Wednesday, December 9, 2020

हिंदी पत्रिकाओं के ई मेल

 पत्रिकाओं/सम्पादकों के ई -मेल


1. हंस, संजय सहाय (संपादक), editorhans@gmail.com

2. पाखी, pakhimagazine@gmail.com

3. बया, गौरीनाथ (संपादक), rachna4baya@gmail.com

4. पहल, ज्ञानरंजन (संपादक), edpahaljbp@yahoo.co.in, editorpahal@gmail.com

5. अंतिम जन- दीपक श्री ज्ञान (संपादक)- antimjangsds@gmail.com, 2010gsds@gmail.com

6. समयांतर- पंकज बिष्ट (संपादक)- samayantar.monthly@gmail.com, samayantar@yahoo.com

7. लमही- विजय राय (संपादक)- vijayrai.lamahi@gmail.com

8. पक्षधर- विनोद तिवारी (संपादक)- pakshdharwarta@gmail.com

9. अनहद- संतोष कुमार चतुर्वेदी (संपादक)- anahadpatrika@gmail.com

10. नया ज्ञानोदय- लीलाधर मंडलोई (संपादक)- nayagyanoday@gmail.com, bjnanpith@gmail.com

11. स्त्रीकाल, संजीव चन्दन (संपादक), themarginalized@gmail.com, 

12. बहुवचन- अशोक मिश्रा (संपादक)- bahuvachan.wardha@gmail.com

13. अलाव- रामकुमार कृषक (संपादक)- alavpatrika@gmail.com

14. बनासजन- पल्लव (संपादक)- banaasjan@gmail.com

15. व्यंग्य यात्रा, प्रेम जनमेजय (संपादक), vyangya@yahoo.com, premjanmejai@gmail.com

16. अट्टहास (हास्य व्यंग्य मासिक), अनूप श्रीवास्तव (संपादक), anupsrivastavalko@gmail.com

17. उद्भावना- अजेय कुमार (संपादक)- udbhavana.ajay@yahoo.com

18. समकालीन रंगमंच- राजेश चन्द्र (सम्पादक)- samkaleenrangmanch@gmail.com

19. वीणा-राकेश शर्मा,veenapatrika@gmail.com

20. मुक्तांचल-डॉ मीरा सिन्हा,muktanchalquaterly2014@gmail.com,

21. शब्द सरोकार-डॉ हुकुमचन्द राजपाल,sanjyotima@gmail.com,

22. लहक-निर्भय देवयांश,lahakmonthly@gmail.com

23. पुस्तक संस्कृति। संपादक पंकज चतुर्वेदी।editorpustaksanskriti@gmail.com

24. प्रणाम पर्यटन हिंदी त्रैमासिक संपादक प्रदीप श्रीवास्तव लखनऊ उत्तर प्रदेश

25. PRANAMPARYATAN@YAHOO.COM

26. समालोचन वेब पत्रिका, अरुण देव (सम्पादक)

devarun72@gmail.com

27. वांग्मय पत्रिका, डॉ. एम. फ़िरोज़. एहमद, (सम्पादक), vangmaya@gmail.com

28. साहित्य समीर दस्तक (मासिक), कीर्ति श्रीवास्तव (संपादक), राजकुमार जैन राजन (प्रधान सम्पादक), licranjan2003@gmail.com

29. कथा समवेत (ष्टमासिक), डॉ. शोभनाथ शुक्ल (सम्पादक), kathasamvet.sln@gmail.com

30. अनुगुंजन (त्रैमासिक), डॉ. लवलेश दत्त (सम्पादक), sampadakanugunjan@gmail.com

31. सीमांत, डॉ. रतन कुमार (प्रधान संपादक), seemantmizoram@gmail.com

32. शोध-ऋतु, सुनील जाधव (संपादक), shodhrityu78@yahoo.com

33. विभोम स्वर, पंकज सुबीर (संपादक), vibhomswar@gmail.com, shivna.prakashan@gmail.com

34. सप्तपर्णी, अर्चना सिंह (संपादक), saptparni2014@gmail.com

35. परिकथा, parikatha.hindi@gmail.com

36. लोकचेतना वार्ता, रविरंजन (संपादक), lokchetnawarta@gmail.com

37. युगवाणी, संजय कोथियल (संपादक), yugwani@gmail.com

38. गगनांचल,डॉक्टर हरीश नवल (सम्पादक), sampadak.gagnanchal@gmail.com

39. अक्षर वार्ता, प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा (प्रधान संपादक), डॉ मोहन बैरागी (संपादक) aksharwartajournal@gmail.com

40. कविकुंभ, रंजीता सिंह (संपादक), kavikumbh@gmail.com

41. मनमीत, अरविंद कुमार सिंह(संपादक), manmeetazm@gmail.com

42. पू्र्वोत्तर साहित्य विमर्श (त्रैमासिक), डॉ. हरेराम पाठक (संपादक), hrpathak9@gmail.com

43. लोक विमर्श, उमाशंकर सिंह परमार (संपादक), umashankarsinghparmar@gmail.com

44. लोकोदय, बृजेश नीरज (संपादक), lokodaymagazine@gmail.com

45. माटी, नरेन्द्र पुण्डरीक (संपादक), Pundriknarendr549k@gmail.com

46. मंतव्य, हरे प्रकाश उपाध्याय (संपादक), mantavyapatrika@gmail.com

47. सबके दावेदार, पंकज गौतम (संपादक), pankajgautam806@gmail.com

48. जनभाषा, श्री ब्रजेश तिवारी (संपादक), mumbaiprantiya1935@gmail.com, drpramod519@gmail.com

