीतात्मक ध्वनियाँ हो या रंग या गंध, सजीव चरित्रा हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगने वाले तत्त्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवन्त-चित्रा उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उनके माध्यम से ही निराला के मर्म तक पहुँच सकता है। निराला के चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन भी सम्भावित रहता है। इसलिए उनकी बहुत सी कविताओं में दार्शनिक गहराई उत्पन्न हो जाती है। इस नए चित्राण-कौशल और दार्शनिक गहराई के कारण ही अक्सर निराला की कविताएँ कुछ जटिल हो जातीं हैं, जिसे न समझने के नाते विचारक लोग उन पर दुरुहता आदि का आरोप लगाते हैं। निराला आन्तरिक भावों या दार्शनिक विचारों को उद्गार या भाषण के रूप में प्रस्तुत नहीं करते, दृश्य रूपों पर आधारित चित्रों की रचना में इन भावनाओं और विचारों का ईंट-गारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इससे उनकी कला में न सिर्फ दृढ़ता का गुण उत्पन्न होता है, बल्कि कलाकार के रूप में उनके सामथ्र्य और दृष्टि का भी परिचय मिलता है।

Friday, August 20, 2021

कवि मैथिलीशरण गुप्त / SYBA

 कवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय, जन्म, रचना


मैथिलीशरण गुप्त जी हिंदी साहित्य के प्रथम कवि के रूप में माने जाते रहे हैं. पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा आदि मैथिलीशरण गुप्त जी के काव्य के प्रथम गुण हुआ करते थे. गुप्त जी की कीर्ति भारत में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हुईं थी. इसी कारण से महात्मा गांधी जी ने इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित किया था और आज भी हम सब लोग उनकी जयंती को एक कवि दिवस के रूप में मनाते हैं. सन् 1954 ई. में भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. तो आइये जानते हैं इनके जीवन से जुडी हुईं कुछ रोचक जानकारियां

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय | Maithili Sharan Gupt Biography In Hindi

बिंदु (Points)जानकारी (Information)
नाम (Name)मैथिलीशरण गुप्त
जन्म (Date of Birth)03/08/1886
आयु78 वर्ष
जन्म स्थान (Birth Place)झाँसी, उत्तरप्रदेश
पिता का नाम (Father Name)रामचरण गुप्त
माता का नाम (Mother Name)कशीवाई
पत्नी का नाम (Wife Name)ज्ञात नहीं
पेशा (Occupation )लेखक, कवि
भाषा शैलीब्रजभाषा
मृत्यु (Death)12/12/1964 ई.
मृत्यु स्थान (Death Place)—-
अवार्ड (Award)विशिष्ट सेवा पदक

बाल कविताओं के प्रमुख कवि और खड़ी बोली को अपनी कविताओं का माध्यम बनाने वाले प्रमुख महत्वपूर्ण कवि मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म सन 3 अगस्त 1886 ई. को झाँसी जिले के चिरगांव नामक स्थान पर एक संपन्न वैश्य परिवार में हुआ था.

जीवन परिचय मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (३ अगस्त १८८६–१२ दिसम्बर १९६४) हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे। हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था। उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की पदवी भी दी थी। उनकी जयन्ती ३ अगस्त को हर वर्ष 'कवि दिवस' के रूप में मनाया जाता है। सन १९५४ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।

महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से गुप्त जी ने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया। इस तरह ब्रजभाषा जैसी समृद्ध काव्य-भाषा को छोड़कर समय और संदर्भों के अनुकूल होने के कारण नये कवियों ने इसे ही अपनी काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी कविता के इतिहास में यह गुप्त जी का सबसे बड़ा योगदान है। घासीराम व्यास जी उनके मित्र थे। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्त जी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो 'पंचवटी' से लेकर 'जयद्रथ वध', 'यशोधरा' और 'साकेत' तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। 'साकेत' उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है।

जीवन परिचय

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म पिता सेठ रामचरण कनकने और माता काशी बाई की तीसरी संतान के रूप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। माता और पिता दोनों ही वैष्णव थे। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। पिता रामचरण गुप्त 'कनकलता' उपनाम से भक्तिपूर्ण कविताएँ लिखते थे। बालक मैथिलीशरण पर इस साहित्यिक परिवेश का प्रभाव पड़ा और वह १२ वर्ष की अवस्था से ही ब्रजभाषा में कविता करने लगे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।

