Monday, August 3, 2020

स्वराज्य का सपना और प्रेमचंद ।

          स्वराज्य का सपना और प्रेमचंद ।

                                                       डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

सहायक प्राध्यापक – हिन्दी विभाग

के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय

कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र

manishmuntazir@gmail.com

 

 

             हिन्दी पट्टी के लोगों के लिए सचमुच यह गर्व का विषय है कि उनके पास प्रेमचंद जैसा कद्दावर कथाकार “है” । एक ऐसा कथाकार जिसने भारतीय साहित्य की अग्रिम पंक्ति में अपना स्थान बनाया । प्रेमचंद ने जो लिखा वो लोगों को अपना सा लगा । हिन्दी पट्टी को साहित्य के मंच से समाज सुधार के लिए वैचारिक स्तर पर आंदोलित करने वाले प्रेमचंद प्रमुख और अगुआ लेखक हैं ।

            हिन्दी पाठकों की जमीन प्रेमचंद के पूर्व जासूसी और अइयारी उपन्यासों से देवकीनंदन खत्री जैसे लेखक कर चुके थे । इन उपन्यासों की लोकप्रियता का आलम यह था कि लोगों ने इन उपन्यासों को पढ़ने के लिए हिन्दी सीखी । कल्पना, जासूसी, ऐय्यारी, तिलिस्म  की दुनिया में भ्रमण करने वाले इन पाठकों को यथार्थ की ठोस जमीन पर समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ़ वैचारिक स्तर पर गंभीर बनाना आसान नहीं था । यह वैसा ही था जैसे दिनभर अपनी मर्जी से कहीं भी घूमने-फ़िरने वाले किसी बालक का अचानक स्कूल में दाखिला करा देना । दाख़िला कराना आसान है लेकिन बच्चे के अंदर अनुशासन और अध्ययन रुचियों का निर्माण कराना कठिन है । इस कठिन कार्य को प्रेमचंद ने कर दिखाया ।

           प्रेमचंद इसलिए नहीं बड़े लेखक हैं कि उन्होने बड़ा लोकप्रिय साहित्य लिखा अपितु समाज के लिए उपयोगी साहित्य को लिखना एवं उसे लोकप्रिय बनाने के लिए, प्रेमचंद को  अधिक याद किया जायेगा । प्रेमचंद ने हिन्दी पट्टी के पाठकों की रुचियों का परिमार्जन किया । समाज और समाज की समस्याएँ जो कि साहित्य के हाशिये पर थी उसे केंद्र में स्थापित करने का श्रेय प्रेमचंद को है । 1918 से लेकर 1936 तक के समय में प्रेमचंद ने बेहतरीन कथा साहित्य लिखा । हंस जैसी पत्रिका का संपादन किया । उर्दू और हिन्दी के बीच में एक सेतु बनाने का कार्य भी प्रेमचंद ने किया । अपने समय के दबाव के बावजूद अपनी रचना को नया कलेवर दिया ।  

             प्रेमचंद के प्रशंसकों में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी एक थे । अपूर्वानंद अपने आलेख में लिखते हैं कि, “नेहरू ने आर. के. करंजिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम सब गाँधी-युग की संतान हैं। हिन्दी साहित्य में किसी प्रेमचंद-युग की चर्चा नहीं होती, उर्दू साहित्य में भी शायद नहीं। लेकिन यह कहना बहुत ग़लत न होगा कि अज्ञेय हों या जैनेंद्र या और भी लेखक, वे प्रेमचंद-युग की संतान हैं।’’1 प्रेमचंद ने सिर्फ़ गाँव-जवार को ही अपने साहित्य में चित्रित नहीं किया अपितु उनके साहित्यिक क़नात के नीचे गाँव और शहर दोनों थे । शायद यही कारण था कि अपने समय के समाज को अधिक व्यापक रूप में वो चित्रित कर सके ।

            प्रेमचंद का समय आंतरिक जटिलताओं के संघर्ष का समय था । हिन्दी – उर्दू का झगड़ा चरम पर था । एक तरफ़ अल्ताफ हुसैन हाली तो दूसरी तरफ़ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अपनी – अपनी पताका संभाले हुए थे । बंगाल का विभाजन हो चुका था। महात्मा गांधी भारत की आज़ादी के नये नायक के रूप में लोकप्रिय हो रहे थे । गहरे उपनिवेशवाद की छाप गाँव से लेकर शहर तक दिखाई पड़ रही थी । यद्यपि प्रेमचंद के गावों में उसतरह की कुलबुलाहट नहीं थी जैसी कि आज़ादी के तुरंत बाद फणीश्वरनाथ रेणु के “मैला आँचल” में दिखाई पड़ती है । फ़िर भी बहुत कुछ था जो बदल रहा था । रेलवे, फैक्ट्रियाँ, सड़कें, चीनी मिलें, सिनेमा, अंग्रेज़ों के वफ़ादार जमीदार, रायसाहब इत्यादि के ताने-बाने के बीच समाज में बदलाव और संघर्ष की एक आंतरिक धारा थी । इसकी एक झलक किसानों के अंदर पनप रहे विद्रोह में भी देखी जा सकती है । रमा शंकर सिंह लिखते हैं कि  “बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में अवध में किसान आंदोलनों की श्रृंखला चल पड़ी थी। प्रतापगढ़ में बाबा रामचंद्र किसानों से कह रहे थे कि वे अंग्रेजों को टैक्स न दें।“2

          जगह-जगह छापे खाने खुल रहे थे । तरह-तरह की पत्र – पत्रिकाओं के माध्यम से समाज प्रबोधन का कार्य हो रहा था । राजा रवि वर्मा जैसे कलाकार मंदिरों में कैद देवी-देवताओं को पोस्टर चित्रों के माध्यम से घर-घर पहुंचा चुके थे । अछूतानंद जैसे नायक दलित समाज को आंदोलित कर रहे थे तो डॉ. भीमराव आंबेडकर अपनी शिक्षा पूरी कर के भारत आ चुके थे । स्त्रियाँ शिक्षित हो रहीं थी । उनके अधिकारों एवं शिक्षा को लेकर पक्षधरता बढ़ रही थी । 1894 के भूमि अधिग्रहण क़ानून का विरोध और दमन दोनों हुआ । जालियावाला बाग जैसा जघन्य हत्याकांड अंग्रेज़ सरकार पहले ही कर चुकी थी । इन तमाम घटनाओं के बीच से प्रेमचंद सेवा सदन, गोदान और रंगभूमि जैसे उपन्यास लिखते हैं । प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जिस तरह से ब्रिटिश सरकार उपनिवेशवाद की जड़ों को भारत में जमा रही थी उसका एक व्यापक चित्र प्रेमचंद के साहित्य में मिलता है । 