49. सृजनसरिता (हिंदी त्रैमासिक), विजय कुमार पुरी (संपादक), srijansarita17@gmail.com

50. नवरंग (वार्षिकी), रामजी प्रसाद ‘भैरव’ (संपादक), navrangpatrika@gmail.com

51. किस्सा कोताह (त्रैमासिक हिंदी), ए. असफल (संपादक), a.asphal@gmail.com, Kotahkissa@gmail.com

52. सृजन सरोकार (हिंदी त्रैमासिक पत्रिका), गोपाल रंजन (संपादक), srijansarokar@gmail.com, granjan234@gmail.com 

53. उर्वशी, डा राजेश श्रीवास्तव (संपादक), urvashipatrika@gmail.com 

54. साखी (त्रैमासिक), सदानंद शाही (संपादक), shakhee@gmail.com

55. गतिमान, डॉ. मनोहर अभय (संपादक), manohar.abhay03@gmail.com

56. साहित्य यात्रा, डॉ कलानाथ मिश्र (संपादक), sahityayatra@gmail.com

57. भिंसर, विजय यादव (संपादक), vijayyadav81287@gmail.com

58. सद्भावना दर्पण, गिरीश पंकज (संपादक), girishpankaj1@gmail.com

59. सृजनलोक, संतोष श्रेयांस (संपादक), srijanlok@gmail.com

60. समय मीमांसा, अभिनव प्रकाश (संपादक), editor.samaymimansa@gmail.com

61. प्रवासी जगत, डॉ. गंगाधर वानोडे (संपादक), gwanode@gmail.com pravasijagat.khsagra17@gmail.com

62. शैक्षिक उन्मेष, प्रो. बीना शर्मा (संपादक), dr.beenasharma@gmail.com

63. पल प्रतिपल, देश निर्मोही (संपादक), editorpalpratipal@gmail.com

64. समय के साखी, आरती (संपादक), samaysakhi@hmail.in

65. समकालीन भारतीय साहित्य, रणजीत साहा (संपादक), secretary@sahitya-akademi.gov.in

66. शोध दिशा, डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल (संपादक), shodhdisha@gmail.com

67. अनभै सांचा, द्वारिका प्रसाद चारुमित्र (संपादक), anbhaya.sancha@yahoo.co.in

68. आह्वान, ahwan@ahwanmag.com, ahwan.editor@gmail.com

69. राष्ट्रकिंकर, विनोद बब्बर (संपादक), rashtrakinkar@gmail.com

70. साहित्य त्रिवेणी, कुँवर वीरसिंह मार्तण्ड (संपादक), sahityatriveni@gmail.com

71. व्यंजना, डॉ रामकृष्ण शर्मा (संपादक), shivkushwaha16@gmail.com

72. एक नयी सुबह (हिंदी त्रैमासिक), डॉ. दशरथ प्रजापति (संपादक), dasharathprajapati4@gmail.com

73. समकालीन स्पंदन, धर्मेन्द्र गुप्त 'साहिल' (संपादक), samkaleen.spandan@gmail.com

74. साहित्य संवाद , संपादक - डॉ. वेदप्रकाश, sahityasamvad1@gmail.com

75. भाषा विमर्श ( अपनी भाषा की पत्रिका), अमरनाथ (प्रधान संपादक), अरुण होता (संपादक), amarnath.cu@gmail.com

76. विश्व गाथा, पंकज त्रिवेदी (संपादक), vishwagatha@gmail.com 

77. भाषिकी अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल, प्रो. रामलखन मीना (संपादक), prof.ramlakhan@gmail.com

78. समवेत, संपादक-डॉ.नवीन नंदवाना, editordeskudr@gmail.com

79. तदभव, संपादक: अखिलेश, akhilesh_tadbhav@yahoo.com

80. रचना संसार, भारत कात्यायन (संपादक), rachanasansar@gmail.com

81. शब्द सुमन मासिक पत्रिका, सम्पादक-डॉ रामकृष्ण लाल ' जगमग', 2015shabdsuman@gmail.com

82. अनुराग लक्ष्य, संपादक- विनोद कुमार, vinodmedia100@gmail.com

83. सरस्वती सुमन (मासिक), संपादक- आनन्दसुमन सिंह, saraswatisuman@rediffmail.com

84. आधारशिला (मासिक), संपादक- दिवाकर भट्ट, adharshila.prakashan@gmail.com, editor.adharshila@gmail.com

85. प्रेरणा-अंशु (राष्ट्रीय मासिक), संपादक- प्रताप सिंह, prernaanshu@gmail.com

86. युवादृष्टि (मासिक), संपादक- बी सी जैन, suggestion.abtyp@gmail.com, abtypyd@gmail.com

87. संवदिया(सर्जनात्मक साहित्यिक त्रैमासिकी), संपादक- अनीता पंडित, प्रधान संपादक- मांगन मिश्र'मार्तण्ड', samvadiapatrika@yahoo.com