प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग" तथा बाद में "जयद्रथ वध" प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनादवध", "विरहिणी ब्रजांगना" तथा "वीरांगना" का अनुवाद भी किया। सन् 1912 ई. में राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती" का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रन्थ "स्वप्नवासवदत्ता" का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में महाकाव्य 'साकेत' की रचना आरम्भ की। उर्मिला के प्रति उपेक्षा भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु किया। "साकेत" तथा "पंचवटी" आदि अन्य ग्रन्थ सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये। "यशोधरा" सन् १९३२ ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें "राष्टकवि" की संज्ञा प्रदान की। 16 अप्रैल 1941 को वे व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिए गए। पहले उन्हें झाँसी और फिर आगरा जेल ले जाया गया। आरोप सिद्ध न होने के कारण उन्हें सात महीने बाद छोड़ दिया गया। सन् 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. की उपाधि से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुये। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने सन् १९६२ ई. में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये। वे वहाँ मानद प्रोफेसर के रूप में नियुक्त भी हुए। १९५४ में साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। चिरगाँव में उन्होंने १९११ में साहित्य सदन नाम से स्वयं की प्रैस शुरू की और झांसी में १९५४-५५ में मानस-मुद्रण की स्थापना की।

इसी वर्ष प्रयाग में "सरस्वती" की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता गुप्त जी ने की। सन् १९६३ ई० में अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन ने अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। १२ दिसम्बर १९६४ ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा अस्त हो गया। ७८ वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, १९ खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। 'भारत भारती' के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। हिन्दी में लेखन आरम्भ करने से पूर्व उन्होंने रसिकेन्द्र नाम से ब्रजभाषा में कविताएँ, दोहा, चौपाई, छप्पय आदि छंद लिखे। ये रचनाएँ 1904-05 के बीच वैश्योपकारक (कलकत्ता), वेंकटेश्वर (बम्बई) और मोहिनी (कन्नौज) जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। उनकी हिन्दी में लिखी कृतियाँ इंदु, प्रताप, प्रभा जैसी पत्रिकाओं में छपती रहीं। प्रताप में विदग्ध हृदय नाम से उनकी अनेक रचनाएँ प्रकाशित हुईं।

जयन्ती

मध्य प्रदेश के संस्कृति राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने कहा है कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती प्रदेश में प्रतिवर्ष तीन अगस्त को 'कवि दिवस' के रूप में व्यापक रूप से मनायी जायेगी। यह निर्णय राज्य शासन ने लिया है। युवा पीढ़ी भारतीय साहित्य के स्वर्णिम इतिहास से भली-भांति वाकिफ हो सके इस उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा प्रदेश में भारतीय कवियों पर केन्द्रित करते हुए अनेक आयोजन करेगा।

कृतियाँ

महाकाव्य- साकेत, जयभारत
काव्यकृतियाँ- तिलोत्तमा, चजयद्रथ वध, भारत-भारती, पंचवटी, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, अंजलि और अर्घ्य, अजित, अर्जन और विसर्जन, काबा और कर्बला, किसान, कुणाल गीत, गुरु तेग बहादुर, गुरुकुल ,पलासी का युद्ध, झंकार , पृथ्वीपुत्र, वक संहार , शकुंतला, विश्व वेदना, राजा प्रजा, विष्णुप्रिया, उर्मिला, लीला , प्रदक्षिणा, दिवोदास , भूमि-भाग
नाटक - रंग में भंग , राजा-प्रजा, वन वैभव , विकट भट , विरहिणी , वैतालिक, शक्ति, सैरन्ध्री , स्वदेश संगीत, हिड़िम्बा , हिन्दू, चंद्रहास
मैथिलीशरण गुप्त ग्रन्थावली (मौलिक तथा अनूदित समग्र कृतियों का संकलन 12 खण्डों में, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित, लेखक-संपादक : डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल
फुटकर रचनाएँ- केशों की कथा, स्वर्गसहोदर, ये दोनों मंगल घट (मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी पुस्तक) में संग्रहीत हैं।
अनूदित (मधुप के नाम से)-
संस्कृत- स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, अविमारक (भास) (गुप्त जी के नाटक देखें), रत्नावली (हर्षवर्धन)
बंगाली- मेघनाद वध, विहरिणी ब्रजांगना(माइकल मधुसूदन दत्त), पलासी का युद्ध (नवीन चंद्र सेन)
फारसी- रुबाइयात उमर खय्याम (उमर खय्याम)
काविताओं का संग्रह - उच्छवास
पत्रों का संग्रह - पत्रावली

गुप्त जी के नाटक
उपरोक्त नाटकों के अतिरिक्त गुप्त जी ने चार नाटक और लिखे जो भास के नाटकों पर आधारित थे। निम्नलिखित तालिका में भास के अनूदित नाटक और उन पर आधारित गुप्त जी के मौलिक नाटक दिए हुए हैं :-
गुप्त जी के मौलिक नाटक: अनघ, चरणदास, तिलोत्तमा, निष्क्रिय प्रतिरोध भास जी के अनूदित नाटक: स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिमा, अभिषेक, आविमारक