         स्वामी दयानंद सरस्वती का “आर्य समाज” जिस तरह से देश में सक्रिय था उससे प्रेमचंद भी प्रभावित हुए । समाज में व्याप्त वेश्यावृत्ति की समस्या का निराकरण जिस तरह वे “सेवा सदन” बनाकर दिखाते हैं, उससे उनपर आर्य समाज के प्रभाव को साफ़ देखा जा सकता है । कुछ विद्वानों का मानना है कि यह प्रभाव सिर्फ़ आर्य समाज का नहीं था । इस संदर्भ में रमा शंकर सिंह अपने लेख में लिखते हैं कि,“विक्टोरियन नैतिकताबोध से भारतीय समाज के ऊपर कानून लाद दिए गए थे और भारतीय पुरुष समाज सुधारक जैसे मान चुके थे कि स्त्री का उद्धार करना उनका पुनीत कर्तव्य है।’’3 इन्हीं सब के बीच प्रेमचंद साहित्य के समाज और समाज के साहित्य दोनों को बदल रहे थे । उनके इस बदलाव को समाज ने भी स्वीकार किया क्योंकि वह कोई वैचारिक या काल्पनिक बदलाव मात्र नहीं था । इस बदलाव का एक अंडर करेंट समाज महसूस कर रहा था जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है ।

             प्रेमचंद लेखन की शुरुआत उर्दू से करते हैं । उनकी कृतियों को अंग्रेज़ सरकार प्रतिबंधित करती है । प्रेमचंद सहज,सरल और सपाट भाषा में लिखते हैं ताकि सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी उसे आसानी से समझ सके । वे प्रगतिशील विचारों के अगुआ बनते हैं । साहित्य को उस मशाल की संज्ञा देते हैं जो राजनीति के आगे-आगे चलकर उसका पथ प्रदर्शन करे । 1906 से 1936 तक लिखा गया उनका पूरा साहित्य अपने समय और समाज की त्रासदी का बयान है । मंगलसूत्र उपन्यास वो पूरा नहीं कर सके । कफ़न उनकी लिखी अंतिम कहानी साबित हुई । अंतिम पूर्ण उपन्यास के रूप में उन्होने गोदान जैसी सशक्त रचना दी । कमल किशोर गोयनका ने उनकी 25 से 30 लघु कहानियाँ भी खोजी हैं जो पाठकों के लिए सहज रूप से उपलब्ध हो चुकी है । बलराम अग्रवाल अपने आलेख – प्रेमचंद की लघु कथा रचनाएँ में इसकी विस्तार से चर्चा कर चुके हैं ।4 प्रेमचंद ने तीन सौ के आस-पास कहानियाँ लिखीं । अधिकांश कहानियों के केंद्र में समाज की कोई न कोई समस्या है । पंच परमेश्वर, पूस की रात, ठाकुर का कुआं , नमक का दरोगा, आत्माराम, बड़े घर की बेटी, आभूषण, कामना, बड़े भाई साहब, सत्याग्रह, घासवाली और कफ़न जैसी उनकी कहानियाँ अधिक लोकप्रिय रही हैं । लेकिन उनकी समस्त कहानियों में समस्याओं और सूचनाओं का इतना अंबार है कि हिन्दी पट्टी के समाज और समाज मनोविज्ञान को समझने में ये बहुत सहायक हैं । साहित्य को सामाजिक सरोकारों एवं प्रगतिशील मूल्यों के साथ जोड़कर प्रेमचंद ने एक नई परिपाटी शुरू की ।  

          डॉ. कमल किशोर गोयनका ने तमाम प्रमाणों एवं साक्ष्यों के आधार पर यह साबित किया है कि प्रेमचंद को जिस तरह रामविलास शर्मा जी गरीब और जीवन भर तंगी में ही रहने की बात करते हैं वह गलत है ।5 प्रेमचंद की माली हालत हमेशा ठीक ठाक रही । लेकिन उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से हमेशा ही उस शोसित-वंचित की चिंता की जो ब्रिटिश कालीन उपनिवेशिक समाज में सम्पन्न वर्ग द्वारा निचोड़ा जा रहा था । प्रेमचंद का समय कई विचारधाराओं के उत्थान का भी समय था । निश्चित था कि प्रेमचंद भी किसी न किसी रूप में इनसे प्रभावित होते । किसान आंदोलन, भूमि अधिग्रहण कानून, रुसी क्रांति, लियो टोल्सटाय, गांधी और डॉ आंबेडकर की विचारधाराओ ने प्रेमचंद को प्रभावित किया । 1927 से डॉ. अम्बेडकर के आंदोलनों की तीव्रता ने पूरे देश को प्रभावित किया । प्रेमचंद की कई महत्वपूर्ण कहानियाँ इसी के बाद ही आयीं । जैसे किठाकुर का कुँआ”, “दूध का दाम”, “सद्गति” और उनकी अंतिम कहानी “कफ़न” । यद्यपि कफ़न को लेकर दलित साहित्य समीक्षकों ने प्रेमचंद की कड़ी निंदा भी की है लेकिन वह एक ख़ास नजरिये से देखना भर है, उसमें समग्रता का अभाव है ।

         31 जुलाई 1880 को जन्में प्रेमचंद ने 08 अक्टूबर 1936 को अंतिम सांस ली । तमाम सामाजिक,राजनीतिक परिस्थितियों और विचारधाराओं के बीच प्रेमचंद जिस भारत की संकल्पना को अपने साहित्य के माध्यम से साकार कर रहे थे वहाँ समतामूलक सर्वसमावेशी स्वराज्य का सपना था । उनकी राष्ट्रियता की छवि में जन्मगत वर्ण व्यवस्था की गंध तक स्वीकार्य नहीं थी । नवजागरण की पृष्ठभूमि से उठे सारे सवालों को वे अपने साहित्य के माध्यम से उठा रहे थे । राष्ट्रीय रंगमंच पर गांधी और आंबेडकर के विचारों से उस भारत को गढ़ना चाह रहे थे जिसमें मनुष्यता महत्वपूर्ण है । चित्त की उदारता सिर्फ़ विचारों और ग्रंथों तक सीमित न होकर वह व्यवहार का हिस्सा बने, यह प्रेमचंद की इच्छा थी । उपनिवेशिक दबाव और प्रभाव के बीच भारत का जो छविकरण “Land of Religion and Philosophy” के रूप में किया जा रहा था वह इस भारत की समग्र आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं था । उसमें वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भविष्य की संकल्पना स्पष्ट नहीं थी ।