88. सोच विचार, संपादक-डॉ. जितेन्द्र नाथ मिश्र, sochvicharpatrika@gmail.com

89. त्रैमासिक आदिज्ञान, संपादक-जीतसिंह चौहान, adigyaan@gmail.com

90. पतहर तिमाही, संपादक-विभूति नारायण ओझा, hindipatahar@gmail.com

91. चौराहा (अर्द्धवार्षिक), संपादक - अंजना वर्मा, anjanaverma03@gmail.com

92. निराला निकेतन पत्रिका बेला, संपादक -संजय पंकज, dr.sanjaypankaj@gmail.com

93. इंदु संचेतना(साहित्य परिक्रमा), गंगा प्रसाद शर्मा'गुण शेखर'(प्रधान संपादक),थिएन कपिंग(कार्यकारी संपादक,चीन),बिनय कुमार शुक्ल(संपादक), indusanchetana@gmail.com, indusanchetana.blogspot.in

94. समय सुरभि अनंत (त्रैमासिक ), सम्पादक- नरेन्द्र कुमार सिंह, samaysurabhianant@gmail.com

95. औरत मासिक पत्रिका, संपादक डॉ विधुल्लता ,भोपाल (मध्यप्रदेश), aurat.vidhu@gmail.com

96. वार्ता वाहक-श्रीवत्स करशर्मा(संपादक), vartavahak@gmail.com, 

97. नागरी संगम-डॉ हरिपाल सिंह(प्रधान संपादक), nagrilipiparishad1975@gmail.com

98. सेतु (पिट्सबर्ग से प्रकाशित), अनुराग शर्मा, setuhindi@gmail.com

99. स्त्री, प्रो. कुसुम कुमारी (संपादक), chitra.anshu4@gmail.com

100. चिंतन दिशा, संपादक-हृदयेश मयंक, chintandisha@gmail.com 

101. आधुनिक साहित्य, संपादक डॉ. आशीष कंधवे, aadhuniksahitya@gmail.com

102. अनभै, संपादक- डॉ.रतनकुमार पाण्डेय, anbhai@gmail.com

103. कथाबिंब - सं.डॉ.माधव सक्सेना अरविंद, kathabimb@gmail.com

104. संयोग साहित्य- सं.मुरलीधर पाण्डेय, lordsgraphic@gmail.com

105. नई धारा – संपादक- शिवनारायण, editor@nayidhara.com

106. नया पथ- संपादक- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह/चंचल चौहान, jlsind@gmail.com

107."समकालीन त्रिवेणी" सम्पादक-अखिलेश श्रीवास्तव 'चमन  trivenisevanyas@gmail.com

108  ' शब्दिता ' ;  प्रधान संपादक- डॉ राम कठिन सिंह:  rksingh.neford @gmail.com

109  साहित्‍य विमर्श,सम्पादक-एम एम चन्द्रा . Editordpb17@gmail.com

110  लेखन' पत्रिका,संपादक-मोती लाल

प्रयागराज,उ प्र

motilal379@rediffmail.com

111.अखिल गीत शोध दृष्टि सम्पादक :डॉ0 गीता सिंह

shodhdrishti@gmail. com

9415082614

112 देस हरियाणा  haryanades@gmail.com

113 युगतेवर drrskni,@gmail.com

114  इंडिया इनसाइड

संपादक- अरुण सिंह

editor.indiainside@gmail.com

gmindiainside@gmail.com

115  गांव के लोग-रामजी यादव gaonkelogbsb@gmail.com

116  "शब्दसृष्टि" (हिंदी-मराठी द्विभाषिक पत्रिका), संपादक : डा. मनोहर

shabdasrishti@gmail.com

117।अमर अक्षरा त्रिमासिक, विजयवाड़ा। आंध्र प्रदेश। संपादक। डॉ पेरि सेट्टी श्रीनिवासराव।09989242343। ईमेल। srperisetti@gmail.com

118।   "समकालीन त्रिवेणी" trivenisevanyas@gmail.com

119   साहित्‍य विमर्श... Editordpb17@gmail.com

120।   समकालीन चुनौती ,सुरेन्द्र प्रसाद सुमन [संपादक ],ISSN 2231-1955 

spsuman.chunauti@gmail.com

121

"बिहिन" (कुड़मालि-हिन्दी पत्रिका),  झारखंड

संपादक - तारकेश्वर महतो "गरीब"

patrikabihin@gmail.com

Friday, September 18, 2020

सुमित्रानन्दन पन्त

  

नाम सुमित्रानन्दन पन्त

जन्म 1900 ई. में कौसानी, कुमाऊँ (कूर्मांचल)

पिता का नाम पण्डित गंगादत्त पन्त

माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी

शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर अल्मोडा के गवर्नमेण्ट ।हाईस्कूल में प्रवेश, तत्पश्चात् बनारस सेहाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा ।स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्लासाहित्य का गहन अध्ययन किया।

कृतियाँ काव्य रचनाएँ वीणा, उच्छ्वास, पल्लव,गुंजन, ग्रन्थि, युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण-किरण, युगान्तर, उत्तरा, चिदम्बरा, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन आदि। गीति-नाट्य ज्योत्स्ना, रजत शिखर, अतिमा। उपन्यास हार। कहानी संग्रह पाँच कहानियाँ।

उपलब्धियाँ “कला एवं बूढ़ा चाँद पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘लोकायतन’ पर सोवियत पुरस्कार, “चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा 1961 ई. पद्मभूषण से सम्मानित।

मृत्यु 1977 ई.