काव्यगत विशेषताएँ

गुप्त जी के काव्य में राष्ट्रीयता और गांधीवाद की प्रधानता है। इसमें भारत के गौरवमय अतीत के इतिहास और भारतीय संस्कृति की महत्ता का ओजपूर्ण प्रतिपादन है। आपने अपने काव्य में पारिवारिक जीवन को भी यथोचित महत्ता प्रदान की है और नारी मात्र को विशेष महत्व प्रदान किया है। गुप्त जी ने प्रबंध काव्य तथा मुक्तक काव्य दोनों की रचना की। शब्द शक्तियों तथा अलंकारों के सक्षम प्रयोग के साथ मुहावरों का भी प्रयोग किया है।

भारत भारती में देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ प्रकट करते हुए कवि ने देश के अतीत का अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ गुणगान किया। भारत श्रेष्ठ था, है और सदैव रहेगा का भाव इन पंक्तियों में गुंजायमान है-

भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल कहाँ?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है।

मैथिलीशरण गुप्त को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का मार्गदर्शन प्राप्त था । आचार्य द्विवेदी उन्हें कविता लिखने के लिए प्रेरित करते थे, उनकी रचनाओं में संशोधन करके अपनी पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित करते थे। मैथिलीशरण गुप्त की पहली खड़ी बोली की कविता 'हेमन्त' शीर्षक से सरस्वती (१९०७ ई०) में छपी थी।

उनके द्वारा लिखित खंडकाव्य पंचवटी आज भी कविता प्रेमियों के मानस पटल पर सजीव है।

गुप्त जी को राष्ट्रकवि क्यों और किसने कहा ?—

राष्ट्र की आत्मा को वाणी देने के कारण मैथिलीशरण गुप्त जी को राष्ट्रकवि कहा जाता है। महात्मा गाँधी ने इनकी राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत रचनाओं के आधार पर ही इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया था ।

हिन्दी काव्य को श्रृंगार रस की दलदल से निकालकर उसमें राष्ट्रीय भावनाओं की पुनीत गंगा को बहाने का श्रेय गुप्त जी को ही है। इस प्रकार गुप्त जी को राष्ट्रकवि होने का भी गौरव प्राप्त हुआ था।

एक सच्चे युग-प्रतिनिधि कवि के रूप में गुप्त जी का परिचयः-

श्री मैथिलीशरण गुप्त के काव्य की कतिपय विशेषताएँ उन्हें समन्वयकारी युग-प्रतिनिधि और राष्ट्रीय कवि सिद्ध करती है। गुप्त जी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत, आर्य संस्कृति के प्रति निष्ठावान् गाँधीवाद के समर्थक और युग-धर्म के संयोजक थे।

साहित्य समाज का दर्पण है। देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनितिक, आर्थिक, धार्मिक सभी परिस्थितियाँ उसमें साफ-साफ दिखाई पड़ती हैं।

जिस समय की सामाजिक स्थिति जैसी होती है उसी के अनुरूप उस समय का साहित्य रचा जाता है। गुप्त जी का साहित्य उच्च कोटि का साहित्य है। उन्होंने युगानुकूल साहित्य का सृजन किया है। गुप्त जी एक मर्यावादी कवि थे। प्राचीन बारतीय सामाजिक परम्पराओँ तथा नितिपरक मर्यादाओं में उनकी दृढ़ आस्था है।

मर्यादावादी होते हुए भी गुप्त जी पुरुषार्थ में विश्वास करने वाले चिन्तक है। परम्परागत मर्यादाओं का ग्रहण भी वे युगीन परिवेश के अनुकूल ही करना चाहते थे। यही कारण है कि उनके काव्य प्राचीन कथानकों पर आधारित होते हुए भी नवीन दृष्टिकोणों एवं युगानुरूप सन्देशों से युक्त हैं। इस प्रकार गुप्त जी एक सच्चे युग-प्रतिनिधि कवि के रूप में भी जाने जाते हैं।

भाषा (Language):-

गुप्त जी खड़ीबोली के प्रतिनिधि कवि हैं। खड़ीबोली को साहित्यिक रूप प्रदान करने में गुप्त जी का जितना बड़ा योगदान है, उतना किसी अन्य कवि का नहीं है। भाषा पर इनका पूर्ण आधिकार था। गम्भीर विषय को भी सुन्दर और सरल शब्दों में प्रस्तुत करने में ये सिद्ध हस्त थे।

इनकी भाषा में माधुर्य भावों में तीव्रता और शब्दों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। गुप्त जी का साहित्य वास्तव में भाषा, भाव, लोक-कल्याण, जनता को जगाने एवं भारतीय संस्कृति के चित्रण की दृष्टि से उच्च कोटि का है।