         प्रेमचंद ने साहित्य को अपने समाज और समय की धड़कन में बदलते हुए नायकत्व की पूरी परिपाटी को बदल दिया । मनुष्यता को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया । अनुभूति की जीवंतता को प्रेमचंद ने महत्वपूर्ण माना । उत्तर भारत की स्मृतियों, अनुभूतियों, रंग, रूप, रस और गंध सबकुछ प्रेमचंद ने अपने साहित्य में समेटा । भूत और भविष्य की चिंता को व्यर्थ का भार मानने वाले प्रेमचंद अपने वर्तमान को पूरी समग्रता से चित्रित करते हैं । समाज के दबे – कुचले और शोषित वर्ग को मनुष्यता का स्वर प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से ही दिया । कठिनाइयों से लड़ने के लिये गति और बेचैनी को प्रेमचंद महत्वपूर्ण मानते थे । वे एक ऐसे साहित्य के हिमायती थे जो संघर्ष के लिये बेचैनी पैदा करे । प्रेमचंद के साहित्य में समय विशेष का लोक चित्त और उसका इतिहास धड़कता है ।

              प्रेमचंद ने गाँव के जिस जीवंत परिवेश का चित्रण करते हैं उसने उनकी बाद की पीढ़ी के लिए एक रास्ता प्रसस्त किया । सरोकारजन्य साहित्य की परिपाटी उन्हीं की देन है । प्रेमचंद के बाद शिव प्रसाद सिंह, फणीश्वरनाथ रेणु, चन्द्र्किशोर जायसवाल, अमरकांत, संजीव, रामधारी सिंह दिवाकर, राकेश कुमार सिंह, मैत्रयी पुष्पा, काशीनाथ सिंह, देवेन्द्र, अखिलेश, महेश कटारे, सत्यनारायण पटेल और शिवमूर्ति जैसे कथाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया । प्रेमचंद की परंपरा में कई शाखाएँ मानी जा सकती हैं जो उनके विचारों को अग्रगामी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

             प्रोफ़ेसर चित्त रंजन मिश्र के अनुसार  गोरखपुर के बाले मियाँ के मैदान में गाँधी जी का भाषण सुनने के बाद ही उन्होने सरकारी नौकरी से 1921 में त्यागपत्र दिया । बाद में वे लमही अपने गाँव लौट गये थे । प्रेमचंद के साहित्य की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि प्रेमचंद अपने पात्रों की आर्थिक स्थिति का वर्णन अवश्य करते हैं । न केवल वर्णन करते हैं अपितु उस पैसे के आने और जाने के संदर्भ को भी बड़े सलीके से चित्रित करते हैं । यह अर्थ उस व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में क्या बदलाव लाता है, उसकी सोच को किस तरह प्रभावित करता है, इसका व्यापक चित्र खींचते हैं । कबीर और तुलसी के बाद संभवतः प्रेमचंद का ही पाठक वर्ग सबसे बड़ा हो । इन पाठकों तक प्रेमचंद धर्म और कर्मकांडों के माध्यम से नहीं अपितु धार्मिक पाखंडों की पोल खोलते हुए पहुँचते हैं । सामाजिक विसंगतियों की गाँठों को लेकर अपने पाठकों तक जाते हैं ।  प्रेमचंद ख़ुद भी अपने आप को वैचारिक स्तर पर माँजते रहे । सन 1916 से 1936 तक आते-आते प्रेमचंद में यह बदलाव साफ़ दिखायी पड़ता है । प्रेमचंद की हिन्दी वह हिंदुस्तानी थी जिसकी बात गाँधी जी करते थे । ठेठ जन की भाषा को उन्होने अपनाया ।

            फ़िल्मों की दुनियाँ में भी प्रेमचंद ने क़दम तो रक्खा लेकिन वे यहाँ से निराश अधिक हुए ।  प्रेमचंद की लिखी फिल्म ‘द मिल मजदूर’ मुंबई में 5 जून 1939 को इंपीरियल सिनेमाघर में लंबी लड़ाई के बाद रिलीज हुई थी। वैसे तो यह फिल्म 1934 में ही बनकर  तैयार हो चुकी थी, लेकिन उस समय मुंबई के बीबीएफसी (बॉम्बे बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) ने इसे प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं प्रदान की । उन्हें यह लगता था कि फ़िल्म मजदूरों को बरगला सकती है और वे हड़ताल कर सकते हैं । तत्कालीन सेंसर बोर्ड में सदस्य के रूप में शामिल बेरामजी जीजीभाई मुंबई मिल एसोसिएशन के भी अध्यक्ष थे, वे इस फ़िल्म को मिल  एसोसिएशन के हितों के अनुकूल नहीं समझते थे । 1937 में बीबीएफसी का फिर से गठन हुआ और नए सदस्य चुने गए। तब जाकर इस फ़िल्म को प्रदर्शित करने का रास्ता साफ हुआ । यह फ़िल्म प्रेमचंद की मृत्यु के बाद प्रदर्शित हुई ।

          प्रेमचंद खेतिहर भारतीय जनमानस के सबसे बड़े और सबसे अधिक स्वीकृत कथाकारों में रहे हैं । उनके साहित्य के माध्यम से बहस और चिंतन की गुंजाइस लगातार बनी हुई है । वे अपनी किरदार निगारी में अद्भुद रहे । प्रेमचंद का साहित्य अपने समय की वास्तविकता की तलाश है । इस तलाश की केन्द्रिय इकाई मानवीयता है । प्रेमचंद ने अपने पाठकों के साथ जिस विश्वास की परंपरा का निर्माण किया, उतनी मज़बूत और व्यापक कड़ी उनके बाद का कोई भी लेखक अभी तक नहीं बना पाया है । अपने समय के संघर्ष का मानो प्रेमचंद इक़बालिया बयान दर्ज़ कर रहे हों ।

       

संदर्भ :

1.   प्रेमचंद 140 : सातवीं कड़ी : हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद-युग की चर्चा क्यों नहीं? –अपूर्वानंद https://www.satyahindi.com/literature/140-years-of-premchand-part-7

2.   प्रेमचंद का सूरदास आज भी ज़मीन हड़पे जाने का विरोध कर रहा है और गोली खा रहा है! – रमा शंकर सिंह, https://junputh.com/open-space/rama-shankar-singh-on-premchand-jayanti

3.   वही 

4.   प्रेमचंद की लघु कथा रचनाएँ – बलराम अग्रवाल https://www.bharatdarshan.co.nz/magazine/articles/606/premchand-ki-laghukatha-rachanayein

5.   प्रेमचंद गरीब थे, यह सर्वथा तथ्यों के विपरीत है – रोहित कुमार हैप्पी’, https://www.bharatdarshan.co.nz/magazine/articles/600/grib-nahi-the-premchand.html?