सुमित्रानन्दन पन्त जीवन परिचय एवं साहित्यिक उपलब्धियाँ

प्रकृति की सुकुमार भावनाओं के कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म हिमालय के सुरम्य प्रदेश कूर्मांचल (कुमाऊँ) के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई, 1900 को हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित गंगादत्त पन्त तथा माता काbनाम श्रीमती सरस्वती देवी था। कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल से प्रारम्भिकbशिक्षा पूर्ण कर ये उच्च विद्यालय में अध्ययन के लिए अल्मोड़ा के राजकीय हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। यहीं पर इन्होंने अपना नाम गसाईं दत्त से बदलकर

सुमित्रानन्दन पन्त रखा। 1919 ई. में बनारस आगमन के पश्चात् यहीं से हाईस्कूल की परीक्षा उतीर्ण की। उसके बाद इलाहाबाद के ‘म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में प्रवेश लेने के पश्चात् गाँधीजी के आह्वान पर इन्होंने कॉलेज छोड़ दिया, फिर स्वाध्याय से ही अंग्रेजी, संस्कृत और बांग्ला साहित्य का गहन अध्ययन किया। उपनिषद्, दर्शन तथा आध्यात्मिक साहित्य की ओर उनकी रुचि प्रारम्भ से ही थी। पण्डित शिवाधार पाण्डेय ने इन्हें अत्यधिक प्रेरित किया।

इलाहाबाद (प्रयाग) वापस आकर ‘रुपाभा’ पत्रिका का प्रकाशन करने लगे। बीच में प्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के सम्पर्क में आए और फिर इनका परिचय अरविन्द घोष से हुआ। इनके दर्शन से प्रभावित पन्त जी ने अनेक काव्य संकलन ‘स्वर्ण किरण’, ‘स्वर्ण धूलि’, ‘उत्तरा’ आदि प्रकाशित किए। 1950 ई. में ये आकाशवाणी में हिन्दी चीफ प्रोड्यूसर और फिर साहित्य सलाहकार के पद पर नियुक्त हुए। 1961 ई. में इन्हें पद्मभूषण सम्मान, ‘कला एवं बूढ़ा चाँद’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार, ‘लोकायतन’ पर सोवियत भूमि पुरस्कार तथा ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। 28 दिसम्बर, 1977 को प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त जी प्रकृति की गोद में ही विलीन हो गए।


साहित्यिक गतिविधियाँ

छायावादी युग के प्रतिनिधि कवि सुमित्रानन्दन पन्त ने सात वर्ष की आयु में ही कविता लेखन प्रारम्भ कर दिया था। इनकी प्रथम रचना 1916 ई. में आई, उसके बाद इनकी काव्य के प्रति रुचि और बढ़ गई। पन्त जी के काव्य में कोमल एवं मृदुल भावों की अभिव्यक्ति होने के कारण इन्हें ‘प्रकृति का सुकुमार कवि’ कहा जाता है।


कृतियाँ

इनकी निम्नलिखित रचनाएँ उल्लेखनीय हैं

काव्य रचनाएँ वीणा (1919), उच्छ्वास (1919), ग्रन्थि (1920), पल्लव । (1926), गुंजन (1932), युगान्त (1937), युगवाणी (1938), ग्राम्या (1940), स्वर्ण-किरण (1947), युगान्तर (1948), उत्तरा (1949), चिदम्बरा (1958), कला और बूढ़ा चाँद (1959), लोकायतन आदि। गीति-नाट्य ज्योत्स्ना, रजत शिखर, अतिमा (1955) उपन्यास हार (1960) कहानी संग्रह पाँच कहानियाँ (1988)


काव्यगत विशेषताएँ

भाव पक्ष


सौन्दर्य के कवि सौन्दर्य के उपासक पन्त की सौन्दर्यानभति के तीन मुख्य केन्द्र-प्रकृति, नारी एवं कला हैं। उनका सौन्दर्य प्रेमी मन प्रकृति को देखकर विभोर हो उठता है। वीणा, ग्रन्थि, पल्लव आदि प्रारम्भिक कृतियों में प्रकृति का कोमल रूप परिलक्षित हुआ है। आगे चलकर ‘गंजन’ आदि काव्य रचनाओं में कविवर पन्त का प्रकृति-प्रेम मांसल बन जाता है और नारी सौन्दर्य का चित्रण करने लगता है। ‘पल्लव’ एवं ‘गुंजन’ में प्रकृति और नारी मिलकर एक हो गए हैं।

कल्पना के विविध रूप व्यक्तिवादी कलाकार के समान अन्तर्मखी बनकर अपनी कल्पना को असीम गगन में खुलकर विचरण करने देते हैं।

रस चित्रण पन्त जी का प्रिय रस शृंगार है, परन्तु उनके काव्य में | शान्त, अद्भुत, करुण, रोद्र आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हआ है।