शैली (Style):-

गुप्त जी की शैली में प्रसाद, माधुर्य तथा ओज तीनों गुण हैं। गुप्त जी के काव्य में शैली के तीन रूप मिलते हैं—1. प्रबंध शैली, 2. रूपक शैली तथा 3. गीति शैली। तीनों शैलियों पर द्विवेदी युग का विशेष प्रभाव परिलक्षित होता है। इनकी शैली में गेयता, सहज प्रवाहमयता, सरसता और संगीतात्मकता की अजस्त्र धारा प्रवाहित होती दिखाई पड़ती है।

रचनाए (Creations):-

गुप्त जी की रचना-सम्पदा विशाल है। गुप्त जी की रचनाएँ उद्देश्य परक हैं। उनकी कविताओँ में राष्ट्रीयतावादी एवं मानवतावादी विचारों की अभिव्यक्ति का उद्देश्य किसी-न-किसी सन्देश से अवगत कराता है।

ऐसे स्थल उनके काव्य में भरे पड़े हैं जिनमें देशवासियों को कोई न कोई सीख दी गयी है। गुप्त जी की समस्त रचनाएँ दो प्रकार की हैं—

1. अनूदित

2. मौलिक

  • अनूदित रचनाएँ— ‘वीरांगना‘, ‘मेघनाद-वध’, ‘वृत्त-संहार’, ‘स्वप्नवासदत्ता’, ‘प्लासी का युद्ध’, ‘विरहिणी’, ‘ब्रजांगना’ आदि इनकी अनूदित रचनाएँ हैं।
  • मौलिक रचनाएँ— ‘साकेत’, ‘भारत-भारती’, ‘यशोदरा’, ‘द्वापर’, ‘जयभारत’, ‘विष्णुप्रिया’ आदि आपकी मौलिक रचनाएँ हैं।
  • साकेतः- यह उत्कृष्ट महाकाव्य है, श्रीरामचरितमानस के पश्चात् हिन्दी में राम काव्य का दूसरा स्तम्भ यही महाकाव्य है।
  • भारत-भारतीः- इसमें देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं पर आधारित कविताएँ हैं। इसी रचना के कारण गुप्त जी राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात् हैं।
  • यशोधराः- इसमें बुद्ध की पत्नी यशोधरा के चरित्र को उजागर किया गया है।
  • द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रियाः- इसमें हिन्दू संस्कृति के प्रमुख पात्रों का चरित्र का पुनरावलोकन कर कवि ने अपनी पुनर्निर्माण कला को उत्कृष्ट रूप में प्रदर्शित किया है।

गुप्त जी की अन्य प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं—

‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘किसान’, ‘पंचवटी’, ‘हिन्दू-सैरिन्धी’, ‘सिद्धराज’, ‘नहुष’, ‘हिडिम्बा’, ‘त्रिपथमा’, ‘काबा और कर्बला’, ‘गुरुकुल’, ‘वैतालिक’, ‘मंगलघट’, ‘अजित’ आदि।
‘अनघ’, ‘तिलोत्तमा’, ‘चन्द्रहास’ नामक तीन छोटे-छोटे पद्यबन्ध रूपक भी गुप्त जी ने लिखे हैं। इस प्रकार गुप्त जी का साहित्य विशाल और विषय-क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

साहित्य में स्थान(Place In Literature):-

गुप्त जी सच्चे अर्थों में राष्ट्र के महनीय मूल्यों के प्रतीक और आधुनिक भारत के सच्चे राष्ट्रकवि थे। राष्ट्र की आत्मा को वाणी देने के कारण ये राष्ट्रकवि कहलाये और आधुनिक हिन्दी काव्य की धारा के साथ विकास-पथ पर चलते हुए युग-प्रतिनिधि कवि स्वीकार किये गये। इन्होंने राष्ट्र को जगाया और उसकी चेतना को वाणी दी।

गुप्त जी के अन्दर राष्ट्रीय चेतना की भावना तथा देशभक्ति बचपन से ही विद्यमान थी। गुप्त जी के हृदय में नारी के प्रति सदैव श्रद्धाभाव रहा है। इन्होंने नारी-जाति को समाज का अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग माना है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त भारतीय संस्कृति के यशस्वी उद्गाता एवं परम बैष्णव होते हुए भी विश्व-बंधुत्व की भावना से ओत-प्रोत थे।

गुप्त जी की राष्ट्रीयता ऐसी थी, जिसमें देश की दुर्दशा पर आँसू नहीं बहाया जाता। हाथ-पर-हाथ रखकर अकर्मण्य बनकर नहीं बैठा जाता है। उनकी चेतना अतीतोन्मुखी है, किन्तु यह स्वर्णिम अतीत, भविष्य को उज्ज्वल अलोक प्रदान करता है।

नोट - यह सभी सामग्री इन्टरनेट से ली गई है , इसका लेखन हमने नहीं किया और ना ही इस पर हमारा कोई अधिकार है . विद्यार्थियों के लिए उपयोगी समझ कर इसे पोस्ट रूप में साझा किया जा रहा है . 

SYBA बिहारी के दोहे