  

 

 

                                            


Saturday, July 25, 2020

SYBA की आन लाइन कक्षाएं शुरू ।

SYBA के विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि उनकी आन लाईन हिंदी की कक्षाएं आज से शुरू हो गई हैं । इस वर्ष उन्हें पेपर दो और तीन पढ़ना होगा । नया पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय की तरफ़ से अभी औपचारिक रूप से घोषित नहीं किया गया है लेकिन संभावना है कि दो चार दिन में इसकी घोषणा हो जायेगी । तब तक हम पेपर तीन के पुराने पाठ्यक्रम के आधार पर पढ़ाई जारी रख सकते हैं । इस पेपर में अधिक बदलाव नहीं हुआ है ।
समय सारिणी के अनुसार सोमवार से शनिवार रोज सुबह 10.40 से 11.30 तक हिंदी की कक्षाएं संचालित होंगी । ज़ूम का लिंक आप को व्हाट्स एप के माध्यम से से दिया जाएगा ।

Wednesday, July 22, 2020

फणीश्वरनाथ रेणु : जन्मशती के बहाने । डॉ मनीष कुमार मिश्रा




 
                भारत की आत्मा जिन ग्रामीण अंचलों में बसती है, उन्हीं अंचलों के जीवनानुभव को जिस सलीके और शैली से रेणु प्रस्तुत करते रहे, वह हिन्दी साहित्य में दुर्लभ है । यह प्रेमचंद की परंपरा ही नहीं अपितु कई संदर्भों में उसका विकास भी था । विकास इस रूप में कि प्रेमचंद के विचारों और स्वप्नों को उन्होने अग्रगामी बनाया । प्रेमचंद का समय औपनिवेशिक था जब कि रेणु के समय का भारत स्वतंत्र हो चुका था । स्वाभाविक रूप से रेणु के ग्रामीण अंचलों में गतिशीलता और जटिलता दोनों अधिक थी । प्रेमचंद की तुलना में रेणु के गाँव अधिक डाईमेनश्नल हैं । इसलिये जैसी गलियाँ, गीत और नांच रेणु के यहाँ मिलते हैं वे प्रेमचंद के यहाँ नहीं हैं । आज़ादी के तुरंत बाद मैला आँचल जैसे उपन्यास के माध्यम से उन्होने इस देश की भावी राजनीति की नब्ज़ को जिस तरह से टटोला वह उन्हें एक दृष्टा बनाता है । अपने साहित्य के माध्यम से रेणु ने भारतीय ग्रामीण अंचलों की पीड़ा का सारांश लिखा है । अशिक्षा, रूढ़ियाँ, सामंती शोषण, गरीबी, महामारी, अंधविश्वास, व्यभिचार और धार्मिक आडंबरों के बीच साँस ले रहे भारतीय ग्रामीण अंचलों के सबसे बड़े रंगरेज़ के रूप में रेणु को हमेशा याद किया जायेगा । 
                आज़ अगर रेणु होते तो आयु के सौ वर्ष पूरे कर रहे होते । रेणु हमारे बीच नहीं हैं, है तो उनका लिखा हुआ साहित्य । यह साहित्य जो रेणु की उपस्थिति हमेशा दर्ज़ कराता रहेगा । संघर्ष के पक्ष में और शोषण के खिलाफ़ दर्ज़ रेणु का यह इक़बालिया बयान है । रेणु के साहित्य में जितनी गहरी और विवेकपूर्ण स्त्री पक्षधरता दिखायी पड़ती है वह अद्भुद है । रेणु के लिये जीवन कुछ और नहीं अपितु गाँव हैं । अपने पात्रों के माध्यम से रेणु ने विलक्षणता नहीं आत्मीयता का सृजन किया । गाँव उनके यहाँ मज़बूरी नहीं आस्था के केंद्र हैं । गाँव के प्रति उनकी यह आस्था अंत तक बनी रही ।
               रेणु अपने समाज की जटिलता को अच्छे से समझते थे । एक सृजक के अंदर जिस तरह के नैतिक साहस की आवश्यकता होती है, वह रेणु में थी । जिस वैचारिकी का वे समर्थन करते थे उसके भी वे अंधभक्त नहीं रहे,अपितु उसकी कमियों या उसके पथभ्रष्ट होने की स्थितियों का भी उन्होने विरोध किया । वे एक ईमानदार सृजक थे अतः अपने अतिक्रमणों के नायक रहे । अपने साहित्य और नैतिक साहस के दम पर सत्ता का प्रतिपक्ष खड़ा करते रहे । हाशिये के समाज को केंद्र में लाते रहे । प्रोफ़ेसर जितेंद्र श्रीवास्तव जी के अनुसार पूरे हिन्दी साहित्य में आदिवासी चेतना के प्रारम्भिक उभार को बड़े सलीके से रेणु ही प्रस्तुत करते हैं ।
            यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि रेणु पर शुरू में ही आंचलिकता का टैग लगा दिया गया । इससे उन्हें पढ़ने-पढ़ाने की पूरी परिपाटी ही बदल गई । बहस के केंद्र में संवेदनायें, विचारधारायें, सूचनायें और शिल्प न होकर आंचलिकता हो गई,जो की विडंबनापूर्ण थी  । आंचलिकता की अवधारणा ने उनकी ऊंचाई को कम किया । इसतरह एक पेजोरेटिव ( pejorative ) कैटेगरी रेणु के लिये बनाना उन्हें कमतर आँकने का षड्यंत्र लगता है । आज़ यह सुनने में अजीब लगता है कि मैला आँचल को शुरू में कोई प्रकाशक छापने को तैयार नहीं था । नलिन विलोचन शर्मा ने पहली समीक्षा इस पर पटना आकाशवाणी के माध्यम से  प्रस्तुत की थी । उसके बाद प्रकाशक इसे छापने को तैयार हुआ ।
              ‘मैला आँचल’ सबसे पहले सन 1953 में  समता प्रकाशन,पटना, द्वारा प्रकाशित हुआ था । बाद में 1954 में  राजकमल प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया । हालांकि बाद में कुछ समीक्षकों ने इसे एक “असंगत कृति” कहकर भी संबोधित किया । इस तरह की बातें तो समीक्षक प्रेमचंद के गोदान को लेकर भी करते रहे । लेकिन समय के साथ हर कृति अपने महत्व को स्वयं स्थापित कर देती है । प्रोफ़ेसर रमेश रावत का स्पष्ट मानना है कि – विचारधारा उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी की किसी रचना विशेष से मिलने वाली सूचनाएँ / जानकारियाँ महत्वपूर्ण हैं । गियर्सन तुलसीदास को बड़ा साहित्यकार इसीलिए मानता है क्योंकि तुलसी के साहित्य में आम व्यक्ति से लेकर विद्वान से विद्वान के लिये भी भरपूर सूचनाएँ और संदर्भ हैं ।
             रेणु के लेखन में यद्यपि गाँव केंद्र में हैं पर उसकी परिधि में पूरा भारत है । तेजी से बदलती हुई दुनियाँ इस गाँव की तस्वीर को भी बदल रही है । महकउआ साबुन और फ़िल्मी नायिकाओं की तस्वीर गाँव में भी आ रही हैं । रेणु जब लिख रहें हैं तो वह समय महानगरों का है । लेखन के केंद्र में भी महानगर हैं । ऐसे में गाँव की तमाम समस्याओं, सीमाओं, दुर्बलताओं, विकृतियों के बावजूद वो अपनी आस्था को यहीं केन्द्रित करते हैं । गाँव से शहर में पलायन की मज़बूरी को रेणु लगातार चित्रित करते हैं । मज़बूरी इसलिये क्योंकि पलायन के मूल में रोजी रोटी की समस्या है न कि गांवों के प्रति कोई अनास्था ।
          रेणु की एक बहुत बड़ी विशेषता यह भी रही कि वे अपनी रचनाओं के शिल्प के लिए पश्चिम के मान्य एवं स्वीकृत ढाँचों की तरफ़ आकर्षित नहीं होते अपितु भारतीय लोक परंपराओं में प्रचलित रूपों को अपनाते हैं । अपनी भाषा शैली के माध्यम से भी वे बोली और भाषा के बीच ताना-बाना बुनने की कोशिश करते हैं । रेणु का शिल्प उस परिवेश का ही है जिसे वे लगातार चित्रित करते रहे । रेणु एक लेखक के रूप में लिखकर जो दिखाना चाहते हैं ,दरअसल वह उनकी दृष्टि ही बड़ी महत्वपूर्ण है । रेणु आज़ादी के तुरंत बाद के भारत की राजनीति की जो छवि “मैला आँचल” जैसे उपन्यास में दिखाते हैं, वह उन्हें एक भविष्य दृष्टा के रूप में स्थापित करता है । 