कला पक्ष

भाषा पन्त जी की भाषा चित्रात्मक है। साथ ही उसमें संगीतात्मकता के गुण भी मौजूद हैं। उन्होंने कविता की भाषा एवं भावों में पूर्ण सामंजस्य पर बल दिया है। उनकी प्रकृति सम्बन्धी कविताओं में चित्रात्मकता अपनीbचरम सीमा पर दिखाई देती है। कोमलकान्त पदावली से युक्त सहज खड़ीबोली में पद-लालित्य का गुण विद्यमान है। उन्होंने अनेक नए शब्दों का निर्माण भी किया; जैसे-टलमल, रलमल आदि। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित है, जिसमें एक सहज प्रवाह एवं अलंकृति देखने को मिलती है।

शैली पन्त जी की शैली में छायावादी काव्य-शैली की समस्त विशेषताएँ; जैसे-लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता, ध्वन्यात्मकता, चित्रात्मकता, सजीव एवं मनोरम बिम्ब-विधान आदि पर्याप्त रूप से मौजूद हैं।

अलंकार एवं छन्द पन्त जी को उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति जैसे अलंकार विशेष प्रिय थे। वे उपमाओं की लड़ी बाँधने में अत्यन्त सक्षम थे। उन्होंने मानवीकरण एवं ध्वन्यर्थ-व्यंजना जैसे पाश्चात्य अलंकारों के भी प्रयोग किए। इन्होंने नवीन छन्दों का प्रयोग किया। मुक्तक छन्दों का विरोध किया, क्योंकि वे उसकी अपेक्षा तुकान्त छन्दों को अधिक सक्षम मानते थे। उन्होंने छन्द के बन्धनों का विरोध किया।

हिन्दी साहित्य में स्थान

सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में कल्पना एवं भावों की सकमार कोमलता के दर्शन होते हैं। पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे। वे युगद्रष्टा व युगस्रष्टा दोनों ही थे। व असाधारण प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार थे। छायावाद के युग प्रवर्तक कवि के रूप

में उनकी सेवाओं को सदा याद किया जाता रहेगा।


BAAPU KE PRATI 


तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन,

हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन,

तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,

जिसमें असार भव-शून्य लीन;

आधार अमर, होगी जिस पर

भावी की संस्कृति समासीन!

तुम मांस, तुम्ही हो रक्त-अस्थि,

निर्मित जिनसे नवयुग का तन,

तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व-त्याग

है विश्व-भोग का वर साधन।

इस भस्म-काम तन की रज से

जग पूर्ण-काम नव जग-जीवन

बीनेगा सत्य-अहिंसा के

ताने-बानों से मानवपन!

सदियों का दैन्य-तमिस्र तूम,

धुन तुमने कात प्रकाश-सूत,

हे नग्न! नग्न-पशुता ढँक दी

बुन नव संस्कृत मनुजत्व पूत।

जग पीड़ित छूतों से प्रभूत,

छू अमित स्पर्श से, हे अछूत!

तुमने पावन कर, मुक्त किए

मृत संस्कृतियों के विकृत भूत!

सुख-भोग खोजने आते सब,

आये तुम करने सत्य खोज,

जग की मिट्टी के पुतले जन,

तुम आत्मा के, मन के मनोज!

जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर

चेतना, अहिंसा, नम्र-ओज,

पशुता का पंकज बना दिया

तुमने मानवता का सरोज!

पशु-बल की कारा से जग को

दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,

विद्वेष, घृणा से लड़ने को

सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति;

वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ

तुमने विचार-परिणीत उक्ति,

विश्वानुरक्त हे अनासक्त!

सर्वस्व-त्याग को बना भुक्ति!

सहयोग सिखा शासित-जन को

शासन का दुर्वह हरा भार,

होकर निरस्त्र, सत्याग्रह से

रोका मिथ्या का बल-प्रहार:

बहु भेद-विग्रहों में खोई

ली जीर्ण जाति क्षय से उबार,

तुमने प्रकाश को कह प्रकाश,

औ अन्धकार को अन्धकार।

उर के चरखे में कात सूक्ष्म

युग-युग का विषय-जनित विषाद,

गुंजित कर दिया गगन जग का

भर तुमने आत्मा का निनाद।

रंग-रंग खद्दर के सूत्रों में

नव-जीवन-आशा, स्पृह्यालाद,

मानवी-कला के सूत्रधार!

हर लिया यन्त्र-कौशल-प्रवाद।

जड़वाद जर्जरित जग में तुम

अवतरित हुए आत्मा महान,

यन्त्राभिभूत जग में करने

मानव-जीवन का परित्राण;

बहु छाया-बिम्बों में खोया

पाने व्यक्तित्व प्रकाशवान,

फिर रक्त-माँस प्रतिमाओं में

फूँकने सत्य से अमर प्राण!

संसार छोड़ कर ग्रहण किया

नर-जीवन का परमार्थ-सार,

अपवाद बने, मानवता के

ध्रुव नियमों का करने प्रचार;

हो सार्वजनिकता जयी, अजित!

तुमने निजत्व निज दिया हार,

लौकिकता को जीवित रखने

तुम हुए अलौकिक, हे उदार!

