Thursday, July 20, 2017

मैं नीर भरी दुख की बदली! / महादेवी वर्मा

मैं नीर भरी
मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झणी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रंग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!

मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!

No comments:

Post a Comment

रामधारी सिंह दिनकर : राष्ट्रचेतना और मानवीय संवेदना के कवि

रामधारी सिंह दिनकर : राष्ट्रचेतना और मानवीय संवेदना के कवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती हिंदी साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के लिए एक म...