               रेणु जो देख रहे थे वह निश्चित ही निराशा जनक था । वे पक्ष प्रतिपक्ष की तमाम आलोचनाओं के बीच अपनी रचनधर्मिता के माध्यम से उस आम आदमी की राजनीति को बख़ूबी दर्ज़ कर रहे थे जो राज़नीति के वास्तविक फ़लक पर हाशिये की ओर ठेल दिया गया था । यह एक जिम्मेदार लेखक की उपयोगी परंतु चुनौतीपूर्ण राजनीति थी । एक लेखक के रूप में उन्होने आम आदमी की राजनीति को बख़ूबी अंजाम दिया । इस बात के परिप्रेक्ष्य में मैं यह कह सकता हूँ कि रेणु कभी भी राजनीति से अलग नहीं हुए । जिस इलाक़े में सन 1942 के बाद भी राजनीतिक बातें अफ़वाहों के रूप में पहुँच रही थी ( मैला आँचल) वहाँ इतनी जबरजस्त राजनीतिक चेतना रेणु के अतिरिक्त कौन चित्रित कर सकता था ?
              ये रेणु का ही साहस था कि वे पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में, जे पी की उपस्थिति में पद्मश्री को ‘पापश्री’ कहकर लौटा देते हैं । आंदोलनों को जीने की चेष्टा मानने वाले रेणु,स्वयं को ‘राजनीतिक नेता’ नहीं मानते थे । यद्यपि वे 1972 में विधानसभा का चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ते हैं । रेणु इस संदर्भ में अपने एक साक्षात्कार में कहते भी हैं कि, “अतः मैंने तय किया था कि मैं खुद पहन कर देखूं कि जूता कहां काटता है। कुछ पैसे अवश्य खर्च हुए, पर बहुत सारे कटु-मधुर और सही अनुभव हुए। वैसे भविष्य में मैं कोई चुनाव लड़ने नहीं जा रहा हूं। लोगों ने भी मुझे किसी सांसद या विधायक से कम स्नेह और सम्मान नहीं दिया है। आज भी पंजाब और आंध्र के सुदूर गांवों से जब मुझे चिट्ठियां मिलती हैं तो बेहद संतोष होता है। एक बात और बता दूं, 1972 का चुनाव मैंने सिर्फ कांग्रेस के खिलाफ ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ लड़ा था।’’1 यह चुनाव रेणु हार गये थे ।
            जिन आलोचकों ने रेणु के ऊपर यह आरोप लगाया कि उनके अंदर आभिजात्य के प्रति मोह है, उन्होने शायद समग्रता और गहराई में रेणु का मूल्यांकन नहीं किया । आदिवासी समाज़ और आधी आबादी की जैसी वैचारिक पक्षधरता रेणु ने दिखाई, उसके बाद भी ऐसे आरोप समझ में नहीं आते । रेणु की आलोचना यह कहकर भी होती रही है कि उन्होने काल्पनिक आदर्शवादी पात्रों को गढ़कर एक झूठा आशावाद सामने लाया जिससे शोषण के विरुद्ध जो जन आक्रोश पैदा हो सकता था वो दब गया । इस तरह की आलोचना रेणु के लेखकीय अधिकारों का हनन है । रेणु ने ग्रामीण जीवन के अँधेरे उजाले संदर्भों का जिस तरह से आलिंगन किया और जैसी एकनिष्ठता उन्होने दिखाई वह अन्यत्र दुर्लभ है ।
             रेणु के आंचलिक वितान के फलस्वरूप प्रेमचंद के बाद गाँव फिर से हिन्दी साहित्य में मज़बूत दखल के साथ दर्ज़ होता है । यह दखल रेणु की कहानियों और उपन्यासों के साथ संयुक्त रूप से होता है । यहाँ तक कि जब उनकी कहानी मारे गये गुलफाम के आधार पर तीसरी कसम फ़िल्म बनी तो वहाँ भी रेणु ने सम्झौता बिलकुल नहीं किया । फ़ायनानसर का बहुत मन था कि फ़िल्म के अंत में रेलगाड़ी की चैन खीचकर हीरामन और हीराबाई को मिला दिया जाय । लेकिन रेणु ने साफ़ कह दिया कि अगर ऐसा करना है तो फ़िल्म से लेखक के रूप में उनका नाम हटा दिया जाय । इस पूरी फ़िल्म ने उस ग्रामीण परिवेश,उसके लोकगीतों और लोक कथाओं को सदा के लिये अमर कर दिया ।
            रेणु अपने कथा साहित्य के साथ ही अपने लिखे रिपोर्ताज़ के लिये भी जाने जाते हैं । यह साहित्य को द्वितीय विश्व युद्ध की देन है । रेणु इस संदर्भ में लिखते भी हैं कि, ‘गत महायुद्ध ने चिकित्साशास्त्र के चीर-फाड़ विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा-विभाग को रिपोर्ताज !’2 रिपोर्ताज़ घटनाओं का सजीव वर्णन है । यह शब्दों के माध्यम से विडिओग्राफ़ी जैसा है । घटित घटनाओं के क़रीब जाकर संवेदना के धरातल पर रिपोर्ताज़ का लेखन आसान नहीं । महामारी के दिनों में रेणु ख़ुद ऐसी जगहों पर जाकर उनपर रिपोर्ताज़ लिखते, तस्वीरें लेते या कि रिपोर्टिंग करते ।
            कई बार ऐसी सजीव रिपोर्टिंग से सत्ता पक्ष की चूलें खड़ी हो जाती थीं । रेणु इस संदर्भ में स्वयं कहते हैं कि, “.....बिहार में 1967 में जब भयंकर अकाल पड़ा था तो पहले – पहल मैंने और अज्ञेय जी ने अकालग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया था। उसकी रपट दिनमान में छपी थी। उस दौरे के दौरान हमने अकाल की विभीषिका दिखाने वाले अनेक चित्र लिये थे जिन पर सरकार को एतराज भी हो सकता था और वह हमें गिरफ्तार भी कर सकती थी। पर वह काम उसने तब नहीं किया। गत 9 अगस्त, 1974 को फारबिसगंज (पूर्णिया) में किया जहां हमने बाढ़ पीड़ितों की राहत के लिए प्रदर्शन किया था। साहित्यकारों की भूमिका के संबंध में एक बात और कह दूं। 1967 में सूखाग्रस्त क्षेत्रों के चित्रों की कनाट प्लेस में प्रदर्शनी लगाई गयी थी और उससे प्राप्त पैसे सूखा पीड़ितों की सहायता में भेज दिये गये थे।’’3 
         पश्चिम की इस लोकप्रिय शैली से रेणु भी गहरे प्रभावित हुए । रेणु इस संदर्भ में ‘सरहद के उस पार’ नामक अपने रिपोर्ताज में स्वयं लिखते भी हैं कि ‘‘मुझे नेपाल के जंगलों में ही राजनीति और साहित्य की शिक्षा मिली है। नेपाल की काठ की कोठरी में ही मैने समाजवाद की प्रारंभिक पुस्तकों से लेकर महान ग्रंथ ‘कैपिटल” तक को पढ़कर समझने की धृष्टता की है। पहाड़ की कंदराओं में बैठकर बंसहा कागज की बही पर ‘रशियन रिवोल्युशन” को नेपाली भाषा में अनुवाद करते हुये उस पागल नौजवान की चमकती हुई आँखों को मैने अपनी जिंदगी में मशाल के रूप में ग्रहण किया है।’’4 हिन्दी साहित्य में इस विधा को शुरू करने का कार्य शिवदान सिंह चौहान ने किया जिसे रेणु जैसे रचनाकारों ने नई ऊंचाई प्रदान की । इसकी परंपरा को अग्रगामी बनाने में जिन अन्य साहित्यकारों की महती भूमिका रही उनमें रांगेय राघव, अश्क, धर्मवीर भारती,  श्रीकांत वर्मा, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा और विवेकी राय का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है ।
           रेणु हिन्दी साहित्य में अपनी मौलिकता, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के लिये सदैव याद किये जाते रहेंगे । रेणु की संवेदना, शिल्प और शब्द एकसाथ मिलकर पाठकों के समक्ष जो चित्र प्रस्तुत करते हैं, वह अपने समय का आख्यान बनकर संघर्ष के लिये रोमांच एवं रोमांस पैदा करता है । यह रोमांच ही हमारी चेतना को रिक्त नहीं होने देता ।
       