मंगल-शशि-लोलुप मानव थे

विस्मित ब्रह्मांड-परिधि विलोक,

तुम केन्द्र खोजने आये तब

सब में व्यापक, गत राग-शोक;

पशु-पक्षी-पुष्पों से प्रेरित

उद्दाम-काम जन-क्रान्ति रोक,

जीवन-इच्छा को आत्मा के

वश में रख, शासित किए लोक।

था व्याप्त दिशावधि ध्वान्त भ्रान्त

इतिहास विश्व-उद्भव प्रमाण,

बहु-हेतु, बुद्धि, जड़ वस्तु-वाद

मानव-संस्कृति के बने प्राण;

थे राष्ट्र, अर्थ, जन, साम्य-वाद

छल सभ्य-जगत के शिष्ट-मान,

भू पर रहते थे मनुज नहीं,

बहु रूढि-रीति प्रेतों-समान--

तुम विश्व मंच पर हुए उदित

बन जग-जीवन के सूत्रधार,

पट पर पट उठा दिए मन से

कर नव चरित्र का नवोद्धार;

आत्मा को विषयाधार बना,

दिशि-पल के दृश्यों को सँवार,

गा-गा--एकोहं बहु स्याम,

हर लिए भेद, भव-भीति-भार!

एकता इष्ट निर्देश किया,

जग खोज रहा था जब समता,

अन्तर-शासन चिर राम-राज्य,

औ’ वाह्य, आत्महन-अक्षमता;

हों कर्म-निरत जन, राग-विरत,

रति-विरति-व्यतिक्रम भ्रम-ममता,

प्रतिक्रिया-क्रिया साधन-अवयव,

है सत्य सिद्ध, गति-यति-क्षमता।

ये राज्य, प्रजा, जन, साम्य-तन्त्र

शासन-चालन के कृतक यान,

मानस, मानुषी, विकास-शास्त्र

हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान;

भौतिक विज्ञानों की प्रसूति

जीवन-उपकरण-चयन-प्रधान,

मथ सूक्ष्म-स्थूल जग, बोले तुम--

मानव मानवता का विधान!

साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी

मानवता पशु-बलाक्रान्त,

श्रृंखला दासता, प्रहरी बहु

निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त;

कारा-गृह में दे दिव्य जन्म

मानव-आत्मा को मुक्त, कान्त,

जन-शोषण की बढ़ती यमुना

तुमने की नत-पद-प्रणत, शान्त!

कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति

बहु धर्म-जाति-गत रूप-नाम,

बन्दी जग-जीवन, भू-विभक्त,

विज्ञान-मूढ़ जन प्रकृति-काम;

आए तुम मुक्त पुरुष, कहने--

मिथ्या जड़-बन्धन, सत्य राम,

नानृतं जयति सत्यं, मा भैः

जय ज्ञान-ज्योति, तुमको प्रणाम!


रचनाकाल: अप्रैल’१९३६


मीरा बाई के पद SYBA

 

          01

        राग हमीर

बसो मोरे नैनन में नँदलाल ।। टेक ।।

मोहनी मूरति साँवरी सूरति, नैणा बने बिसाल ।

अधर सुधारस मुरली राजति, उन बैजंती माल[1] ।

छुद्र घंटिका कटि तट सोभित, नूपुर सबद रसाल ।

मीराँ प्रभु संतन सुखदाई, भक्‍त बछल गोपाल ।।3।।

बसो = छाये रहो। सूरति = स्वरूप। बने = शोभा दे रहे हैं। सुधारस = अमृत जैसा माधुर्य उत्पन्न करने वाली। राजित = शोभित है। वैजन्ती माल = वैजन्ती नाम की माला जिसे भगवान् विष्णु धारण करते हैं। छुद्र घटिका = घुंघरूदार करधनी। कटितट = कटि प्रदेश वा कमर में। सबद = शब्द, ध्वनि। रसाल = मधुर। भक्तवछल = भक्तवत्सल वा भक्तों को प्यार करने वाले

                   02

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥

जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई।

तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥

छांड़ि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई॥

संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥

चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।

मोती मूंगे उतार बनमाला पोई॥

अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।

अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई॥

दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई।

माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥

भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।

दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥

 

गिरधर-पर्वत को धारण करने वाला यानी कृष्ण। गोपाल-गाएँ पालने वाला, कृष्ण। मोर मुकुट-मोर के पंखों का बना मुकुट। सोई-वही। जा के-जिसके। छाँड़ि दयी-छोड़ दी। कुल की कानि-परिवार की मर्यादा। करिहै-करेगा। कहा-क्या। ढिग-पास। लोक-लाज-समाज की मर्यादा। असुवन-आँसू। सींचि-सींचकर। मथनियाँ-मथानी। विलायी-मथी। दधि-दही। घृत-घी। काढ़ि लियो-निकाल लिया। डारि दयी-डाल दी। जगत-संसार। तारो-उद्धार। छोयी-छाछ, सारहीन अंश। मोहि-मुझे।

प्रसंग-प्रस्तुत पद पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित मीराबाई के पदों से लिया गया है। इस पद में उन्होंने भगवान कृष्ण को पति के रूप में माना है तथा अपने उद्धार की प्रार्थना की है।
व्याख्या-मीराबाई कहती हैं कि मेरे तो गिरधर गोपाल अर्थात् कृष्ण ही सब कुछ हैं। दूसरे से मेरा कोई संबंध नहीं है। जिसके सिर पर मोर का मुकुट है, वही मेरा पति है। उनके लिए मैंने परिवार की मर्यादा भी छोड़ दी है। अब मेरा कोई क्या कर सकता है? अर्थात् मुझे किसी की परवाह नहीं है। मैं संतों के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करती हूँ और इस प्रकार लोक-लाज भी खो दी है। मैंने अपने आँसुओं के जल से सींच-सींचकर प्रेम की बेल बोई है। अब यह बेल फैल गई है और इस पर आनंद रूपी फल लगने लगे हैं। वे कहती हैं कि मैंने कृष्ण के प्रेम रूप दूध को भक्ति रूपी मथानी में बड़े प्रेम से बिलोया है। मैंने दही से सार तत्व अर्थात् घी को निकाल लिया और छाछ रूपी सारहीन अंशों को छोड़ दिया। वे प्रभु के भक्त को देखकर बहुत प्रसन्न होती हैं और संसार के लोगों को मोह-माया में लिप्त देखकर रोती हैं। वे स्वयं को गिरधर की दासी बताती हैं और अपने उद्धार के लिए प्रार्थना करती हैं।

विशेष-

1.    मीरा कृष्ण-प्रेम के लिए परिवार व समाज की परवाह नहीं करतीं।

2.    मीरा की कृष्ण के प्रति अनन्यता व समर्पण भाव व्यक्त हुआ है।

3.    अनुप्रास अलंकार की छटा है।

4.    बैठि-बैठि’, ‘सींचि-सींचि’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।

5.    माधुर्य गुण है।

6.    राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा का सुंदर रूप है।

7.    मोर-मुकुट’, ‘प्रेम-बेलि’, ‘आणद-फल’ में रूपक अलंकार है।

8.    संगीतात्मकता व गेयता है

शब्दार्थ :- कानि =मर्यादा, लोकलाज। अंसुवन जल = अश्रुरूपी जल से। आणद =आनन्दमय। फल =परिणाम। राजी =खुश। रोई =दुखी हुई।

 

        

 

  03

पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे।

मैं तो मेरे नारायण की आपहि हो गई दासी रे।

लोग कहै मीरा भई बावरी न्यात कहै कुलनासी रे॥

विष का प्याला राणाजी भेज्या पीवत मीरा हाँसी रे।

'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर सहज मिले अविनासी रे॥

पग-पैर। नारायण-ईश्वर। आपहि-स्वयं ही। साची-सच्ची। भई-होना। बावरी-पागल। न्यात-परिवार के लोग, बिरादरी। कुल-नासी-कुल का नाश करने वाली। विस-जहर। पीवत-पीती हुई। हाँसी-हँस दी। गिरधर-पर्वत उठाने वाले। नागर-चतुर। अविनासी-अमर।

प्रसंग-प्रस्तुत पद पाठ्यपुस्तक आरोह भाग-1 में संकलित प्रसिद्ध कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई के पदों से लिया गया है। इस पद में, उन्होंने कृष्ण प्रेम की अनन्यता व सांसारिक तानों का वर्णन किया है।
व्याख्या-मीराबाई कहती हैं कि वह पैरों में धुंघरू बाँधकर कृष्ण के समक्ष नाचने लगी है। इस कार्य से यह बात सच हो गई कि मैं अपने कृष्ण की हूँ। उसके इस आचरण के कारण लोग उसे पागल कहते हैं। परिवार और बिरादरी वाले कहते हैं कि वह कुल का नाश करने वाली है। मीरा विवाहिता है। उसका यह कार्य कुल की मान-मर्यादा के विरुद्ध है। कृष्ण के प्रति उसके प्रेम के कारण राणा ने उसे मारने के लिए विष का प्याला भेजा। उस प्याले को मीरा ने हँसते हुए पी लिया। मीरा कहती हैं कि उसका प्रभु गिरधर बहुत चतुर है। मुझे सहज ही उसके दर्शन सुलभ हो गए हैं।

विशेष-

1.    कृष्ण के प्रति मीरा का अटूट प्रेम व्यक्त हुआ है।

2.    मीरा पर हुए अत्याचारों का आभास होता है।

3.    अनुप्रास अलंकार की छटा है।

4.    संगीतात्मकता है।

5.    राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है।

6.    भक्ति रस की अभिव्यक्ति हुई है।

7.    बावरी’ शब्द से बिंब उभरता है।

 

         04

दरस बिन दूखण लागे नैन।
जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन।
बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख देन।

 

साँवरे के दर्शन बिना मेरे नेत्र अत्यधिक दुखी हैं । हे स्वामी जब से तुम्हारा वियोग हुआ, तब से आज तक मैं कभी शान्ति नहीं पा सकी । कोयल, पपीहा आदि पक्षियों के मीठे शब्द सुनते ही मेरा हृदय काँप उठता है और बैन आदि के कठोर शब्द मुझे मीठे लगते हैं । गोविन्द के विरह में तड़पती रहती हूँ, इसलिये रात को सो नहीं पाती, करवट लेते-लेते मेरा सारा सुख चला गया । हे सखी ! अब इस विरह-व्यथा को मैं किससे कहूँ? मुझे चैन नहीं मिलता, निरन्तर श्रीहरि के आने की बाट देखती रहती हूँ । रात मेरे लिए छः महीने के बराबर हो गयी है । मीरा जी कहती हैं – हे स्वामी ! तुम दुःख मिटाने वाले और आनन्द दाता हो, मुझे कब तुम्हारे दर्शन होंगे? कब मुझे आकर मिलोगे?