                         
     
        संदर्भ :
1. यह साक्षात्कार सुरेन्द्र किशोर द्वारा की गई बातचीत है जो प्रतिपक्ष के 10 नवंबर 1974 के अंक में छपी थी। हमें https://phanishwarnathrenu.com पर यह उपलब्ध मिला ।
2. लेख / अनंत – रेणु और रिपोर्ताज जो कि https://phanishwarnathrenu.com पर उपलब्ध है ।
3. संदर्भ 1
4. संदर्भ 2

संदर्भ ग्रंथ सूची :
1. फणीश्वरनाथ रेणु : संभवंति युगे-युगे – शिवमूर्ति, कंचनजंघा : पीअर रिव्यूड छमाही ई-जर्नल । अंक-01,वर्ष -01, जनवरी – जून 2020 ।
2. https://atmasambhava.blogspot.com/2016/08/blog-post_14.html नलिन विलोचन शर्मा बनाम रामविलास शर्मा (अर्थात् ‘मैला आँचल’ पर पक्ष-विपक्ष)
3. https://phanishwarnathrenu.com
4. कहानीकार फणीश्वरनाथ रेणु : प्रेमकुमार मणि https://samalochan.blogspot.com/

                                                                                     डॉ मनीष कुमार मिश्रा


     

Tuesday, July 21, 2020

इंटरनेट पर उपलब्ध हिंदी साहित्य संबंधी लिंक ।


 https://youtu.be/wDgiY-oSE70
पं. चंंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की कहानी 'उसने कहा था' पर आधारित विमल राॅय निर्मित चलचित्र!


 https://youtu.be/xAPmYZHx560
महियसी महादेवी वर्मा लिखित रेखाचित्र 'नीलकंठ मोर' पर आधारित अॅनिमेटेड चलचित्


 https://youtu.be/SF3TdaGj4f0
श्रीमती मन्नु भंडारी लिखित उपन्यास 'आपका बंटी' पर आधारित चलचित्र 'समय की धारा'


https://youtu.be/1bubUbjXK6w
श्री. हरिशंकर परसाई जी लिखित व्यंगकथा 'सदाचार का तावीज' पर आधारित अॅनिमेटेड चलचित्र

https://youtu.be/CQN7mdWBpjo
हरिशंकर परसाई जी लिखित व्यंगकथा 'एक तृप्त आदमी' पर आधारित कहानी वाचन


https://youtu.be/ufvi5PFeXsI
हरिशंकर परसाई की व्यंगकथा 'रामसिंह की ट्रेनिंग' पर आधारित लघुचलचित्र


 https://youtu.be/JBIjklHxpOs
हरिशंकर परसाई लिखित व्यंगकथा 'एक दीक्षांत भाषण' की समीक्षा


 https://youtu.be/o8FtVOmm3JA
माधवराव सप्रे लिखित कहानी 'एक टोकरी भर मिट्टी' का वाचन


https://youtu.be/3twNYaNB1FA
चंंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' की कहानी 'उसने कहा था' का वाचन

Monday, July 6, 2020

Poetry of self revelation

https://onlinehindijournal.blogspot.com/2020/07/poetry-of-self-revelation-appreciation.html?m=1

Saturday, June 27, 2020

शकुंतिका : विश्वास की परंपरा का निर्माण ।


शकुंतिका : विश्वास की परंपरा का निर्माण ।
                                           डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
                                                                       



                  भगवनदास मोरवाल का जन्म 23 जनवरी 1960 को नगीनामेवात में हुआ । आप ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की । पत्रकारिता में डिप्लोमा भी किया । आप के अभी तक प्रकाशित उपन्यास हैं काला पहाड़ (1999), बाबल तेरा देस में (2004), रेत (2008),नरक मसीहा (2014)हलाला (2015)सुर बंजारन (2017)वंचना (2019) तथा शकुंतिका (2020) इनके आतिरिक्त चार कहानी संग्रहएक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आप के लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएं प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं। आप अपनी रचना शीलता के लिए कई सम्मानों से विभूषित हो चुके हैं ।