Thursday, September 17, 2020

तुलसीदास के पद SYBA

 

     तुलसीदास         

     01

दीनको दयालु, दानि दूसरो न कोऊ।

जाहि दीनता कहैां हौं देखौं दीन सोऊ।।

 

 सुर, नर, मुनि, असुर, नाग, साहिब तौ घनेरे।

 पै तौ लौं जौ लौं रावरे न नेकु नयन फेरे।।

 

त्रिभुवन, तिहुँ काल बिदित, बेद बदति चारी।

आदि-अंत-मध्य राम! सहबी तिहारी।।

 

तोहि माँगि माँगनो न माँगनो कहायो।

सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो।।

 

पाहन-पसु बिटप- बिहँग अपने करि लीन्हे।

महाराज दसरथके! श्रंक राय कीन्हें।।

 

तू गरीबको निवाज, हौं गरीब तेरो।

बारक कहिये कृपालु! त्ुलसिदास मेरो।।                     

 

 

 

 

 

                           2

तू दयालु, दीन हौं , तू दानि , हौं भिखारी।
हौं प्रसिद्ध पातकी, तू पाप-पुंज-हारी।1

नाथ तू अनाथको, अनाथ कौन मोसो
मो समान आरत नहिं, आरतिहर तोसो।2

ब्रह्म तू ,हौं जीव, तू है ठाकुर, हौं चेरो।
तात -मात, गुर -सखा, तू सब बिधि हितू मेरो।3

तोहिं मोहिं नाते अनेक, मानियै जो भावै।
 ज्यों त्यों तुलसी कृपालु! चरन-सरन पावै।4

 

भावार्थः-- हे नाथ ! तू दीनोंपर दया करनेवाला है, तो मैं दीन हूँ । तू अतुल दानी है, तो मैं भीखमंगा हूँ । मैं प्रसिद्ध पापी हूँ, तो तू पाप - पुंजोंका नाश करनेवाला है ॥१॥

 

तू अनाथोंका नाथ है, तो मुझ - जैसा अनाथ भी और कौन है ? मेरे समान कोई दुःखी नहीं है और तेरे समान कोई दुःखोंको हरनेवाला नहीं है ॥२॥

 

तू ब्रह्म है, मैं जीव हूँ । तू स्वामी है, मैं सेवक हूँ । अधिक क्या, मेरा तो माता, पिता, गुरु, मित्र और सब प्रकारसे हितकारी तू ही है ॥३॥

 

मेरे - तेरे अनेक नाते हैं; नाता तुझे जो अच्छा लगे, वही मान ले । परंतु बात यह है कि हे कृपालु ! किसी भी तरह यह तुलसीदास तेरे चरणोंकी शरण पा जावे ॥४॥

 

          03

कबहूँ मन बिश्राम न मान्यो ।

निसिदिन भ्रमत बिसारि सहज सुख, जहँ तहँ इंद्रिन तान्यो ॥१॥

जदपि बिषय - सँग सह्यो दुसह दुख, बिषम जाल अरुझान्यो ।

तदपि न तजत मूढ़ ममताबस, जानतहूँ नहिं जान्यो ॥२॥

जनम अनेक किये नाना बिधि करम - कीच चित सान्यो ।

होइ न बिमल बिबेक - नीर बिनु, बेद पुरान बखान्यो ॥३॥

निज हित नाथ पिता गुरु हरिसों हरषि हदै नहिं आन्यो ।

तुलसिदास कब तृषा जाय सर खनतहि जनम सिरान्यो ॥४॥

भावार्थः-- अरे मन ! तूने कभी विश्राम नहीं लिया । अपना सहज सुखस्वरुप भूलकर दिन - रात इन्द्रियोंका खींचा हुआ जहाँ - तहाँ विषयोंमें भटक रहा है ॥१॥

यद्यपि विषयोंके संगसे तूने असह्य संकट सहे है और तू कठिन जालमें फँस गया है तो भी हे मूर्ख ! तू ममताके अधीन होकर उन्हें नहीं छोड़ता । इस प्रकार सब कुछ समझकर भी बेसमझ हो रहा है ॥२॥

अनेक जन्मोंमें नाना प्रकारके कर्म करके तू उन्हींके कीचड़में सन गया है, हे चित्त ! विवेकरुपी जल प्राप्त किये बिना यह कीचड़ कभी साफ नहीं हो सकता । ऐसा वेदपुराण कहते हैं ॥३॥

अपना कल्याण तो परम प्रभु, परम पिता और परम गुरुरुप हरिसे हैं, पर तूने उनको हुलसकर हदयमें कभी धारण नहीं किया, ( दिन - रात विषयोंके बटोरनेमें ही लगा रहा ) हे तुलसीदास ! ऐसे तालाबसे कब प्यास मिट सकती है, जिसके खोदनेमें ही सारा जीवन बीत गया ॥४॥

  04

 

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।।

काको नाम पतित पावन जग,
केहि अति दीन पियारे।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।।

कौनहुँ देव बड़ाइ विरद हित,
हठि हठि अधम उधारे।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।।

खग मृग व्याध पषान विटप जड़,
यवन कवन सुर तारे।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।।

देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज,
सब माया-विवश बिचारे।

तिनके हाथ दास 'तुलसी' प्रभु,
कहा अपुनपौ हारे।

जाऊँ कहाँ तजि चरन तुम्हारे।।