               शकुंतिका आप का नवीनतम उपन्यास है । उपन्यास का कथानक सपाट और भाषा सहज – सरल है । यह छोटा सा उपन्यास भारतीय समाज की उस धारणा में आये बदलाव को रेखांकित करता है जो लड़कियों को लड़कों से कमतर आँकती रही है । लेकिन जिस बदलाव को लेखक दिखा रहा है और जितनी सहजता से चित्रित कर रहा है वह भारत के समाज का कितना वास्तविक चित्र है, यह विचारणीय है ।

                “बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ” जैसी सरकारी योजनाएँ हरियाणा से शुरू हुई । यह वही राज्य है जहां लड़के – लड़कियों का अनुपात पूरे देश में सबसे ख़राब रहा है । विवाह के लिए दूसरे राज्यों से लड़कियों को लाने के लिए यह समाज मजबूर हुआ । दूसरे राज्यों से आयी ये लड़कियां “पारो” कहलाईं । इसी राज्य से जुड़े मोरवाल जी अगर शकुंतिका जैसे उपन्यास को लिखते हैं तो निश्चित तौर पर यह समाज की उस कटु सच्चाई की पृष्ठभूमि ही रही होगी जिसने उन्हें ऐसे विषय को चुनने के लिए मजबूर किया होगा । ऐसे विषयों पर सरकारी अभियान, फिल्में इत्यादि भी लगातार इस दशक में हमें झकझोरती रहीं । “ मारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के ?” दंगल फ़िल्म का यह संवाद उस बराबरी की ही वकालत करता हुआ दिखाई पड़ता है । इसी दशक के अंतिम पड़ाव पर मोरवाल जी शकुंतिका लिखते हैं ।
           
            पुनर्वासित लोगों की कालोनी के दो परिवार इस उपन्यास के केंद्र में हैं । अपितु ऐसा कहना चाहिए कि इन दोनों परिवारों की मनोदशा ही इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र है । वैसे ही जैसे अमरकांत के उपन्यास “इन्हीं हथियारों से” के केंद्र में बलिया है । वही केंद्रीय पात्र भी है । दुर्गा और अग्रसेन चार पोतों पर इतराते तो भगवती और दशरथ तीन पोतियों से चिंतित रहते । दूसरे बेटे को शादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे न होने से उनका दुख दोगुना हो जाता । लेकिन समय के साथ यह साबित हो जाता है कि पोतियाँ पोतों से अधिक योग्य होती हैं । भगवती अपने दूसरे बेटे को इस बात के लिये मना लेती है कि वे  बच्चा अनाथालय से गोद ले आयें । इतना ही नहीं अपितु वे एक लड़की को ही गोद लें इसपर भी परिवार में सहमति बनती है ।

           इस सहमति और विचार की सबसे बड़ी सूत्रधार चार पोतों वाली दुर्गा है जो अपने अनुभव के आधार पर भगवती को पोतियों के महत्व को समझा पाती है । इस तरह दुर्गा और भगवती का व्यक्तिगत अनुभव संयुक्त रूप से लड़कियों के पक्ष में दिखाई पड़ता है । वह भगवती से कहती है,“भगवतीउनसे जाकर पूछो जिनके लड़कियाँ नहीं हैं अब हमारे यहीं देख लो सारी की सारी कौरवों की फ़ौज़ पैदा हो गयी मैं तो ऊपरवाले से रात-दिन यही बिनती करती रहती हूँ कि बस हमें एक पोती दे दे l”1 परिवार में इनका कोई विरोध भी नहीं है ।



        दुर्गा भगवती को सलाह देते हुए कहती है कि, सुनभगवती बुरा मत मानियो इस वंश बढ़ाने की भूख ने हमारी बेटियों की दुर्गत की हुई है थोड़ी देर के लिए मान लो तुमने लड़के को गोद ले लियातो इसकी क्या गारुंटी है कि वह तेरी इन पोतियों को बहन का दर्ज़ा दे ही देगा कहीं ऐसा ना हो कि वह सारी जायदाद पर कब्जा कर बैठेऔर तेरी ये पोतियाँ यहाँ के रुख़ों के लिये भी तरस जाएँ इस बारे में अच्छी तरह सोच लेना l”2 इसतरह दुर्गा और भगवती अपने अपने भोगे हुए यथार्थ के आधार पर पोतियों के पक्ष में लगातार अपनी सकारात्मक राय रखती हैं । अग्रसेन और दशरथ दोनों ही अपनी पत्नियों से सहमत हैं । भगवती के बेटे बहू भी आज्ञाकारी हैं । इसतरह बड़ी सहजता से पूरा परिवार भगवती कि बात से सहमत होते हुए अनाथालय से लड़की गोद लेने के निर्णय को स्वीकार करता है । यद्यपि  इतनी अधिक सहजता और अनुकूलता उपन्यास को एकांगी तो बनाता है लेकिन अविश्वसनीय नहीं होने देता ।

          यही सहजता उपन्यासकार तब भी दिखाता है जब सिया और गार्गी के किसी बंगाली और पंजाबी से विवाह की बात सामने आती है । भारतीय समाज में अभी भी इतनी सहजता थोड़ी असहज़ लगती है । इस असहजता को उपन्यासकार बुलबुल की बिरादरी में ही शादी के माध्यम से छुपाता भी है लेकिन इसी विवाह में समस्या को दिखाकर वापस वे यह साबित करने में लग जाते हैं कि जरूरी नहीं कि माँ-बाप अपनी मर्ज़ी से जहां लड़कियों की शादी करें वहाँ सब ठीक ही हो । इसी बात को अधिक पुष्ट करने के लिये वे सिया,गार्गी और पीहू के वैवाहिक जीवन में कोई समस्या नहीं दिखाते । पूरे उपन्यास के कथानक को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि उपन्यासकार एक निश्चित फ़ार्मूले के साथ उपन्यास लिखता है जिसमें उपन्यास शिल्प के कई पक्ष कमजोर तो होते हैं लेकिन लेखन का उद्देश्य शत प्रतिशत पूर्ण होता है ।

        पीहू की कहानी उपन्यास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है । इसने उपन्यास के सौंदर्य को बढ़ाया है । यहाँ सहजता और स्वाभाविकता अधिक है । संदेश भी अधिक मुखर और व्यापक है । अनाथालय से गोद ली गयी पीहू विदेश में पढ़ने जाती है और बड़ी कार्पोरेट कंपनी में काम करती है । लेकिन वह हर साल अपने परिवार में लौटती है । उस अनाथालय में भी लौटती है जहां से वह गोद ली गयी थी । उस अनाथालय को मोटी रकम दान करती है ताकि उसके जैसी लड़कियों को बेहतर सुविधायें मिल सकें ।उसका यह लौटना संवेदना और करुणा की मानवीय प्रतीति है जो विज्ञापित नारों और मूल्यों से परे है । यह जीवन की बेचैनियों का वह इंद्र्धनुष है जो सामाजिक न्याय चेतना को झकझोरता है ।

      अग्रसेन और दुर्गा के माध्यम से मोरवाल जी ने एक और सामाजिक समस्या की तरफ़ ध्यान खींचा है । बुढ़ापे में एकाकी जीवन जीने के लिये अभिशप्त माँ-बाप की समस्या । आज के आधुनिक जीवन की यह बहुत बड़ी समस्या है । अग्रसेन जीवन भर अपने बच्चों के लिये संघर्ष करते रहे । यही बेटे जब आर्थिक रूप से संपन्न हो गये तो माँ – बाप को अकेला छोडकर चले जाते हैं । लेकिन माँ-बाप की संपत्ति में उनकी रुचि बराबर बनी रहती है । जब अग्रसेन अपने बच्चों के बीच संपत्ति का बटवारा करते हैं तो वह मकान किसी को नहीं देते जिसमें वे रहते हैं । क्योंकि कहीं न कहीं उनके मन में यह आशंका रहती है कि अगर वे अपने जीते जी मकान किसी के नाम कर देंगे तो हो सकता है कि वह लड़का उन्हें घर से निकाल दे । इसी बात को लेकर उनके बेटों में दुख भी है । बटवारे के समय दुर्गा अभय से कहती है, नहीं कहा है,तो फ़िर भी कान खोलकर तुम सब सुन लोअपने  जीते-जी मैं इस मकान के किसी को हाथ भी नहीं लगाने दूँगी फ़िर चाहे कोई हमारी सेवा करे या ना करे ! किसी का क्या भरोसा कि इसे भी वसीयत में लिखवाकर कल हमें दर-बदर कर दे एक यही तो आसरा बचा हैइसे भी तुम्हारे हवाले कर देंl”3  यह चिंता समाज के एक बहुत बड़े वर्ग की चिंता है । जिस उपभोगतावादी संस्कृति में हम रह रहे हैं वहाँ क़ीमत हमारे सामाजिक मूल्यों पर कितना हावी हो चुकी है, उसका प्रमाण यहाँ मिलता है ।

         अग्रसेन की मृत्यु के बाद भी दुर्गा किसी बेटे के पास रहने नहीं जाती । वह बुढ़ापे और अकेलेपन से परेशान तो है लेकिन अपने स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं करती । उसकी इसी स्थिति का जिक्र अपनी बेटी से करते हुए भगवती कहती है कि,  कुछ तो अकेलापन और कुछ बुढ़ापा नहीं हुई होगी हिम्मत कुछ बनाने की मैं कई बार समझा चुकी हूँ कि दुर्गा  चली जा अपने किसी बेटे के पास इस उमर में कब तक बना- बना कर खाएगीपर नहीं मानती है बड़ी स्वाभिमानी औरत है कहती है कि जब उन्हें माँ- बाप की जरूरत नहीं हैतो मुझे भी किसी औलाद की जरूरत नहीं है l”4  इन संवादों से स्पष्ट है कि दुर्गा के मन में अपने बेटों के लिये कितनी निराशा और छोभ है । बुढ़ापे में जब माँ बाप को बच्चों की जरूरत है तो वे उनसे अलग हो जा रहे हैं । वृद्धाश्रमों में ऐसे ही न जाने कितने माँ बाप बस अपने मरने के दिन गिन रहे हैं । यह हमारे आज के समाज की एक कटु सच्चाई है ।

         समग्र रूप से इस उपन्यास के बारे में यह कहा जा सकता है कि उपन्यासकार इस बात का समर्थक है कि लड़कियाँ किसी भी तरह से लड़कों से कम नहीं हैं । अपितु संस्कारों में वे उनसे श्रेष्ठ ही हैं । पढ़ लिखकर वो भी अपना मुस्तकबिल बना सकती हैं । इसलिये लड़के-लड़कियों के फरक को मिटाते हुए बालीदगी की नई रवायत नई कैफ़ियत क़ायम होनी चाहिए । योग्यता आत्मा का गुण है इसलिये जाति,धर्म,भाषा,रंग और लिंग के आधार पर सामाजिक भेदभाव दरकिनार किये जाने चाहिए ।
        रूढ़ परंपरागत मान्यताओं का कवच हमारी रक्षा नहीं कर सकेगा अपितु हमारे लिये घातक होगा । हमें आधुनिक भाव बोधों का अग्रदूत बनना होगा । वंचित-विरहित के बीच संभावनाओं का नया द्वार खोलना होगा । वैचारिक दारिद्रीकृत अवस्था से खुद को और समाज को बाहर निकालना होगा । सामाजिक पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना होगा । इसके लिये अपने समय से टकराना होता है । इस उपन्यास के माध्यम से मोरवाल जी वही काम कर रहे हैं । जीवन की प्रांजलता और प्रखरता को सतत क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । इस क्रियाशीलता की निरंतरता में ही जीवन का उत्कर्ष है । इसीलिए जीवन को समन्वयन की प्रक्रिया भी कहा गया है । कहते हैं कि साध्य अच्छा हो तो कोई भी साधन अच्छा है । लेकिन जब साहित्य की बात होती है तो उसकी हर विधा का अपना एक गुण होता है जिसकी अपेक्षा उस विधा विशेष की रचना में की जाती है । यद्यपि शिल्प की दृष्टि से यह उपन्यास कमजोर कहा जा सकता है लेकिन अपने उद्देश्यों में निश्चित ही बहुत महत्वपूर्ण है ।
      


संदर्भ :
1.   शकुंतिका – भगवनदास मोरवालराजकमल प्रकाशन,नई दिल्ली -  वर्ष 2020, पृष्ठ संख्या 21
2.   वही, पृष्ठ संख्या 36
3.   वहीपृष्ठ संख्या 41
4.   वहीपृष्ठ संख्या 93

संदर्भ ग्रंथ :
1.        शकुंतिका – भगवनदास मोरवाल, -  वर्ष 2020
2.        सुर बंजारन - भगवनदास मोरवाल,-  वर्ष 2017
3.        हलाला - भगवनदास मोरवाल,  -  वर्ष 2015  
4.        वंचना - भगवनदास मोरवाल,  -  वर्ष 2019
5.        हिन्दी साहित्य का इतिहास – रामचन्द्र शुक्ल
6.        हिन्दी उपन्यास का इतिहास – गोपालराय
7.        हिन्दी गद्य साहित्य का इतिहास – डॉ रामचन्द्र तिवारी
8.        हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास – डॉ बच्चन सिंह